1. जैसाकि सर्वविदित है कि बी.एस.पी. ने यूपी में अपनी सरकार के दौरान पुलिस व पंचायती राज विभाग में लगभग सवादो लाख नये सरकारी पद सृजित करके तथा नौकरियों की भर्ती पर लगी रोक को भी हटाकर सर्वसमाज के कई लाख लोगों की सरकारी नौकरियों में बहाली की और फिर उसके बाद सरकार में ना रहने पर काफी लम्बे समय से देश में व ख़ासकर यूपी, उत्तराखण्ड व पंजाब अदि राज्यों में व्याप्त ज़बरदस्त महंगाई, अति-ग़रीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, बदतर स्वास्थ्य व्यवस्था, पिछड़ापन एवं उनके मजबूरी के पलायन, महिला असुरक्षा, पेपरलीक व भ्रष्टाचार आदि से त्रस्त लोगों के दुखी जीवन जैसे ज्वलन्त मुद्दों एवं गंभीर समस्याओं के निदान हेतु प्रभावी कदम उठाने की माँग केन्द्र व राज्य सरकारों से बार-बार करती रही है, लेकिन सभी सरकारें, पूर्व की कांग्रेसी सरकारों की तरह ही, ज़्यादातर मामलों में उदासीन व लापरवाह ही बनी हुई हैं, जो देश के बिगड़ते हुये राजनीतिक, आर्थिक, संसदीय व सामाजिक हालात के मद्देनज़र अति-दुखद एवं अत्यन्त चिन्तनीय।
2. और अब जबकि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नाम से विशेषकर बेरोज़गारी व अंधकार भविष्य आदि से पीड़ित व आहत शिक्षित युवा-युवतियों ने ख़ासकर दिल्ली में जंतर मंतर के 36 दिन तक चले अपने बहु-चर्चित आन्दोलन के ज़रिये इन ज्वलन्त मुद्दों को वास्तव में राष्ट्रीय महत्व का विशेष व गंभीर चर्चा का मुद्दा बना दिया है और जिसको लेकर देश के शिक्षा मंत्री को भी अपनी कुर्सी गवानी पड़ी है, केन्द्र व राज्य सरकारों को देश के क़रीब सवासौ करोड़ ग़रीबों, श्रमिकों, युवाओं, महिलाओं व अन्य मेहनतकश लोगों तथा ख़ासकर बेरोज़गारी की मार से पीड़ित लाखों परिवारों की वास्तविक चिन्ता, सब कुछ भुलाकर, तत्काल शुरू कर देनी चाहिये।
3. ऐसे में, अन्य बातों के अलावा, सरकारी नौकरियों पर खा़स ध्यान देने की ज़रूरत है और इस क्रम में राष्ट्रीय सम्पत्तियों को निजी हाथों में बेचना बंद करके तथा सभी सरकारी विभागों में रिक्त पड़े लाखों पदों पर पेपरलीक व भ्रष्टाचार-मुक्त समयबद्ध भर्तियाँ तत्काल प्रारम्भ करके समस्या के फौरन निदान के प्रति गंभीर प्रयास शुरू कर दें तो यह उचित होगा।
4. इस प्रकार एक परिवार में अगर एक को भी सरकारी नौकरी मिल गयी तो लाखों परिवारों का सीधे तौर पर भला होगा और साथ ही इससे एससी, एसटी व ओबीसी समाज को भी वह सुरक्षा मिल पायेगी जो आरक्षण के काफी हद तक निष्प्रभावी व निष्क्रिय बना दिये जाने के कारण, संविधान प्रदत्त आत्म-सम्मान की ज़िन्दगी जीने के बजाय, ग़रीबी व लाचारी का त्रस्त जीवन जीने को ही मजबूर हैं।
5. कुल मिलाकर, सभी सरकारों को हर हाल में मुनाफाखोरी/लाभ कमाने वाली व्यापारिक सोच/प्रवृति को त्याग कर संविधान की सही मानवतावादी व कल्याणकारी नीति एवं सिद्धान्त को पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ अमल करके आगे बढ़ाना होगा, जो ’हर हाथ को काम’ देने वाली व्यापक देश व जनहित में लाख दुखों की एक दवा है, यही सभी सरकारों से अपील।
6. इसके साथ ही, जंतर मंतर में आन्दोलित छात्र-छात्राओं व बेरोजगार युवाओं आदि के मुद्दों को लेकर संसद के वर्तमान सत्र में अब तक लगातार जारी गतिरोध को भी समाप्त किया जाना ज़रूरी है, ताकि बिना समुचित बहस/चर्चा के सरकारी विधेयकों को पारित होकर कानून बनने की प्रक्रिया पर विराम लग सके।
दगड़ू की सरकारी नौकरी लग गयी। आरक्षित शीट की आखरी वाली शीट पर सफलतापूर्वक कब्जा कर लिया। चलो दगड़ू की इस सफलता पर उनका साक्षात्कार हो जाये।
विकास : जय भीम दगड़ू जी।
दगड़ू : आइए विकास जी।
विकास : आपने आखिरकार सरकारी नौकरी प्राप्त कर ही ली।
दगड़ू : भगवान ने मेरी सुन ही ली। मेरी माँ ने सभी व्रत रखें, पिता धार्मिक स्थलों पर गए। पिछले साल में कांवड़ लेकर गया। आखिरकार सुन ही ली। मुझे नौकरी मिल ही गयी।
विकास : मतलब बिना मेहनत करे, ऐसा करने पर नौकरी लग जाएगी?
दगड़ू : अरे नही मेहनत के साथ साथ यह भी जरूरी है। बल्कि यह ज्यादा जरूरी है।।
विकास : आपका आरक्षित शीट पर और उसमे भी अंतिम शीट पर नम्बर आया है। यह आरक्षित शीट आप जिस समाज से है उंसके प्रतिशत के कारण मिली है। समाज ने सरकार को कहा कि हमारा इतना प्रतिशत है, यह हमें दो, इसपर हम अपने लोग भेजेंगे। इसलिए समाज ने आपको एक तरह से इस नौकरी पर अपने प्रतिनिधि के तौर पर भेजा है।।समाज के प्रति आप क्या करेंगे?
दगड़ू : सबसे पहले धार्मिक स्थल खुलवाऊंगा। उसे भव्य रूप दुँगा। इससे बड़ा और कौन सा सामाजिक कार्य है।। पूरे दिन गुणगान करेंगे। पुण्य मिलेगा ।
विकास : बाबा साहब के प्रति कुछ?
दगड़ू : 14 अप्रैल को 500 रुपया चन्दा दे दूँगा। चलिए छोड़िए। मुझे देर हो रही हैं काफी जरूरी जगह जाना है। हमारे परिवार के धार्मिक रहनुमा के पास जाना है। उनका आशीर्वाद सबसे जरूरी है। उन्ही के आशीर्वाद से नौकरी लगी है।
विकास : में भी चलूं?
