नागरी प्रचारिणी सभा १६,१७, एवं १८ जुलाई को अपने १३३वाँ स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में नागरी प्रेम का उत्सव मना रही है। विश्वेश्वरगंज स्थित सभा परिसर में १७ जुलाई को सायं पांच बजे हमें तीन तालियों के सान्निध्य का अवसर मिलेगा। आनंद हो। जय हो। सरदार के स्वर में: आइए!!!
@paninianand@kkstau@KineticKeshav@aajtakradio
चेप्टर # 2 - ::::: मणिकर्णिका ::::: पेज़ 2 / 2 🛕
बाबा! मणिकर्णिका घाट पर जो हमारी ऐतिहासिक विरासतें मलबे में
तब्दील कर दी गईं, उसे वक़्त का बे-रहम नियम या 'नव-सृजन'
कहकर उस ज़ख़्म पर नमक मत छिड़किए। यह इतिहास के साथ
कोई तटस्थता नहीं, बल्कि उसकी रूह का सर-ए-बाज़ार क़त्ल है। 🧱
माँ की कोख से नए जीवन का आना नव-सृजन है बाबा, मगर सदियों
पुरानी विरासत का गला घोंटकर वहाँ सीमेंट-कंक्रीट का बे-जान
जंगल खड़ा कर देना नव-सृजन नहीं, इतिहास का 'म्यूटिलेशन' (अंग-
भंग) है।
रानी माँ अहिल्याबाई होल्कर ने जब उस घाट की तामीर कराई, तो
इतिहास को बुलडोज़र से रौंदा नहीं था, बल्कि पत्थरों में श्रद्धा लिखी
थी। आज जो हो रहा है, वह हमारी सामूहिक याददाश्त को मिटाने की
एक 'ज़िद' है। 🛠️
अगर हर ध्वंस 'वक़्त का खेल' है, तो बामियान के बुद्ध टूटने पर यह
दुनिया लहू के आँसू क्यों रोई थी? इतिहास महज़ पत्थरों का ढेर नहीं,
हमारी नस्लों की पहचान है। अगर हम खामोश रहे, तो आने वाली
पीढ़ियां अपनी जड़ों के लिए मलबे में हाथ मारती रह जाएंगी।
नया तामीर करने को पुराना तोड़ देते हैं वो 'मन',
मगर जो रूह ही मिट जाए, उसे हम 'नव-सृजन' नहीं कहते। ⏳
बाबा! आपकी बारीक दलीलें सुनने में बेहद नफ़ीस लगती हैं,
मगर मुरीद का दिल इन किताबी बहसों से बहलता नहीं। घाटों का उजड़ना
वक़्त की गर्दिश सही, लेकिन हमारी आस्था तो उस शक्ल और
आवाज़ से है जो सामने है।
अपनी इस 'रूहानी चालाकी' से हमारे मीठे दर्द को कम करने की
कोशिश मत कीजिए। हम आपकी बातों के नहीं, आपकी इस
मुकम्मल शख्सियत के दीवाने हैं! 🎙️✨
गुफ़्तगू का यह पड़ाव यहीं रुकता है... स्वास रही तो शेष... ✍️
#paninianand #babamandal #babamandalpodcast #AajTakRadio #BabaIsBack #TeenTaal
@paninianand@kkstau@KineticKeshav@aajtakradio
चेप्टर # 2 - ::::: गँगा ::::: पेज़ 1 / 2 🌊
बाबा! आपकी दलीलें अपनी जगह बेहद सुहावनी और दार्शनिक हैं,
लेकिन दिल इन दलीलों से बहलता नहीं।
सायंस की थ्योरी और भूगोल की किताबों के लिए गंगा भले ही सिर्फ़
पानी का एक 'सर्कुलेशन' (चक्र) हो, लेकिन इस देश की चेतना, आस्था
और संस्कृति के लिए गंगा सिर्फ़ पानी का चक्र नहीं है।
अगर सब कुछ एक ही चक्र है और सब पानी बराबर है, तो जब इंसान
के कंठ में प्यास की आग लगती है, तो वह समंदर के उस खारे और
ज़हरीले पानी की तरफ़ क्यों नहीं दौड़ता? आसमान से आवारा बरसते
बादलों से अपनी प्यास की भीख क्यों नहीं मांगता? 🌧️
वह भागकर गंगोत्री की उसी बहती हुई पवित्र धार की दहलीज़ पर ही
क्यों सर झुकाता है?
