इतिहास की चोरी बंद करो! राजपूत सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार जी की गरिमा पर हाथ न डालो!
भाइयों और बहनों,
आज राजस्थान के प्रतापगढ़ में कुछ लोग गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज जी की प्रतिमा अनावरण के नाम पर इतिहास को तोड़-मरोड़ रहे हैं। वो पोस्ट देखी? रैली, बैनर, नारे—सब कुछ "गुर्जर" के नाम पर! लेकिन सच्चाई क्या है? मिहिर भोज प्रतिहार एक शुद्ध राजपूत क्षत्रिय थे! इक्ष्वाकु वंश के राम पुत्र लक्ष्मण के वंशज, जिन्होंने अरब आक्रमणकारियों को सिर झुकाया, कन्नौज को राजधानी बनाया, और पूरे भारत को एकजुट किया। "गुर्जर" तो सिर्फ क्षेत्र का नाम था—गुर्जरदेश (राजस्थान-गुजरात का हिस्सा), जाति नहीं!
ऐतिहासिक प्रमाण क्या कहते हैं?
ग्वालियर प्रशस्ति शिलालेख: मिहिर भोज को स्पष्ट रूप से क्षत्रिय वंश का बताया गया, विष्णु भक्त "आदिवराह"। कोई गुर्जर का जिक्र नहीं!
दौलतपुरा-दौसा शिलालेख: उनके विस्तार और विजयों का वर्णन, रघुवंशी राजपूत परंपरा से जुड़ा।
राजतरंगिणी (कल्हण): प्रतिहारों को उत्तरी भारत के प्रमुख क्षत्रिय शासक कहा।
इतिहासकार दशरथ शर्मा और आरसी मजुमदार की किताबें: "गुर्जर-प्रतिहार" में "गुर्जर" भौगोलिक है, राजपूत क्षत्रिय वंश ही मूल। 19वीं सदी की जनगणना में भी गुर्जर अलग समुदाय!
ये लोग राजनीतिक वोटबैंक के लिए इतिहास चुरा रहे हैं। यूपी, एमपी, हरियाणा—हर जगह ये विवाद भड़काते हैं, लेकिन सत्य एक है: मिहिर भोज राजपूत हैं, गुर्जर नहीं! राजपूत समाज की चुप्पी अब बर्दाश्त नहीं। हमारी विरासत पर डाका डालने वालों को जवाब दो!
राजस्थान सरकार से मांग:
प्रतिमा पर "गुर्जर" हटाओ, "राजपूत प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज" लिखो।
ASI जैसी निष्पक्ष जांच कराओ, ताकि सच्चाई सामने आए।
ऐसे आयोजनों पर रोक लगाओ, जो सामाजिक सद्भाव तोड़ें।
राजपूत भाइयों, जागो! अपनी धरोहर बचाओ। शेयर करो, आवाज उठाओ—जय राजपूताना! जय श्री राम! 🚩🦁
✍️Team Rajput of भारत ✊ 🚩
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योद्धा के लिए शस्त्र केवल हथियार नहीं, वे उसकी विरासत और धरोहर हैं। ये शस्त्र सम्मान के रक्षक, धर्म के प्रहरी और पराक्रम के अमर प्रतीक बनकर हर युग में वीरता की ज्योति प्रज्वलित करते आए हैं।
शस्त्र पूजन के इस पावन अवसर पर हम इन दिव्य शस्त्रों को नमन करते हुए अपने पूर्वजों की अदम्य वीरता, उनके बलिदान और मातृभूमि की रक्षा हेतु रची गई गौरवगाथाओं को स्मरण करते हैं।
ये शस्त्र केवल धरोहर नहीं, बल्कि रक्त और त्याग से पावन हुई हमारी अमर विरासत हैं—वंश दर वंश शौर्य और साहस की गवाही देती हुई।
यह परंपरा हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है और यह संकल्प दृढ़ करती है कि मेवाड़ की आत्मा, उसकी गौरवमयी परंपरा और अमर वंशावली युगों-युगों तक अजेय और अमर बनी रहेगी।
To a warrior, weapons are guardians of honour, protectors of dharma, and sacred heirs of a warrior’s legacy.