दगड़ू : चलिए। आपको भी पुण्य मिलेगा।
पहुच गए धार्मिक स्थल पर। धार्मिक रहनुमा कंही जा रहे थे। कई व्यक्ति साथ मे थे। दगड़ू आते ही पैरों में उल्टा लौटकर प्रणाम करने लगा।
दगड़ू : महाराज । आपके कारण नौकरी लग गयी। अपने चरणों मे जगह स्वीकार कीजिये।
धार्मिक व्यक्ति : हाँ हाँ ठीक है। थोड़ा दूर रहकर पैरों में गिरा करो। मुझे जल्दी है में जा रहा हूँ। देखा न मेरे समाज वाले मेरा इंतजार कर रहे है।
दगड़ू : महाराज आशीर्वाद की कृपा करें। यह महंगे गिफ्ट, फल और 1 लाख रुपया दक्षिणा का स्वीकार करे।
धार्मिक व्यक्ति : अपने चेले को आवाज लगाते हुए। यह फल वग़ैरह अच्छी तरह धोकर व गिफ्ट को अच्छी तरह साफ करके अंदर रख दो। और हाँ (धीरे से कहते हुए) यह "एक लाख रुपया;
"हम जँहा आरक्षण हटाओ मुहिम के कार्यक्रम में जा रहे है वँहा कार्यक्रम संचालकों को आरक्षण हटाने के लिए दान दे देना"
दगड़ू : महाराज आपने इतना कीमती समय दिया। में भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि जिस कार्य से आप जा रहे है वो सफल रहे।
धार्मिक व्यक्ति का चेला : विकास को कहते हुए की। काहे पीछे खड़े हो। सामने आकर महाराज के चरणों मे गिरकर आशीर्वाद लो । कल्याण हो जाएगा तुम्हारा।
विकास : में मनोबलयुक्त अम्बेडकरवादी हूँ।
यह बात सुनते ही धार्मिक व्यक्ति व उसके चेले खिसक लिए।
वैसे आपकी नजर मे बहुजन समाज की समस्या का धार्मिक रहनुमा व दगड़ू में से कौन जिम्मेदार है?
मेरी नजर में;
"दगड़ू जिम्मेदार है"
जय भीम। जय भारत।
विकास कुमार जाटव
रिजर्वेशन पर चर्चा।
अब ऐसी बहस में पड़ने पर कुछ एससी के जवाब इस प्रकार थे;
1.हम लोग फलाना निम्न स्तर के कार्य करते है।
2.जातिया है इसलिए आरक्षण है। जातिया खत्म करो
3.हम लोगो को आज भी घोड़ी पर चढ़ने नही दिया जाता।
4.हम लोगो के साथ भेदभाव होता है।
5.हम लोगो ने सैकड़ो सालों से शोषण का दंश झेला है।।
6.हम लोगो में अधिकतर गरीबी है।।
7.मन्दिर में भी फलाना ढिलकाना आरक्षण है।
ऐसे ही कई थे।
मेरा उत्तर यह था कि;
"सीधी बात नो बकवास। मुझे अपने प्रतिशत के अनुसार संसाधनों व सरकारी सेक्टर में प्रतिनिधित्व जिसे सीधी भाषा मे हिस्सा कहते है, चाहिए। देश है। हम देश के नागरिक है। देश मे जातीयो के कारण अलग अलग वर्ग बन गए इसलिए हर वर्ग को हिस्सेदारी चाहिए। हमारा हिस्सा दो, उसे हम कैसे आपस में बांटेंगे हम देख लेंगे। तुम अपना देखो"
इंहा चर्चा खत्म हो जाती है। मनुवादी आपको;
1.अमीरी गरीबी में घण्टो उलझाकर चर्चा करेगा ।
2.भेदभाव पे घण्टो बताएगा कि अब नही होता है।
3.धर्म पर घण्टो समझायेगा की जो अच्छे कर्म करेगा, उच्च वर्ण में चला जाएगा, हालाँकि एक भी उदाहरण नही देगा की कितने गए।
4.घोड़ा घोड़ी, मूंछे रखने व अन्य पर आपको घण्टो उलझाकर चर्चा करेगा।
5.वो आपको देश विकास फलाना ढिलकाना पर लेकर जाकर घण्टो चर्चा करेगा।
6.वो आपको बकैती की सीमा पार कर करके उलझाकर रखेगा जैसे इस ट्वीट में;
"मर्द होने का प्रमाण आरक्षण नह लेना काटजू बता रहे है। कोई सेंस है इस बात का। अजीब है न। पुरुषवादी सोच से ग्रस्त बात है"
इसलिए चर्चा करनी ही नही। उलझना ही नही।।सीधा कहो कि;
"संसाधनों व सरकारी सेक्टर में प्रतिशत के आधार पर प्रतिनिधित्व अथार्त हिस्सा चाहिए। सभी को दो। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य सभी को दो। उन्हें नही चाहिए, न लो। लेकिन दुसरो को वो रोक नही सकता है, उंसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। अपना देखो। हमारा नही"
इंहा संसाधन अथार्त;
"जल, जंगल, जमीन का दोहन जो कम्पनियां करती है, उसमे हिस्सा चाहिए"
जैसे ही आप यह कहेंगे की "हम अपना प्रतिशत के अनुसार हिस्सा लेंगे" उंसके सभी टॉवर की तरंगें गायब हो लेगी। गाँधी और बाबा साहब में यह ही अंतर था;
1.बाबा साहब = हमारा वर्ण व्यवस्था से कुछ लेना देना नही और न ही ब्राह्मण धर्म से। हम उसी प्रकार अलग स्टेटस रखते है जैसे सिख, मुस्लिम, पारसी। इसलिए इन्हें जब अलग निर्वाचन मण्डल दिया जा रहा है। हमे भी दो।
बाबा साहब ने इंहा एक बार भी नही कहा कि हम गरीब है, शोषण हो रहा है। सीधा कहा कि हम ब्राह्मण धर्म से अलग है। हमे इनसे अलग मानकर सिख, मुस्लिम, पारसी की तरह हिस्सेदारी दो।।
2.गांधी = एससी गरीब है, पिछड़ गए है, ब्राह्मण धर्म का अटूट हिस्सा है, लेकिन निर्वाचन मण्डल नही देंगे हाँ रुंगे के रूप में आरक्षण ले लो।।
जबकिं हमने माँगा नही। ज़बरदस्ती गाँधी हमसे अलग निर्वाचन मण्डल छीनकर यह आरक्षण लेने को मजबूर किया।।
विकास कुमार जाटव
दलित युवाओं के खिलाफ बड़ी साजिश!