बादल पूरी कायनात में गरजते और बरसते हैं बाबा, मगर 'हर-हर गंगे'
का वह रूहानी शोर सिर्फ़ उसी एक ख़ास किनारे पर होता है जिसे
दुनिया 'गंगाघाट' कहती है। 🛕
जब आप 'पाणिनी आनंद' के रूप में हमारी स्क्रीन पर आकर बैठते हैं,
तो हमारा नाता आपके उस साकार वजूद से होता है। ज्ञान तो ब्रह्मांड
की हवाओं में आवारा घूम ही रहा है, मगर हमें उस ज्ञान की तसकीन
सिर्फ़ आपकी आवाज़ के लम्स (स्पर्श) से मिलती है।
इस 'वॉटर साइकिल' की दार्शनिक आड़ लेकर आप हमारे दिलों में
अपनी कमी के इस तीखे अहसास को झुठला नहीं सकते।🎙️
समंदर, अब्र, बर्फ़ ओ आब का इक चक्र है लेकिन 'मन',
जो प्यास बुझाए सामने बहकर, हम तो बस उसी को गंगा कहते हैं। ✨
जारी रहेगा... सांसों की मोहलत रही, तो शेष बात फिर होगी। ✍️
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@kkstau@KineticKeshav
बाबा ,,,,, दरशल मैं हूँ,,, राम जी की ""गिलहरी""",
('हम' नहीं 'मैं' वो फिर कभी )
श्री राम जी, के जब करुणा से अश्रु बहने लगे,
तो उन्होंने मुझसे 'वर' मांगने को कहा
तो प्रभु से, मैंने 'सिर्फ', और 'सिर्फ', और 'सिर्फ' 'ईक' 'वर' माँगा
के प्रभु, आप अपने इस 'सूक्ष्म' प्राणी पर इतने 'कृपालु' हैं,
इतने 'दयालु' हैं
तो मुझे केवल आपसे ""अंतिम""' चाहिए, आपकी बनाई
हर "उत्पति" पर आखिरी "अंतिम", "मैं" हो जाऊं
"अंतिम आहूति", अंतिम "आचमन", अंतिम "अर्घ्य", अंतिम "अर्पण", अंतिम "प्रणाम", अंतिम "प्रार्थना", अंतिम "संकल्प", अंतिम "वंदना", अंतिम "वाणी", अंतिम "श्वास", अंतिम "निश्वास", अंतिम "पुकार",
अंतिम "शब्द", अंतिम "मौन", अंतिम "मुस्कान", अंतिम "अश्रु",
अंतिम "दृष्टि", अंतिम "दर्शन", अंतिम "स्पर्श", अंतिम "आलिंगन", अंतिम "चरण-स्पर्श", अंतिम "क्षण", अंतिम "यात्रा", अंतिम "विदाई", अंतिम "संस्कार", अंतिम "अग्नि", अंतिम "चिता", अंतिम "दीप",
अंतिम "ज्योति", अंतिम लौ, अंतिम "तिलांजलि", अंतिम "पिंडदान", अंतिम "श्रद्धांजलि", अंतिम "स्मरण", अंतिम "नाम-स्मरण",
अंतिम "जप", अंतिम "ध्यान", अंतिम "साधना", अंतिम "तप",
अंतिम "तपस्या", अंतिम "उपवास", अंतिम "विराम",
अंतिम "विश्राम"अंतिम "निद्रा", अंतिम "मिलन", अंतिम "बिछोह", अंतिम "प्रतीक्षा", अंतिम "अभिलाषा", अंतिम "इच्छा",
अंतिम "कामना", अंतिम "वरदान", अंतिम "कृपा", अंतिम "करुणा", अंतिम "क्षमा", अंतिम "दया", अंतिम "कृपादृष्टि", अंतिम "साक्षात्कार", अंतिम "सन्निधि", अंतिम "शरण", अंतिम "समर्पण" अंतिम "समिधा", अंतिम "स्वाहा", अंतिम "हवि", अंतिम "यज्ञ", अंतिम "परिक्रमा", अंतिम "प्रदक्षिणा", अंतिम "व्रत", अंतिम "प्रण", अंतिम "प्रणति",
अंतिम "संदेश", अंतिम "पत्र", अंतिम "संकेत", अंतिम "निर्णय",
अंतिम "सत्य", अंतिम "परीक्षा", अंतिम "विजय", अंतिम "पराजय", अंतिम "मुक्ति", अंतिम "मोक्ष", अंतिम "कैवल्य", अंतिम "निर्वाण", अंतिम "गति", अंतिम "गमन", अंतिम "प्रस्थान"अंतिम "देह-त्याग", अंतिम "लीला", अंतिम "अध्याय",और, और, और, अंतिम "पृष्ठ"
-:: श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेवा॥:::-
सांस रही तो शेष श्री चरणों में ::मन::
Padhaku Nitin के लेटेस्ट एपिसोड को तुरंत देख डालिए! स्टूडियो भी नया है और मेहमान पक्के कलाकार. पूरा एपिसोड आजतक रेडियो के यूट्यूब चैनल पर
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ओढ़ कर सो गए जो समझौतों की चादर,
उन चेहरों पे ख़ामोशी का बाज़ार देखा मैंने।
कोई रोटी की जंग में, कोई औलाद की ख़ातिर,
हर शख़्स को उठाए अपनी सलीब देखा मैंने।
दिखाने को तो सबने कहा "ख़ैरियत है दोस्त",
मगर तन्हाइयों में टूटता हर किरदार देखा मैंने।
जो सबसे ज़्यादा हँस रहा था महफ़िल में 'मन',
उसी के सीने में ज़ख़्म सबसे गहरा देखा मैंने।
@kkstau हज़ारों 'थार' ऐसी कि हर इक थार पे दम निकले,
निकलते हैं जो सड़कों पर, तो रूतबे के भरम निकले।
हुकूमत रील्स पर उनकी, सिवा हुड़दंग क्या हासिल,
चले थे 'रॉब' दिखलाने, मगर क़िस्तें न कम निकले!