In Shastra Poojan, we bow before these weapons and honour the courage of our ancestors, the sacrifices they made, and the battles they fought to protect our motherland.
These blades have stood by our forefathers through blood, sweat, and sacrifice, becoming more than heirlooms—they are our living testaments of valour.
From generation to generation, they bind us to our roots, reminding us that the spirit of Mewar will remain eternal.
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महाकाव्य ‘‘क्षत्राणी दुर्गावती’’ का विहगंम विश्लेषण
वीरांगना रानी दुर्गावती के बलिदान को शत्-शत् नमन !
बाँदा , उत्तर प्रदेश के बबेरू तहसील निवासी अध्यापक कवि श्रीयुत केशव सिंह दिखित ‘विमल’ द्वारा रचित महाकाव्य ‘‘क्षत्राणी दुर्गावती’’ वर्ष 2003 में प्रकाशित हुआ था, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि न तो इस महाकाव्य की व्यापक चर्चा हुई और न ही इस महाकाव्य की नायिका रानी दुर्गावती की। कौन थी रानी दुर्गावती? रानी दुर्गावती चन्देलवंश के अन्तिम राजा कीर्ति सिंह की पुत्राी थी और कीर्ति सिंह ‘‘कालिंजर’’ ;बाँदाद्ध के राजा थे। रानी दुर्गावती का इतना परिचय ही यदि पर्याप्त होता तो उसे नायिका बनाकर किसी महाकाव्य की रचना की क्या आवश्यकता थी?
‘‘ध्ंस गयी वैरियों में बढ़कर, वह ध्ू-ध्ू जलती सी ज्वाला।
बन गयी देवि दुर्गा पूरी, दुर्गा ही जैसी विकराला।।’’
ध्न्य हैं, वन्दनीय है-श्लाघनीय हैं तथा भारत के गौरव हैं- कवि केशव सिंह दिखित जिन्होंने ‘‘क्षत्राणी दुर्गावती’’ जैसे कालजयी महाकाव्य की रचना करके भारत के शौर्य एवं गौरव के इतिहास के उफपर अतुलनीय उपकार किया है। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि – ‘‘इतिहास सदैव उन्होंने ही रचा है, जिनकी शौर्य गाथा लिखने को इतिहास के पास समय नहीं था।’’ कवि केशव सिंह ने इतिहास को शर्मिन्दा होने से बचाया है। इसलिये भी वे अभिनन्दन और सम्मान के पात्रा है।
रानी दुर्गावती विश्व इतिहास में असाधरण, अतुलनीय अपराजेय, आत्मबलिदानी अकेली वीरागंना है जिसके शौर्य एवं पराक्रम की चर्चा राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप से होना चाहिये। रानी दुर्गावती की गौरव गाथा राष्ट्र के समग्र पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से होना चाहिए।
प्रस्तुत महाकाव्य ‘‘क्षत्राणी दुर्गावती’’ में कुल 13 सर्ग है। महाकाव्य छन्द एवं वीर रस प्रधन है। आवश्यकतानुसार श्रंगार, रौद्र, करूण तथा शान्त रस भी सहायक हैं। अलंकार, नाद सौंदर्य, प्रकृति का मानवीयकरण तथा सरल-सहज खड़ी बोली इस महाकाव्य के आभूषण हैं।
महाकाव्य में नायिका रानी दुर्गावती का परिचय ही एक विस्पफोट के साथ होता है- प्रथम सर्ग की इन पंक्तियों में -‘‘थी वहीं कहीं तो क्षत्राणीऋ जो दुर्गावती कहाती थी। चन्देल कुमारी थी दुर्गाऋ रण में दुर्गा बन जाती थी।। छोटा वन राज्य मिला उसकोऋ अकबर को सबक सिखाया था। उसने रजपूती पानी काऋ अद्भुत इतिहास रचाया था।।’’ उस नारी रत्न, रत्न कुल रत्ना नेऋ क्षत्रिय कुल लाज बचाया था। लड़कर साम्राज्यवादियों सेऋ अद्भुत इतिहास बनाया था।’’ और दुर्भाग्य यह है कि अद्भुत इतिहास बनाने वाली वीरागंना लगभग 500 वर्षाे तक इतिहास की क्रूरता और उपेक्षा का शिकार रही। यद्यपि रानी दुर्गावती स्वयं अद्वितीय शिकारी थी, जिसकी चर्चा हम अलग से करेंगे। अचानक कवि केशव सिंह को मानो नियति और प्रकृति ने पकड़कर झकझोरा और रानी दुर्गावती की गौरव-गाथा को सघन अंधेर से निकाल कर प्रकाश में लाने को प्रेरित कियाः-