प्रिय साथियों, दलित समुदाय के लोग स्वभाव से बहुत भोले होते हैं। दुःख की बात यह है कि इसी सीधेपन का फ़ायदा उठाकर कुछ स्वार्थी तत्व उनकी भावनाओं को भड़काते हैं और उन्हें हिंसक आंदोलनों की आग में झोंक देते हैं।
ऐसे में, विरोधी ताकतों के बहकावे में आकर तुरंत भावुक हो जाने वाले समाज के नौजवानों को आज बहुत ठंडे दिमाग से जमीनी हकीकत को समझने की ज़रूरत है। चुनाव को मद्देनजर देखते हुए इस समय विरोधी पार्टियों का पूरा तंत्र सक्रिय हो चुका है। वे जानते हैं कि बहुजन समाज को सीधे हराना नामुमकिन है; इसीलिए वे हमारे ही समाज के कुछ महत्वाकांक्षी युवाओं और उग्र संगठनों को मोहरा बना रहे हैं। ये लोग बड़ी-बड़ी बातें करके बसपा के नाम पर सहानुभूति बटोरते हैं और आंदोलन के बहाने भीड़ इकट्ठा करते हैं। फिर अपने पाले हुए हुड़दंगियों के ज़रिए माहौल को हिंसक बना देते हैं ताकि हमारे युवा सड़कों पर चक्का जाम व टकराव के आत्मघाती रास्ते पर धकेले जा सकें।
हमारे युवाओं के खिलाफ यह साज़िश कितनी गहरी है, इसे हम इन दो प्रमुख बिंदुओं के जरिए समझ सकते हैं।
1) युवाओं को मुकदमों के दलदल में धकेलना:
विरोधी चाहते हैं कि युवा आक्रोश में आकर कानून अपने हाथ में ले और पुलिस उन पर संगीन धाराएं ठोक दे। एक बार पुलिस रिकॉर्ड खराब हुआ, तो युवा का करियर, सरकारी नौकरी का सपना और परिवार की उम्मीदें हमेशा के लिए दम तोड़ देती हैं। बिना पुलिस NOC के न तो कैरेक्टर सर्टिफिकेट बनता है और न ही पासपोर्ट या सरकारी नियुक्तियां हो पाती हैं। फिर इस एक NOC के लिए हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक के चक्कर काटने पड़ते हैं।
परंतु इस हुड़दंग में फंसकर यदि कोई युवा जेल चला गया, तो पूरा घर बर्बाद हो जाता है। उन्हें पुलिस, प्रशासन, नेताओं और वकीलों के पीछे पीछे घूमते रहते हैं। सालों साल तक तारीख पर तारीख चलती रहती है। अगर आपको यकीन न हो तो एक बार सहारनपुर हिंसा, प्रयागराज हिंसा एवं अन्य जगहों पर पीड़ित युवाओं से पूछ लीजिए। मनुवादी सरकार एवं प्रशासन तो बस मौका ढूंढती है कि किस तरह वे दलितों को कुचल सकें। विरोधियों की असली चाल ही यही है कि बहुजन युवा पढ़-लिखकर अधिकारी बनने के बजाय कोर्ट-कचहरी और तारीखों के चक्कर काटता रहे, ताकि वे जीवनभर उन्हें अपनी पार्टियों का झंडा ढोने वाला अदना कार्यकर्ता बनाकर रख सकें।
2) 'मास्टर चाबी' से ध्यान भटकाना:
बाबासाहेब आम्बेडकर, मान्यवर कांशीराम साहब और आदरणीय बहन कुमारी मायावती जी ने हमें हमेशा यही सिखाया कि सड़कों पर लाठियां खाना हमारी नियति नहीं है। हमारी असली मंजिल शासन करना यानी 'हुक्मरान जमात' बनना है। ये बरसाती मेंढक और उग्र संगठन हमारे युवाओं को इसी मुख्य राजनीतिक लड़ाई से भटकाना चाहते हैं, ताकि हम सिर्फ सड़कों के विवादों में उलझे रहें और सत्ता की उस 'मास्टर चाबी' तक कभी न पहुँच पाएं जिससे तरक्की के बंद दरवाज़े खुलते हैं।
आज जो लोग बसपा की नीतियों पर उंगली उठाते हैं, उन्हें इतिहास देखना चाहिए। बहन जी के चार बार के शासनकाल में यूपी में 'क़ानून द्वारा क़ानून का राज' था। उस दौर में किसी बड़े से बड़े जातिवादी अधिकारी या बाहुबली गुंडे की इतनी हैसियत नहीं थी कि वह दलितों के आत्मसम्मान को ठेस भी पहुँचा सके। बहन जी कानून के मामले में इतनी सख्त थीं कि उन्होंने गुंडागर्दी करने पर अपनी ही पार्टी के तत्कालीन सांसद उमाकांत यादव को मुख्यमंत्री आवास पर बुलाकर वहीं से गिरफ्तार करवा दिया था।
रोहित वेमुला को न्याय दिलाने के लिए जब बहन जी ने संसद भवन में हुंकार भरी थी, तो पूरी संसद हिल गई थी। यही नहीं, जब सहारनपुर हिंसा में दलित पीड़ितों की आवाज़ को दबाने की कोशिश की गई, तो बहन जी ने बाबासाहेब के पदचिन्हों पर चलते हुए राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने साफ कहा था कि जिस सदन में मेरे समाज की बात न सुनी जाए, वहाँ रहने का कोई फायदा नहीं। इसे कहते हैं सिद्धांतों और आत्मसम्मान की असली लड़ाई!
इसलिए, साथियों! जोश और जुनून अपनी जगह बिल्कुल सही हैं, लेकिन याद रखिए कि जोश में होश खोने की गलती आत्मघाती साबित होती है। विरोधियों के इस विषैले षड्यंत्र को पहचानिए। मासूमों के भविष्य की कतरन पर अपनी राजनीतिक इमारत बनाने वाले इन स्वयंभू नेताओं के बहकावे में आकर अपनी जिंदगी और अपने परिवार का भविष्य दांव पर मत लगाइए। समाज की समस्याओं का असली समाधान खोखली डायलॉगबाज़ी या सड़कों पर बवाल करना नहीं है, बल्कि एकजुट होकर एक सामाजिक एवं राजनीतिक ताकत बनना है।
- सूरज कुमार बौद्ध (फाउंडर- मिशन आम्बेडकर)
युवाओं के नाम बहन जी का संदेश!
