संसद में आज हुई घटना भाजपा की सुनियोजित साजिश का नतीजा है👇
वरना कैसे हो सकता है कि जिस समय दिल्ली में ये तमाशा चल रहा था, उसी वक्त मुंबई कांग्रेस के दफ्तर में भी भाजपा कार्यकर्ता तोड़फोड़ कर रहे थे? खिड़की दरवाजों के शीशे फोड़ दिए गए और कांग्रेस नेताओं के पोस्टर फाड़े जा रहे थे।
ठीक उसी समय पटना स्थित बिहार कांग्रेस के मुख्यालय सदाकत आश्रम पर भी भाजपा के गुंडों ने हमला किया।
तो क्या आपको भी लगता है कि दिल्ली मुंबई से बिहार तक भाजपा की यह हिंसक प्रवृत्ति मात्र एक संयोग था?
हम लोग कई बार देख चुके हैं कि जब दुष्प्रचार, अफवाह और गोदी मीडिया से काम नहीं बनता तो भाजपा वाले डराना धमकाना और लाठी डंडे लेकर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं।
इसी तरह अराजकता और हिंसक शोर में असल मुद्दा गायब करने की पुरानी रणनीति है इनकी।
इसलिए याद रखिए कि वो असल मुद्दा क्या था जिससे ध्यान भटकाने के लिए यह सब प्रपंच रचा जा रहा है।
असल मुद्दा है कि भाजपा को डॉ. अंबेडकर के योगदान से बने संविधान से घोर दिक्कत जो गृहमंत्री अमित शाह के बयान से उजागर हो गया।
आज ये लोग चाहे कुछ भी बोल रहे हों, लेकिन आजादी के बाद से ही संघी सोच ने भारतीय संविधान के प्रति घृणा और विरोध का भाव रखा है।
राज्य सभा में नोटों की गड्डी मिलने की सदन में घोषणा की गई थी, कहा था जाँच होगी। सदन में कैमरे लगे हैं। दो हफ़्ते हो गए, उसका वीडियो आज तक नहीं मिला।
आज संसद परिसर में @RahulGandhi जी पर धक्कामुक्की का आरोप लगा है। CCTV लगे हैं, देश को दिखा दो क्या हुआ था। लेकिन तय मानिए, ये वीडियो भी आपको कभी नहीं दिखेगा।
सब खेल सिर्फ मुद्दा भटकाने का है। वरना लाइव कैमरों के ज़माने दूध का दूध, पानी का पानी करने में कितना वक्त लगता है?
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ख़ानौरी बॉर्डर के किसान मोर्चे पर किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल जी के आमरण अनशन का आज 23वां दिन था। आज सुबह जय किसान आंदोलन के साथियों के साथ उनसे मुलाक़ात की। उनका शरीर कमजोर हुआ है लेकिन हौसला और मज़बूत हुआ है।
किसान आंदोलन एक बार फिर उभार पर है लेकिन सरकार की बेरुखी बरकरार है। इतने लंबे आमरण अनशन के बाद भी अबतक केंद्र सरकार का कोई भी प्रतिनिधि उनसे बात करने भी नहीं पहुंचा। मांगें वही हैं जो दिल्ली मोर्चा के समय अधूरी बची थीं- एम.एस.पी. यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी, किसानों की कर्ज मुक्ति और मोर्चा उठाते वक्त केंद्र सरकार द्वारा किए वादों को पूरा करना।
आंदोलनकारी जानते हैं कि दिल्ली सरकार ऊंचा सुनती है। लगता है इस सरकार को अपनी मांग सुनाने के लिए किसानों के सभी संगठनों को एकजुट होकर दोबारा सड़क पर उतरने का समय आ गया है।
#FarmersProtest #MSP
सावरकर ने डॉ अंबेडकर के बौद्ध धर्म स्वीकार करने पर जिस तरह की भाषा इस्तेमाल की थी, मैंने ‘सावरकर: काला पानी और उसके बाद’ में उनके ही समग्र से उसके उदाहरण दिये थे।
उनके शिष्य कहाँ से सम्मान करेंगे बाबा साहब का?