‘‘थे अन्यायी इतिहासकारऋ लिख दिया अन्यथा विष बोया। पावन चरित्रा उस बाला काऋ था काल कुहासे में सोया।। लाने उपेक्षिता को आगेऋ मैं चला नियति से ही प्रेरा। बन जाय अमर नायिका वहऋ पावन हो महाकाव्य मेरा।।’’
घोड़े हमारे वीर योद्धाओं के सच्चे साथी रहे हैं। निष्ठा, साहस और शक्ति के प्रतीक।
भगवान विष्णु के हयग्रीव अवतार, जिन्होंने वेदों की पुनर्स्थापना की, से लेकर महाराणा प्रताप और उनके प्रिय चेतक के अमर प्रेम तक। इतिहास इस पवित्र बंधन को सदैव स्मरण करता है।
दशहरे के पावन अवसर पर अश्व पूजन की यह शाश्वत परंपरा हमारी मेवाड़ी संस्कृति में घोड़ों के महत्व और उनके प्रति हमारी गहन श्रद्धा को अभिव्यक्त करती है।
आपको घोड़ों की कौन-सी विशेषता सबसे अद्भुत लगती है?
Horses were great companions to our warriors and a symbol of loyalty, courage, and strength.
From Lord Vishnu’s incarnation as Hayagriva, who restored the Vedas, to Maharana Pratap’s immortal bond with Chetak, history reminds us of this sacred connection.
On Dussehra, we perform the timeless tradition of Ashwa Poojan, honouring their importance in our Mewari culture.
What do you like about Horses?
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माननीय राजस्थान पुलिस एवं जिला प्रशासन,
@RajPoliceHelp@PoliceRajasthan
मेरा आपसे निवेदन है कि प्रतापगढ़ में होने जा रहे इस मूर्ति अनावरण को गंभीरता से लिया जाए और तत्काल प्रभाव से रोका जाए।
पिछले कुछ वर्षों में ऐसे ही मूर्ति अनावरण कार्यक्रमों के कारण कई राज्यों में सामाजिक तनाव और हिंसा की घटनाएँ सामने आई हैं —
1.4 वर्ष पहले उत्तर प्रदेश के दादरी में माहौल बिगड़ा था।
2.2 वर्ष बाद मध्य प्रदेश के ग्वालियर में भी महापुरुषों की मूर्ति को लेकर विवाद हुआ।
3.पिछले वर्ष हरियाणा के कैथल में भी इसी तरह का तनाव फैला।
4.और अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के मेरठ में गुज्जर समाज द्वारा लगाए गए बोर्ड्स पर कार्रवाई के बाद पुलिस पर पत्थरबाज़ी की घटना हुई।
वर्तमान में प्रतापगढ़ में भी वैसा ही माहौल बन रहा है। यदि समय रहते रोकथाम नहीं की गई, तो दोनों समाजों के युवा आमने-सामने आ सकते हैं, जिससे न केवल कानून-व्यवस्था बिगड़ेगी, बल्कि युवाओं का भविष्य भी प्रभावित होगा।
इसलिए मेरा प्रशासन से विनम्र परंतु गंभीर आग्रह है कि इस मूर्ति अनावरण कार्यक्रम को तत्काल रोका जाए, ताकि जिले की शांति और सौहार्द बना रहे।
साथ ही, मेरे समाज के सभी संगठन इस विषय को गंभीरता से लें, और संबंधित SDM व थाना स्तर पर ज्ञापन देकर इस अनावरण के विरोध में औपचारिक आपत्ति दर्ज कराएं।
यदि प्रशासन इस विषय को अनदेखा करता है, तो आगामी स्थिति की पूर्ण ज़िम्मेदारी प्रशासन की होगी।
@KotaPolice@BikanerPolice
जब राजपूत खुद को प्राचीन क्षत्रियो से जोड़ता है तब इस दावे का खंडन करने के लिए सबसे आगे बाभन समुदाय के लोग आते हुए दिखते है। लेकिन अगर कोई अन्य हिन्दू समुदाय खुद को क्षत्रिय होने का दावा करता है तो बाभन ही उनका सबसे ज्यादा समर्थन करते दिखते है। क्यों ?