मेरठ की घटना का संज्ञान लेते हुए माननीया बहन जी ने आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जहाँ उन्होंने दलित समुदाय के युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि हमें बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर के दिखाए रास्ते पर चलना चाहिए। अपने ऊपर होने वाले किसी भी जुल्म-ज्यादती के विरुद्ध लड़ाई, कानून को हाथ में लेकर नहीं, बल्कि कानून के दायरे में रहकर लड़नी चाहिए।
न्याय के नाम पर हिंसा, हंगामा या सड़क जाम जैसा बवाल करने से पीड़ितों को न्याय मिलने वाला नहीं है; बल्कि इससे समाज के लोगों की मुसीबतें और परेशानियां और अधिक बढ़ जाती हैं। बहन जी ने स्पष्ट कहा कि न्याय के लिए समाज को बाबासाहेब के लिखित संविधान के अनुसार चलना चाहिए और जिला न्यायालय, उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय सहित अन्य कानूनी तरीकों का सहारा लेना चाहिए।
अब इस पर चंद्रशेखर आज़ाद का कहना है कि कोर्ट-कचहरी से न्याय पाने में तो 10-10 साल लग जाएंगे, तब तक क्या हमारी बहन-बेटियों की इज्जत लुटती रहे और हम चुप बैठे रहें? दुनिया को छोड़िए, चंद्रशेखर आजाद पर खुद 36 मुकदमे दर्ज हैं। क्या उन्होंने अपने मामले में तत्काल इंसाफ दिलवा दिया? नहीं, क्योंकि कानून की प्रक्रिया के तहत सबको चलना ही पड़ता है।
चंद्रशेखर के इस बयान के बाद बहुत से लोग बहन जी को टारगेट कर रहे हैं। दरअसल, डायलॉगबाजी करने और नए लड़कों को खुश करने के लिए चंद्रशेखर का कहना सही लग सकता है, लेकिन आप ज़रा अपने विवेक का इस्तेमाल करके बताइए कि जिस भी घटना पर चंद्रशेखर जाते हैं, क्या वे उन परिवारों को तत्काल न्याय दिला पाते हैं? क्या वे कोई जज हैं जो ऑन-द-स्पॉट फैसला सुना देंगे? सहारनपुर, आजमगढ़, प्रयागराज, हरदोई, हाथरस... चंद्रशेखर आज़ाद ने इनमें से किस जगह पर तत्काल न्याय दिला दिया?
बहन जी ने चार-चार बार सरकार चलाई है, उन्हें अच्छी तरह पता है कि शासन और प्रशासन कैसे काम करता है। इसे छोड़िए, कोई भी व्यक्ति जो कानून की थोड़ी भी समझ रखता है, उसे पता होगा कि FIR होने के बाद पुलिस का इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर (IO) विवेचना करता है, चार्जशीट दाखिल होती है, फिर सालों तक कोर्ट में तारीख पर तारीख चलती है और तब जाकर कोई फैसला आता है। अब वहाँ चाहे चंद्रशेखर जाएं या राहुल गांधी, कोर्ट की न्यायिक प्रक्रिया में सालों-साल तो लगते ही हैं।
हाँ, यह अलग बात है कि यदि आप सत्ता में हैं, तो फास्ट-ट्रैक कोर्ट का गठन करके एक तय समय-सीमा के भीतर न्याय सुनिश्चित किया जा सकता है। पर इसके लिए तो सत्ता चाहिए! इसीलिए बहन जी ने समाज के युवाओं को संदेश दिया कि अगर अपने ऊपर हो रहे जुल्म-ज्यादती को हमेशा के लिए रोकना है, तो उन्हें केंद्र व राज्यों की राजनीतिक सत्ता की 'मास्टर चाबी' खुद अपने हाथों में लेनी होगी।
अब कुछ साथियों की यह भी नाराजगी है कि बहन जी ने मेरठ के SSP अविनाश पांडेय के खिलाफ सीधा कुछ क्यों नहीं बोला। देखो भाई, बहन जी चार बार देश के सबसे बड़े सूबे की मुख्यमंत्री रही हैं, उनका राजनीतिक कद बहुत बड़ा है। मुझे नहीं लगता कि उन्हें अविनाश पांडेय जैसे किसी अदने और गालीबाज़ अफसर का नाम लेकर अपने स्तर को नीचे गिराना चाहिए। वैसे भी आप बहन जी का ट्रैक रिकॉर्ड उठाकर देख लीजिए, वह भाषणबाज़ी नहीं करतीं, सीधा एक्शन लेती हैं। उनकी सरकार के दौरान IG, DIG और DGP रैंक के बड़े-बड़े अफसरों में इतनी हिम्मत नहीं होती थी कि वे कानून और संविधान को धता बता सकें, फिर अविनाश पांडेय की क्या बिसात! उसके लिए तो हम लोग ही काफी हैं।
बाकी, ऐसे जातिवादी अफसरों को बल सत्ता के संरक्षण से मिलता है। अतः अगर समाज सच में अविनाश पांडेय के कृत्य से आहत है, तो भाजपा सरकार को इसका जवाब अपने वोट से दीजिए। लोकतंत्र में असली और सबसे गहरी चोट 'वोट की चोट' ही होती है। कुल मिलाकर बात यह है कि बहन जी ने समाज के युवाओं को जो संदेश दिया है, उस पर गंभीरता से अमल करें। वह बहुजन समाज की असली संरक्षक और मार्गदर्शक हैं।
संविधान विरोधी ताकतें हमेशा बहुजन समाज को सड़कों पर उलझाकर उनके भविष्य को मुकदमों के दलदल में धकेलना चाहती हैं। भावुकता में आकर सड़कों पर हुड़दंग करने से केवल हमारे युवाओं का करियर बर्बाद होगा, न्याय नहीं मिलेगा। इसलिए, इस सामंती व्यवस्था को नेस्तनाबूद करने के लिए जोश के साथ होश रखिए और बहन जी के नेतृत्व में 'वोट की ताकत' से अपनी खुद की हुक्मरानी स्थापित कीजिए।
चंद्रशेखर की फटी शर्ट।
आज नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद का एक वीडियो वायरल है, जिसमें उनकी शर्ट फटी हुई है। दरअसल, वह उत्तराखंड के टिहरी में केतन के परिवार से मिलने जा रहे थे, जिसकी एक द्विज हिंदू लड़की से प्रेम करने पर हत्या कर दी गई थी।
प्रशासन ने उन्हें रास्ते में ही रोक दिया और इस धक्का-मुक्की में उनकी शर्ट फट गई। इसे देखकर दलित समाज के नए-नए लड़के इसे क्रांति समझ रहे हैं और सुबह से ही शोर मचा रहे हैं। अब इस कहानी का दूसरा पहलू समझिए।
चंद्रशेखर आजाद ने कल ही एक वीडियो बनाकर पोस्ट किया था कि वह उत्तराखंड के टिहरी में पीड़ित परिवार से मिलने आ रहे हैं। उन्होंने सरकार को हड़काते हुए कहा कि प्रशासन उन्हें रोके नहीं। अगर उन्हें रोका गया, तो वह सीधे मुख्यमंत्री आवास का घेराव करेंगे। अब ऐसा सुनते ही भोले-भाले लड़कों में जोश आ जाता है और वे चंद्रशेखर आजाद की रैली में हजारों की संख्या में इकट्ठा हो जाते हैं।
जाहिर सी बात है कि इस स्थिति में कोई भी सरकार सुरक्षा की दृष्टि से चंद्रशेखर को रोकेगी क्योंकि भीम आर्मी के युवाओं में कोई कैडर नहीं है। दरअसल, चंद्रशेखर आजाद स्वयं भी यही चाहते हैं, क्योंकि यही सब करके उन्हें प्रशासन से भिड़ने का मौका मिलता है। अब नए-नए लड़कों को यही तो चाहिए कि उनका नेता न्याय भले न दिलाए, बस साउथ के एक्टर्स की तरह धूम-धड़ाका करता रहे।
चंद्रशेखर आजाद तो चले आते हैं, लेकिन उनके हर आह्वान पर बुलाई गई भीड़ में सैकड़ों लड़कों पर एफआईआर हो जाती है। वे बेचारे सालों तक कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाते रहते हैं। अब चंद्रशेखर आजाद से मेरा सिंपल सा सवाल है:
जिन दलित परिवारों में किसी की हत्या हुई हो, लड़की का रेप हुआ हो, वे दर्द से विलख रहे हों, वहां हजारों की भीड़ लेकर हुड़दंग करना, "शेर आया-भालू आया" के नारे लगवाना और गाड़ी पर खड़े होकर हाथ हिलाते हुए एंट्री लेना शोभा देता है क्या? आप किसी परिवार के मातम में शामिल होने जा रहे हैं या उनके यहां बारात में ऑर्केस्ट्रा देखने जा रहे हैं?
