सबसे पहले तो #दुर्गा_पूजा की अलग-अलग स्थानीय परम्पराओं में ये दिख जाता है कि पूर्व की ओर शाकाहार पर कोई विशेष आग्रह नहीं होता और भारत में पश्चिम की ओर बढ़ते ही शाकाहार का बिलकुल नाजियों सा बल रहता है। वैष्णव परंपरा के लोगों को इस विविधता के बारे में समझाना व्यर्थ है, लेकिन शाक्त परंपरा के लोग आसानी से समझते हैं कि उग्र रूपों की साधना अलग होती है। शांत रूप जैसे शाकम्भरी या क्षीरभवानी की उपासना में अलग पद्धतियाँ प्रयोग में लाई जाती हैं।
इसके अलावा जो एक और बात नजर आती है, वो है आर्थिक सामर्थ्य का स्वीकार्यता से जुड़ाव। भारत विविधताओं का देश है तो जो अलग-अलग परिपाटी अलग-अलग जगहों पर चलती है, उनमें से कौन सी स्वीकार्य होगी, और कौन सी नहीं, ये उस क्षेत्र के आर्थिक सामर्थ्य पर भी निर्भर है। जैसे कि आर्थिक रूप से सबल क्षेत्र का गरबा तो पूरे देश में स्वीकार्य होगा, लेकिन कम आर्थिक रूप से समर्थ क्षेत्रों की परम्पराएं जैसे सिन्दूर-खेला हो या झिझिया, उनपर तरह तरह की प्रगतिशील आपत्तियां दर्ज करवाई जाएँगी।
सिर्फ बंगाल से बनारस तक में देख लेंगे तो बंगाल की पूजा की परम्पराएं लिखित रूप में उपलब्ध हैं, वाराणसी क्षेत्र की परम्पराओं पर किताबें-शोध मिलेंगी, लेकिन बीच के मिथिला की परम्पराओं की बात शायद ही कहीं होती हुई दिखती हैं। ऐसी परम्पराओं में से एक है "बेलनौती" यानी बेल (बिल्व वृक्ष) को निमंत्रण देने जाना।
ऐसा माना जाता है कि शारदीय #नवरात्र अकाल बोधन है। प्राचीन काल में इस समय पूजा नहीं की जाती थी क्योंकि ये माता के शयन का समय माना जाता था। जब रावण वध से पहले श्री राम ने माता दुर्गा की इस समय पूजा की, तबसे इस समय पूजा होने लगी। वो जो "राम की शक्तिपूजा" वाली 'निराला' की कविता शायद पढ़ी हो, वो इसी पूजा के आधार पर लिखी गयी थी। इसका सन्दर्भ बांग्ला में लिखी गयी कृत्तिवास रामायण से आता है। यही पहले से कालिका पुराण और देवी भागवत में भी है।
ब्रह्मा जी के कहने पर भगवान राम ने रावण वध के लिए शरद ऋतु में देवी चंडी (दुर्गा) का बोधन (पूजा) किया था। ब्रह्मा जी ने बताया था कि इस काल में देवी बेल के पेड़ (बिल्व वृक्ष) पर शयन कर रही होती हैं, इसलिए बेल के पेड़ पर षष्ठी तिथि को न्योता देने पुरोहित-यजमान जाते हैं। वहाँ उस डाली का चयन किया जाता है जिस पर बेल का फल जोड़े में लगा हो। निमंत्रण के रूप में इस पर मौली/कपड़ा बाँधा जाता है और सप्तमी को मंडप में 'नवपत्रिका' (नौ पौधों की पत्तियों से बना पुतला) के साथ बेल की स्थापना की जाती है। इसके बाद ही माँ दुर्गा की प्रतिमा का 'नेत्रोन्मीलन' (आँखें खोलना) और प्राण-प्रतिष्ठा की मुख्य विधि संपन्न होती है।
ओह हाँ, सार्वजनिक पूजा है इसलिए पुरोहित-यजमान होते हैं। व्यक्तिगत पूजा में केवल साधक ही होता है, अलग से कोई पुजारी नहीं होता। यानी कि जैसा छठ में कहते हैं न, ये तो लोकपर्व है जी! इसमें किसी पुजारी की आवश्यकता नहीं होती जी! वैसा ही हिन्दुओं की हरेक पूजा में होता है, अलग से पुरोहित तब बुलाया जाता है जब पूजा सार्वजनिक हो और कई लोगों को आमंत्रण देने के कारण यजमान और उसके परिवार पर अतिथियों-आगंतुकों की सेवा-सत्कार का बोझ भी हो। अन्यथा दुर्गा-पूजा में भी साधक-साधिका अकेले होते हैं।
स्थानीय परम्पराएं कैसे अलग होती हैं, भारत का अर्थ विविधता क्यों है, उसे समझने के लिए भारतीय त्यौहार भी एक अच्छा माध्यम तो हैं ही। कभी इस क्षेत्र में हों तो #मिथिला की #बेलनौती में सम्मिलित होकर देखिएगा। खुशियाँ बाँटने से बढ़ती हैं, ये तो सुना ही होगा!
(वीडियो इन्टरनेट से साभार)