गडकरी जी भी रंग दिखाने लग गए हैं। इंडोनेशिया भूल गए?
ऐसे तो जिन देशों में डेमोक्रेसी, अल्पसंख्यकों के अधिकार और समाजवाद की स्थिति बेहतर है वो ईसाई बाहुल्य हैं। क्या करें भारत को ईसाई बाहुल्य कर दें इनके लॉजिक से?
दरअसल ये मामला धर्म से नहीं धर्मान्धता से जुड़ा है। पर वो गडकरी जी को शाखा में रटाया नहीं गया था।
खुशी भले संक्रामक न हो, पर हंसी संक्रामक होती है। क्रोध भले संक्रामक न हो पर क्रोध का प्रदर्शन हमेशा संक्रामक होता है। कट्टरता संक्रामक होती है, घृणा और नफ़रत संक्रामक होती है।
प्यार भी संक्रामक होता है। आपको कैसा समाज बनाना है आप देख लें, क्योंकि संक्रमण सबको होगा/हो रहा है।
यूपी में 100 से अधिक SC लड़कियों को चार विषयों में 0 अंक देना एक सोची-समझी साजिश है। ये लड़कियाँ पिछले वर्ष 70%-85% अंक लाई थीं। द्रोणाचार्य मानसिकता आज भी एकलव्यों के अंगूठे काट रही है। SC, ST, OBC को कुचलने की हर कोशिश के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है
लोकतंत्र: आदर्श और हकीकत के बीच आज एक बड़ा फासला है।
लोकतंत्र एक सुंदर आदर्श है—हर व्यक्ति को अपने जीवन को प्रभावित करने वाले निर्णयों में समान भागीदारी का अधिकार। लेकिन क्या यह आदर्श आज की राजनीतिक व्यवस्था से मेल खाता है?
हमने लोकतंत्र को सिर्फ़ बहुमत के शासन से जोड़ दिया है। नतीजा? आज दुनिया भर में ऐसे नेता लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से चुनकर आ रहे हैं, जिससे लोकतंत्र की मूल भावना कमजोर हुई है।
लोकतंत्र का यह विकृत स्वरूप—पैसे और मीडिया के प्रभाव में बहुमत की राजनीति—हमारे आदर्श का प्रतिबिंब नहीं, बल्कि उसका विरोधाभास है।
समाज को लोकतंत्र के ऐसे स्वरूपों की तलाश करनी होगी जो उस आदर्श के करीब हों, न कि बहुमतवाद के नाम पर उसे कमजोर करें।
संभल में मिले मंदिर पर उसके मालिकान की बात
1- किसी डर से नहीं गए थे।
2-मंदिर पर कोई अतिक्रमण नहीं हुआ था।
अर्थात
मीडिया और भाजपा से जुड़े लोग मिथ्या बातें फैला रहे हैं।
संभल मंदिर में स्थानीय हिंदू लोगों ने स्पष्ट कर दिया है कि मंदिर शुरू से उनके कंट्रोल में ही था। पूजा की भी कोई मनाही नहीं थी। उनका पलायन भी निजी कारणों से हुआ था।
मंदिर के बगल वाली दिवार भी मंदिर का ही कमरा था वहां के हिंदू समुदाय ने ही बनवाया था। मुसलमानों से डर की बात झूठी है
बड़ी खबर: अभी अतुल सुभाष को न्याय भी नहीं मिला कि, सोनिया अग्रवाल - हरियाणा राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने वैवाहिक विवाद निपटाने के लिए 1 लाख रुपए लेने के आरोप में गिरफ्तार किया
शिकायत एक शिक्षक ने दर्ज कराई थी, जिसकी पत्नी पुलिस अधिकारी है
सोनिया ने मामले को निपटाने के लिए उससे 1 लाख रुपए रिश्वत मांगी
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