अब तो आप सांसद हो गए हैं। पीड़ित परिवारों की लाश पर राजनीति करने की क्या जरूरत है? क्या जरूरत है कि आप किसी पीड़ित के यहां जाने से पहले ही युवाओं को इकठ्ठा होने का आह्वान कर देते हैं? मातम में परिवार से मिलने जा रहे हैं तो ये सब नौटंकी क्यों? आपकी वजह से गांव-गली के बगलबच्चा लड़के भी "आ रहा हूं फलाने तारीख को" जैसी नौटंकी करते हैं। अब आप सांसद हो गए हैं। रैली सार्वजनिक स्थानों पर की जाती है। मृतक परिवार के घरों पर नहीं। थोड़ा गंभीर बनिए। आप पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने जाते हैं, बेचारे समाज के लड़कों को आपके न्याय की लड़ाई लड़नी पड़ती है।
समाज के युवाओं और पीड़ित परिवारों के भविष्य और उनकी भावनाओं से मत खेलिए। जातिगत उत्पीड़न के मामलों में शांतिपूर्वक 2-4-10 गाड़ियां (जो भी आपको उचित लगे) लेकर जाइए और परिवार से मिलकर उन्हें संबल दीजिए। बेवजह पुलिस को ललकारने और हजारों युवाओं का जत्था लेकर पीड़ित के घर बारात ले जाने वाली ओछी हरकतें बंद कीजिए।
ट्विट्टर पर मेरी रिच एकाएक काफी कम हो गयी।। पहले औसत 15 हजार रहती थी।।
ऐसा क्यो?
जबकिं;
"फेसबुक पर एक लेख की औसत रिच 20 हजार व पूरे दिन में एक कि रिच सवा लाख से ऊपर पहुच जाती है।
"
ट्विट्टर पर ऐसा क्या हो गया। यह एकाएक गिरी।
वैसे जैसी ही गिरी अपने पुराने घर फ़ेसबुक पर ज्यादा समय बिताने लगे।
बहुजन व अम्बेडकरवादी संदेशों का प्रसार ही प्रथम व अंतिम उद्देश्य है।
विकास कुमार जाटव
जैसाकि सर्वविदित है कि बी.एस.पी. देश में ’बहुजन समाज’ व अपरकास्ट समाज के ग़रीब शोषित-पीड़ित व उपेक्षितों द्वारा, उनके संवैधानिक हक़ व न्याय आदि के लिये परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के बताये रास्तों पर चलने वाली ’सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय’ की सच्ची व ईमानदार अम्बेडकरवादी पार्टी है, जो दूसरी पार्टियों की तरह बड़े-बड़े पूंजीपतियों व धन्नासेठों के सहारे और उनके इशारे पर नहीं चलती है बल्कि अपने लोगों के ही तन, मन और धन के बलबूते पर चलती है, जो स्वाभाविक तौर पर संकीर्ण, जातिवादी, साम्प्रदायिक व पूंजीवादी ताक़तों को यह फुटी कौड़ी नहीं सुहाता है और इसी लिये वे समय-समय पर और ख़ासकर चुनाव के नज़दीक आने पर क़िस्म-क़िस्म के हथकण्डे इस्तेमाल करके बी.एस.पी. पार्टी व मूवमेन्ट को तथा उसके आयरनलेडी नेतृत्व को भी बदनाम करने में लगे रहते हैं।
इसी क्रम में मीडिया के एक वर्ग द्वारा दूसरी पार्टियों की चुनावी जुगाड़ आदि पर से लोगों का ध्यान बाँटने तथा उन पर पर्दा डालने के लिये बी.एस.पी. पार्टी उम्मीदवार के चयन को लेकर सवालिया निशान खड़े करते रहते हैं, जबकि बी.एस.पी. को जो भी आर्थिक सहयोग हासिल होता है वह पार्टी उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करने पर ही क़ानूनी तौर से ज़्यादातर ख़र्च कर दिया जाता है, जो किसी से भी छिपा हुआ नहीं है। फिर भी उसको लेकर षडयंत्र के तहत् गुमराह करने वाली तरह-तरह की ग़लत बातें व अफवाहें आदि फैलाना मीडिया को शोभा नहीं देता है।
इसके साथ ही यहाँ यह भी सर्वविदित है कि केवल बी.एस.पी. यूपी स्टेट यूनिट के अध्यक्ष श्री विश्वनाथ पाल ही नहीं बल्कि पार्टी के अन्य सभी छोटे-बड़े पदाधिकारी व कार्यकर्तागण भी इस समय पार्टी संगठन की मज़बूती तथा पार्टी के जनाधार को सर्वसमाज में बढ़ाने के साथ-साथ आगामी यूपी विधानसभा आमचुनाव हेतु पार्टी उम्मीदवारों की संभावित सूची बनाने तथा उनकी ठोस स्क्रीनिग करने आदि में लगे हुये हैं और पार्टी की उम्मीदवारी को लेकर उनसे मिलने वालों से अन्य बातों के अलावा उनकी सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक हैसियत के साथ ही उनके पार्टी के प्रति वफादारी व टिकाऊपन आदि को भाँपने के लिये, कोर्ट में जिरह की तरह, उनसे तरह-तरह के सवाल-जवाब भी करते रहते हैं, जिसकी गहराई में गये बिना ही उसे उसके पूरे फेस वैल्यू पर अन्यथा लेना उचित नहीं है, यह मीडिया से भी अनुरोध है तथा पार्टी के लोगों से भी अपील है कि वे विरेाधी पार्टियों के ऐसे प्रायोजित किसी भी षडयंत्र का शिकार होकर गुमराह ना हों बल्कि अपने मिशन 2027 के लक्ष्य में पूरे जी-जान से लगे रहें, जिस बी.एस.पी ज़िन्दाबाद की आपकी जबरदस्त तैयारी को देखकर ही विरोधियों की नींद काफी उड़ी हुई है। जय भीम जय भारत।