जो थोड़ा भी जानकार बाभन है उसको भलीभांति मालूम है कि राजपूत ही प्राचीन क्षत्रिय है। लेकिन उन्हें ये भी पता है कि अगर राजपूतों के प्राचीन क्षत्रिय होने के दावे को एकबार सार्वजनिक स्वीकार्यता मिल गई तो इनको कैंसिल करना बहुत मुश्किल होगा सदियों तक षडयंत्र करना होगा।
लेकिन अगर किसी अन्य समुदाय को प्राचीन क्षत्रियो का वंशज होना मान लिया गया तो उनके दावे को खारिज करना बहुत आसान होगा। वो तब तक ही क्षत्रिय बन सकेंगें जबतक वो बाभनो के हिसाब से चलेंगें बाभनो के हित की बाते करेंगें बाभनो को खुद से ऊंचा मानेंगें।
जाटों में राजपूत गोत्रों की उत्पत्ति
यह एक ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय तथ्य है कि जाट समुदाय में कई गोत्रों का संबंध राजपूत वंशों से मिलता है।
यह दावा विभिन्न ऐतिहासिक दस्तावेज़ों, जैसे गजेटियर्स, जनगणना रिपोर्टों और मौखिक परंपराओं से समर्थित है। इन स्रोतों के अनुसार, यह संबंध मुख्यतः दो प्रमुख कारणों से स्थापित हुआ है:
1. अंतर्विवाह और सामाजिक बहिष्करण (Intermarriage and Social Exclusion)
ऐतिहासिक रूप से, राजपूत समाज में जातिगत शुद्धता (caste purity) को बहुत महत्व दिया जाता था।
यदि कोई राजपूत पुरुष किसी निम्न जाति की स्त्री से विवाह करता था या संबंध बनाता था, तो उस संबंध से पैदा हुए बच्चे को अक्सर राजपूत समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता था।
इस तरह के बच्चों को राजपूत समुदाय में स्वीकार नहीं किया जाता था, जिसके कारण वे अक्सर अन्य समुदायों में शामिल हो जाते थे, जिनमें जाट समुदाय प्रमुख था।
जाट समुदाय में सामाजिक संरचना अधिक लचीली थी, जिसने इन लोगों को अपने गोत्रों के साथ समाहित होने की अनुमति दी।
इस तरह, राजपूत वंशों जैसे तोमर (Tomar), पंवार (Panwar), दहिया (Dahiya), चौहान (Chauhan), गहलोत (Gehlot), भाटी (Bhati), और जादोन (Jadon)-> सिनसिनवार (Sinsinwar) आदि के गोत्र जाटों में पाए जाने लगे। उनके वंशज आज भी इन गोत्रों का उपयोग करते हैं, जो उनके मूल राजपूत संबंध को दर्शाता है।
2. सामाजिक गतिशीलता और क्षेत्र विस्तार (Social Mobility and Regional Expansion)
कुछ मामलों में, राजपूतों के छोटे समूह या व्यक्ति जो अपनी स्थिति खो चुके थे या संघर्ष में पराजित हो गए थे, उन्होंने अपनी पहचान बदलकर जाट समुदाय में शरण ली। समय के साथ, इन समूहों को जाटों के रूप में जाना जाने लगा, लेकिन उन्होंने अपने मूल राजपूत गोत्रों को बनाए रखा। यह प्रक्रिया विशेष रूप से उन क्षेत्रों में हुई जहां जाटों का राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव बढ़ रहा था।
उदाहरण और दस्तावेजी साक्ष्य (Examples and Documentary Evidence)
संलग्न दस्तावेज़ और छवियां इस बात का प्रमाण देती हैं:
