"RGHS - चोर का दंड फकीरों को"
आरजीएचएस योजना आज गंभीर अव्यवस्थाओं का शिकार होती नजर आ रही है। मरीज दर-दर भटकने को मजबूर हैं, कर्मचारी आंदोलन कर रहे हैं और अस्पताल महीनों से भुगतान का इंतजार करते हुए आर्थिक संकट झेल रहे हैं। विडंबना यह है कि कर्मचारियों के वेतन से हर महीने नियमित रूप से RGHS की कटौती हो रही है, लेकिन इलाज के समय उन्हीं कर्मचारियों और पेंशनर्स को अपनी जेब से हजारों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं।
दवाओं और जांचों की सूची लगातार सीमित की जा रही है, उपचार सुविधाएं घटती जा रही हैं और दूसरी ओर चिकित्सा मंत्री श्री @GajendraKhimsar जी इसे 800 करोड़ रुपये की “बचत” बताकर उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर यह बचत किस कीमत पर हुई? क्या कर्मचारियों, पेंशनर्स और मरीजों की परेशानियां बढ़ाकर की गई बचत को उपलब्धि माना जा सकता है?
यदि योजना में कहीं पर गड़बड़ियां थीं तो जिम्मेदार गड़बड़ी करने वाले लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए थी, लेकिन दुर्भाग्य से पूरी व्यवस्था का बोझ ईमानदार कर्मचारियों, पेंशनर्स और मरीजों पर डाल दिया गया। आज स्थिति यह बन गई है कि नियमित कटौती के बावजूद मरीजों को समय पर इलाज, दवाइयां और जांच तक उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। अस्पताल भुगतान न मिलने से RGHS मरीजों का इलाज करने से भी हिचक रहे हैं।
माननीय मुख्यमंत्री @BhajanlalBjp जी सच तो यह है कि RGHS योजना में वर्तमान हालात “चोर का दंड फकीरों को” जैसी स्थिति पैदा कर चुके हैं। गड़बड़ियां किसी और ने कीं, लेकिन उसकी सजा कर्मचारी, पेंशनर्स और आम मरीज भुगत रहे हैं। सरकार को चाहिए कि वह इस योजना की कमियों को दूर करे, अस्पतालों का लंबित भुगतान तुरंत जारी करे, दवाओं और जांचों की सुविधाएं बहाल करे तथा कर्मचारियों और पेंशनर्स का भरोसा फिर से कायम करे।
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