देखिए बहन जी का कद, उनका ओहदा, उनका रुतबा,
एक तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष, लोकसभा में विपक्ष के नेता और एक तत्कालीन मुख्यमंत्री
कैसे बहन जी के इर्द - गिर्द खड़े होकर बहन जी को प्रोत्साहित कर रहे हैं।
फोटो 2018 कर्नाटक के बंगलौर के हैं, तत्कालीन मुख्यमंत्री के शपथ समारोह के दौरान,
मैं भी वहीं मौजूद था,
बहन जी का रुतबा देखने लायक था, बहन जी की एंट्री होते ही वहां बहन जी की सिक्योरिटी ने तमाम नेताओं को अलग-थलग कर दिया, मंच के सामने तालिया की गड़गड़ाहट गूंज रही थी।
सारे वरिष्ठ नेता बहन जी के साथ एक फोटो खींचाने
के लिए बेताब थे, तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष आदरणीय सोनिया गांधी जी अधिकतर समय बहन जी का हाथ पकड़े खड़ी रही।
उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक के अधिकतर विपक्षी नेता बहन जी के इर्द-गिर्द थे।
और आज - कल के हरिजन चले हैं बहन जी से मिलने।
मीडिया फैला रही है राहुल गांधी का संदेश लेकर गए थे, जबकि खुद कांग्रेस इन हरिजनो के मुंह पर कारण बताओं नोटिस छाप कर चली गई।
कि क्यों गए बिना अनुमति बसपा अध्यक्ष मायावती जी के गेट के सामने भी।
तुम जानते नहीं हो उनका कद कितना बड़ा है?
@Mayawati@AnandAkash_BSP@bspindia
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"बहनजी हाय हाय"
यह अगर सपाई, कोंग्रेसी, भाजपाई या अन्य करे तो मान सकते है। लेकिन अनुसुचित जाति का व्यक्ति करे, यह मूर्खता से कम नही है।
एक एससी लड़कीं ने कोर्स में एडमिशन लिया। उसे स्कॉलरशिप नही मिली। 12 हजार की नौकरी करने वाले भाई ने किसी तरह धीरे धीरे फीस भरी, लेकिन अंतिम सेमेस्टर में संस्थान वालो ने प्रैक्टिकल लेने से मना कर दिया, कह रहे कि लगभग 37000 भरो। उसने कल मुझे बताया। मैने कुछ लोगो के नम्बर उन्हें दिए, जिससे उंसकी बहन का प्रैक्टिकल में मदद हो सके।
इसपर मुझे याद आ गया;
1.वर्ष 2007 में बीएड में एडमिशन लिया। पहले हमसे रजिस्ट्रेशन वग़ैरह के नाम पर 15000 रुपये ले लिए। उस समय यह काफी बड़ी रकम होती थीं। उस समय श्री मुलायम सिंह मुख्यमंत्री थे। एक दिन संस्थान का मालिक आया, सभी एससी छात्रो को बुलाया, कहने लगा की 42000 रुपया जमा करो, क्योंकि समाज कल्याण विभाग फीस प्रतिपूर्ती नही कर रहा है। नही तो नाम कटवाओ।
2.तब काफी गरीब जो मजदूरी करके किसी तरह पढ़ रहे थे, अधिकतर वो ही थे। हम 4 या 5 ही ऐसी स्तिथी में थे जो दे सकते थे, बाकी 18 की स्तिथि नही थी। काफी ने मन बना लिया कि कोर्स छोड़कर फिर से खेतों में मजदूरी करने लगेंगे। इनमे आधी लडकिया थी, उनका कहना था कि घर वाले शादी करवा देंगे। संस्थान को इससे लाभ था, वो इन सभी को मैनेजमेंट कोटा में परिवर्तित करके डेढ़ लाख तक मे बेचर है था क्योंकि उस समय बीएड का क्रेज था। उत्तर प्रदेश में प्राइमरी टीचर की नौकरियां लग रही थी।
3.तभी एकाएक बहनजी की सरकार बन गयी। बहनजी ने पहला आदेश ही यह दिया कि;
"कोई भी प्रोफेशनल कोर्स ही, एमबीए, बीएड, बीफार्मा, एमफार्मा, से लेकर बीएससी नर्सिंग या अन्य। एक रुपया भी संस्थान एससी/एसटी से नही लगा, उनकी फीस की प्रतिपूर्ती समाज कल्याण विभाग तुरंत करेगा।
4.अब जँहा 18 छात्र/छात्राएं कोर्स छोड़ने की सोच रहे थे, वंही संस्थान के मालिक बहनजी के गुस्से को जानते थे, फिर उन्होंने नही कहा। कुछ महीनों में ही फीस प्रतिपूर्ती हो गयी और 5 हजार के लगभग अलग से स्कॉलरशिप भी मिल गयी। कुल 24 में से;
"अधिकतर बाद में प्राइमरी टीचर बन गए। जो एक समय का खाना बड़ी मुश्किल से खाते थे, इतने गरीब की स्टेशन पर वापस जाने वाली ट्रेन का इतंजार करते समय तक भूखे रहते थे। फिर मेने स्टेशन पर में उन्हें खाना खिलवाता था, वो तक सरकारी टीचर बन गए। आज अच्छी जिंदगी जी रहे है"
5.इसलिए में उन एससी को मंदबुद्धि के साथ साथ अवसरवादी, एहसानफरामोश, मानता हूं जो या जिनके बच्चो, भाइयों, बहनों ने बहनजी द्वारा शरू की गई "जीरो शीट" का लाभ लिया और अब वो सपरिवार बहनजी हाय हाय करते है।
अब यह समाज की लड़कीं व उसका भाई परेशान है कि संस्थान प्रैक्टिकल नही लेगा। स्कॉलरशिप नही मिली। बहनजी के 5 साल के कार्यकाल में ऐसी स्तिथी नही आई।
अब यह हाल है कि पहले पैसे जमा कराओ, फिर 75% तक फीस प्रतिपूर्ती होगी। होगी या नही होगी। यह भी पक्का नही है ।
विकास कुमार जाटव
#WBAssemblyElection2026
Why BSP important ?