* 1883 की पंजाब जनगणना रिपोर्ट (Punjab Census Report of 1883): इस रिपोर्ट में "पंजाब कास्ट्स" (Panjab Castes) नामक अध्याय में सियाल (Sial) और रंझा (Ranjha) जैसे कबीलों का उल्लेख है।
इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि:
* सियाल (Sial) मूल रूप से पंवार राजपूतों (Panwar Rajputs) की एक उप-शाखा हैं। * रंझा (Ranjha) मूल रूप से भाटी राजपूतों (Bhati Rajputs) की एक उप-शाखा हैं।
* जनसंख्या डेटा (Population Data): जनगणना के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि 19वीं सदी के अंत तक, सियाल और रंझा दोनों ही राजपूत और जाट दोनों समुदायों में मौजूद थे, जो उनके गोत्र के साझा मूल को दर्शाता है। संलग्न मानचित्र और सारणी दिखाती है कि इन समूहों की आबादी पाकिस्तान और भारत के कुछ हिस्सों में कैसे वितरित है।
यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि इन ऐतिहासिक तथ्यों को स्वीकार करना किसी भी समुदाय को नीचा दिखाना नहीं है, बल्कि यह केवल सामाजिक और ऐतिहासिक विकास को समझना है। यह दिखाता है कि कैसे समाज में गोत्र और पहचान समय के साथ बदलते और विकसित होते रहते हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
इस प्रकार, कई ऐतिहासिक और दस्तावेजी प्रमाण मौजूद हैं जो दर्शाते हैं कि जाटों में पाए जाने वाले 80-90% गोत्रों का मूल राजपूतों से संबंधित है। यह संबंध मुख्यतः सामाजिक बहिष्करण और अंतर्विवाह के कारण स्थापित हुआ। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे विभिन्न ऐतिहासिक जनगणना रिपोर्टों और गजेटियर्स में भी दर्ज किया गया है। यह इस बात का सबूत है कि समाज में जाति और गोत्र की पहचान समय के साथ गतिशील रही है।
बार-बार एक ही झूठा और खारिज किया गया स्निपेट इस्तेमाल करने से तू “कूल” नहीं बन जाएगा, बेटे 😂
ये सारी बातें किसी भी प्रमाणिक रिकॉर्ड पर आधारित नहीं हैं, बस कुछ अंग्रेजों के मनगढ़ंत अनुमान हैं जिनका कोई संदर्भ या प्रमाण मौजूद नहीं।
हमारे पास तो शिलालेख, साहित्य, चारण-बर्दिक प्रमाण, हस्तलिखित पांडुलिपियाँ, वंशावली और प्राचीन बसावटों के ठोस साक्ष्य हैं।
अगर ब्रिटिश काल में लिखी हर चीज़ को रद्द भी कर दें, तो तेरी जाति के 80-90% गोत्र इतिहास से ही गायब हो जाएंगे।
और हाँ,
“अरार” एक मुसलमान जाट वंश है जो मोंटगोमरी ज़िले (वर्तमान पाकिस्तान) की दीपालपुर तहसील में पाया जाता है।
वे खुद को मुगलवंशी जाट बताते हैं — यानी कि अपनी मूल पहचान भी तय नहीं कर पाए।
लाहौर हाईकोर्ट के 1936 के फैसले में साफ़ लिखा गया है कि “जाट शुद्ध शूद्र वर्ग” में आते हैं।
(मूल निर्णय प्रति उपलब्ध है, न कि तुम्हारे जैसे झूठे दावे।)
तो बेटा,
अब ज़्यादा मुँह मत खोल — इतिहास और प्रमाण दोनों नंगा कर देंगे।
पिता दो बार के मुख्यमंत्री रहे, ख़ुद मंत्री रहे फिर भी किसी ने जयवर्धन सिंह को दशहरा की शुभकामना दी तो झुक कर प्रणाम किया।
@digvijaya_28 के संस्कार हर बारीक चीज़ में झलकते है।