पूरे भारत में बहुजन समाज पार्टी सबसे कमजोर पश्चिम बंगाल में है अन्य राज्यों के मुकाबले 1984 से आजतक दो प्रतिशत भी वोटिंग शेयर नहीं रहा !
पश्चिम बंगाल में कुल दलित आबादी 24% और एक भी राज्य स्तर का नेता नहीं है !
जहां #BSP कमजोर है वहां ना कोई चमचा ना कोई दलित एजेंडा ना चुनाव में दलितों किसी प्रकार का आश्वासन देने वाला !
24 घंटे डॉ आंबेडकर के नाम की माला जपने वाले राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी एक बार भी डॉ आंबेडकर का नाम पश्चिम बंगाल में नहीं लेंगे !
पश्चिम बंगाल भारत का एक मात्र राज्य बना हुआ है, जिसने कोई सार्वजनिक डाटा कभी नहीं दिया कितने प्रतिशत दलित समाज सरकारी नौकरियों में है,
पश्चिम बंगाल का दलित सबसे दयनीय स्थिति में बना हुआ है, कुल दलित आबादी का 50% दलित आज भी बेगारी मजदूरी कर रहा है,
पश्चिम बंगाल का दलित सबसे जघन्य अपराध का सामना करता है, जिसे अदालत ने एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान स्वीकार किया जिसमें दलितों को दंगों के समय वीडियो बना कर घरों में आग लगाई गई और राज्य पुलिस एक भी दोषी को सजा नहीं दिलवा पाई जबकि दंगाइयों स्पष्ट वीडियो तक बनाई !!
चुकी पश्चिम बंगाल में बसपा कमजोर है तो अब ना वहां डॉ आंबेडकर के नाती पौते वहां उछल कूद करते दिखाई दिखे ना वहां महाराष्ट्र का कोई दलित पार्टी चुनाव लड़े , ना वहां कोई केतली लिए डायलॉग छोड़ आजादी से दलित समाज में चंदा उगाई करता मिले क्यों ?
किन्तु उत्तर प्रदेश होता ये पूरी मंडली मिलकर बसपा के के आगे कैबरा डांस कर रहे होते !!
जहां जहां बसपा कमजोर होगी वहीं वही दलित की स्थिति इस स्तर पर आएगी,
मान्य आकाश आनंद जी ने निवेदन है, पश्चिम बंगाल में दलितों को सवाल करना जरूर सिखाए, बताए वो मांग करे सरकारी नौकरियों में दलितों का प्रतिनिधत्व सार्वजनिक करे, किस नौकरी में कितना आरक्षण लागू हुआ !
ग्रुप A,B,C,D का कोई भी डाटा उपलब्ध नहीं किया गया क्यों भाई ? जब सभी राज्यों का डाटा उपलब्ध है फिर पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री कैसे हिम्मत कर गया डाटा को सार्वजनिक ना करे ? क्या कोई मुख्यमंत्री संविधान से ऊपर की औकात का हो गया ?
! नमस्ते ! #Baba_Manish
1. ख़ासकर उत्तर प्रदेश स्टेट के बी.एस.पी. के सभी ज़िला अध्यक्ष एवं छोटे-बड़े पदाधिकारी व कार्यकर्तागण, आज मैं पार्टी के कार्यों से दिल्ली जा रही हूँ और कार्य पूरा होते ही जल्दी वापिस भी आ जाऊँगी। और इस दौरान् पार्टी की पिछले महीने दिनांक 31 मार्च सन् 2026 को लखनऊ में हुई यू.पी. प्रदेश-स्तरीय बड़ी बैठक में पार्टी संगठन को तैयार करने व कैडर आदि के ज़रिये पार्टी का जनाधार बढ़ाने एवं आर्थिक मज़बूती देने तथा यू.पी. विधानसभा आमचुनाव की तैयारी से सम्बन्धित जो भी ज़रुरी दिशा-निर्देश दिये गये थे, उस पर पूरी ईमानदारी व निष्ठा से अमल करते रहना है।
2. साथ ही, बैठकों में यू.पी. में बी.एस.पी. के नेतृत्व में रही सरकार में प्रदेश के विकास व जनहित आदि में किये गये कार्यों के बारे में ज़रूर बताना है। बैठकों में यह भी बताना है कि यू.पी. में अब तक जितने भी एक्सप्रेस-वे आदि बने हैं तथा नोएडा में एयरपोर्ट भी बना है ऐसे अनेकों और भी जनहित के कार्य किये गये हैं जिनकी योजना व रुपरेखा बी.एस.पी. की रही सरकार में ही बनाई गयी थी और ये सभी कार्य काफी हद तक ज़रूर पूरे हो जाते यदि उस समय केन्द्र की रही कांग्रेसी सरकार बी.एस.पी. के प्रति अपनी जातिवादी मानसिकता के चलते इनमें रुकावटें पैदा नहीं करती।
3. कहने का तात्पर्य यह है कि यूपी के समुचित विकास व सर्वसमाज की उन्नति/तरक़्क़ी व बेहतर कानून व्यवस्था हेतु ’कानून द्वारा कानून का राज’ के ज़रिये बी.एस.पी. के ’सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय’ शासन में ही यह संभव हो सकता है, जिस पर भी ध्यान देने की अपील।
4. इतना ही नहीं बल्कि लखनऊ में दिनांक 22 फरवरी सन् 2026 की यू.पी. को छोड़कर आल-इण्डिया की हुई बड़ी बैठक में, पार्टी व मूवमेन्ट के हित में जो भी ज़रुरी दिशा-निर्देश दिये गये थे, तो उन्हें भी समय से ज़रूर पूरा करना है।
5. इसके इलावा, यू.पी. सहित पूरे देश में, पार्टी द्वारा दिये गये दिशा-निर्देशों को लेकर स्थानीय स्तर पर पार्टी की बुलाई जा रही सभी इन बैठकों में महिला आरक्षण को लेकर अभी हाल ही में, मेरे द्वारा दिनांक 15 अप्रैल 2026 को मीडिया में पार्टी का जो स्टैण्ड रखा गया है तथा उसके बाद एक्स पर पोस्ट भी किया गया है और ज़रुरत पड़ने पर आगे भी बयान दिये जायेंगे।
6. अर्थात् महिला आरक्षण के समर्थन के मामले में अभी भी पार्टी का स्टैण्ड दिनांक 15 अप्रैल वाला ही है, इसमें कोई भी बदलाव नहीं किया गया है, उसके बारे में भी इन बैठकों में ज़रूर बताना है ताकि महिला आरक्षण के इस ख़ास मुद्दे पर पार्टी के लोग गुमराह ना हो सकें, लेकिन इसके लिए पार्टी के अनुशासन के मुताबिक़ कोई भी धरना-प्रदर्शन आदि नहीं करना है।
1. देश के SC, ST व OBC समाज के संवैधानिक/क़ानूनी अधिकारों आदि के मामले में, कांग्रेस भी गिरगिट की तरह अपना रंग बदलने वाली यह पार्टी भी, महिला आरक्षण में, जो अब इन वर्गों की बात कर रही है, तो यही कांग्रेस पार्टी है जिसने अपनी केन्द्र की सरकार के रहते हुये किसी भी क्षेत्र में इनके आरक्षण के कोटे को पूरा कराने की कभी पहल नहीं की है।
2. तथा ना ही OBC समाज हेतु मण्डल कमीशन की रिपोर्ट के हिसाब से उन्हें सरकारी नौकरी व शिक्षा के क्षेत्र में 27 प्रतिशत आरक्षण को भी लागू किया, जिसे फिर BSP के अथक प्रयासों से पूर्व प्रधानमंत्री श्री वी.पी. सिंह की सरकार में अनततः लागू किया गया था, जो सर्वविदित है।
3. इसी प्रकार, यू.पी. में पिछड़े मुस्लिमों को OBC का लाभ देने के लिए, पिछड़ा वर्ग आयोग की जुलाई 1994 में ही आई रिपोर्ट को भी सपा सरकार ने ठण्डे बस्ते में डालकर इसे लागू नहीं किया था, जिसे फिर यहाँ बी.एस.पी. की दिनांक 3 जून सन् 1995 में पहली बनी सरकार ने इसे तुरन्त लागू किया, जो कि अब यही सपा अपना रंग बदलकर अपने राजनैतिक स्वार्थ में इनकी महिलाओं को अलग से आरक्षण देने की बात कर रही है।
4. इस प्रकार, अन्य मामलों की तरह इस मामले में भी सपा जब सरकार में नहीं है तो अलग रवैया अपना रही है, किन्तु जब सरकार में होती है तो अलग संकीर्ण जातिवादी व तिरस्कारी रवैया अपनाती है। अतः इन सभी वर्गों को ऐसी सभी छलावा एवं दोहरे चरित्र वाली पार्टियों से हमेशा सावधान रहना होगा, तभी कुछ बेहतर संभव हो पायेगा।
5. जहाँ तक महिला आरक्षण के लिए पिछली (सन् 2011) जनगणना के आधार पर परिसीमन करने का सवाल है, तो इस बारे में यही कहना है कि यदि इसे जिन भी कारणों से जल्दी लागू करना है तो फिर इसी जनगणना के आधार पर करना है और यदि वर्तमान में कांग्रेस पार्टी केन्द्र की सत्ता में होती तो फिर यह पार्टी भी बीजेपी की तरह ही यही क़दम उठाती।
6. कुल मिलाकर, कहने का तात्पर्य यह है कि देश में SC, ST व OBC एवं मुस्लिम समाज के वास्तविक हित, कल्याण व उनके भविष्य संवारने आदि के किसी भी मामले में कोई भी पार्टी गम्भीर नहीं रही है।
7. इसीलिये महिला आरक्षण के मामले में इन वर्गों को अभी जो कुछ भी मिलने वाला है तो उसे इनको फिलहाल स्वीकार कर लेना चाहिये और इस मामले में आगे अच्छा वक्त आने पर इनके हितों का सही से पूरा ध्यान रखा जायेगा अर्थात् इन्हें किसी के भी बहकावे में नहीं आना है क्योंकि इनको खुद अपने पैरों पर खड़े होकर अपने समाज को आत्मनिर्भर एवं मजबूत बनाना है। यही सलाह है।
1. सपा व कांग्रेस आदि ये दलित-विरोधी पार्टियाँ, इस बार यू.पी. में विधानसभा आमचुनाव के नज़दीक आते ही, इनके वोटों के स्वार्थ में बी.एस.पी. के जन्मदाता एवं संस्थापक मान्यवर श्री कांशीराम जी की सोची-समझी रणनीति के तहत् जयंती मनाकर तथा कांग्रेस पार्टी तो अपनी केन्द्र की सरकार में रहकर इनको ’भारतरत्न’ की उपाधि ना देकर, अब दूसरी पार्टी की सरकार से देने की माँग कर रही है, यह हास्यास्पद नहीं है तो क्या है?
2. जबकि ये पार्टियाँ शुरू से ही, बी.एस.पी. को ख़त्म करने में लगी रही हैं, जिस पार्टी की मान्यवर श्री कांशीराम जी ने ख़ुद नींव रखी है। जिसे इनकी एकमात्र उत्तराधिकारी व बी.एस.पी. की राष्ट्रीय अध्यक्ष के जीते-जी कोई हिला नहीं सकता है।
3. इतना ही नहीं बल्कि इससे ऐसा भी लगता है कि इन पार्टियों के महापुरुषों में कोई जान नहीं रही है, जो अब ये हमारे महापुरुषों को भुनाने में लगे हैं, जिन्होंने मान्यवर श्री कांशीराम जी के जीते-जी हर मामले में हमेशा इनकी उपेक्षा की है।
4. तथा इनके सम्मान में बी.एस.पी. सरकार द्वारा किये गये कार्यों को भी सपा सरकार द्वारा अधिकांशः बदल दिया गया है। यह है इन पार्टियों का इनके प्रति दोग़ला चाल व चरित्र। इसलिए यदि सपा व कांग्रेस आदि के ख़ासकर दलित चमचे चुप रहें तो उनके लिए यह बेहतर होगा। यही सलाह। हालाँकि ऐसे लोगों से दूरी बनाने के लिए ही मान्यवर श्री कांशीराम जी ने ’चमचा युग’ के नाम से अंग्रेज़ी में एक किताब भी लिखी है।
पत्रकार महोदय : आप किस भगवान की पूजा करते हैं?
दलित परिवार : हम किसी ईश्वर की पूजा नहीं करते। हम बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर और संत गुरु रविदास को मानते हैं। बाबा साहेब ने संविधान लिखा है बढ़िया रास्ता दिखाया है बढ़िया विचार दिए हैं।
हमारे लिए बाबा साहेब अंबेडकर जी ने हमें सिर्फ अधिकार ही नहीं दिए, बल्कि समानता, न्याय और आत्मसम्मान के साथ जीना सिखाया। गुरु रविदास ने कर्म, मानवता और बराबरी का संदेश दिया। हम मूर्तियों में नहीं, विचारों में आस्था रखते हैं। क्योंकि विचार ही इंसान को आज़ाद बनाते हैं।
इस ग़रीब दलित परिवार से अमीर दलितों को प्रेरणा लेनी चाहिए जो अपने बहुजन गुरुओं, संतों और महापुरुषों के संघर्ष और बलिदान को भूल जाते हैं।