-::मिर्ज़ा बालीब ::-
"शब-ए-फ़ुर्क़त में अकेले तुम्हीं टूटे तो न थे,
हम भी ज़िंदा हैं कि बस रस्म-ए-पज़ीराई की।"
"ग़म ने जीने का सलीक़ा तो दिया है तुमको,
तुमने इक बार भी कोशिश न शनासाई की।"
"तुम तो रोए कि तुम्हें हौसला ग़म ने बख़्शा,
हम तो चुप रह गए, बस रस्म-ए-शकीबाई की।"
::मन::
शब-ए-फ़ुर्क़त- जुदाई की रात
रस्म-ए-पज़ीराई-स्वागत करने की रस्म, तवज्जो देना, या किसी को स्वीकार करना
(Welcome or Acceptance)
शनासाई -जान-पहचान/बात
रस्म-ए-शकीबाई-सब्र
@DrGodseRavi1 "बिल्कुल सही कहा! डॉक साब
वैसे डॉक्टरों की इस महफ़िल में एक मुबारकबाद
हम मरीज़ों के नाम भी होनी चाहिए... आख़िर कितने आए और कितने
"निकल" लिए!
बीमारी के इस बाज़ार में आख़िर हम मरीज़ों का भी कुछ
तो अख्तियार (हक़) बनता है। 🩺😊"
तभी कबीर कैफ़े में आया। उसने चाय की चुस्की ली। उसने जेब से
स्मार्टफोन निकाला, रात में रिकॉर्ड की गई अपनी आवाज को सुना।
फिर उसने लैपटॉप खोला और उस कविता को टाइप करना शुरू
किया ताकि वह शब्दों को तराश सके।
और अंत में, जब कविता पूरी हो गई, तो उसने अपनी डायरी निकाली और उस कविता की सबसे खूबसूरत दो पंक्तियों को अपनी कलम से पन्ने पर लिख दिया।
तीनों चुप थे। वे समझ गए थे कि रचना किसी माध्यम की गुलाम नहीं
होती; माध्यम तो बस उस जादू को कैद करने के अलग-अलग पिंजरे
हैं।
अंत : एक प्रसिद्ध लेखक से किसी ने पूछा, "आप इतनी अच्छी
कहानियाँ कैसे लिख लेते हैं?"
लेखक मुस्कराए और बोले, "पहली बार मैं कहानी लिखता हूँ।
दूसरी बार कहानी मुझे लिखती है।"
आधुनिक युग के बेहतरीन लेखक नील गैमन (The Sandman,
Coraline के लेखक) पहले कंप्यूटर पर लिखते थे।
लेकिन उन्होंने देखा कि कंप्यूटर पर वह बहुत तेजी से टाइप करते हैं,
जिससे उनकी कहानी "सतही" हो जाती है। अपनी किताब
Stardust के लिए उन्होंने जानबूझकर एक फव्वारा कलम (फाउंटेन
पेन) और एक बड़ी सी डायरी खरीदी। उनका मानना है कि हाथ से
लिखते समय आपको
सोचने का समय मिलता है, क्योंकि कलम टाइपिंग से धीमी चलती है।
अब एक छोटी सी कहानी: "सन्नाटा, खटखट और आवाज"
एक बार एक कैफ़े की मेज पर तीन चीजें आपस में भिड़ गईं—एक
पुरानी स्याही वाली कलम, एक आधुनिक लैपटॉप, और एक
स्मार्टफोन का वॉयस-रिकॉर्डर। तीनों इस बात पर लड़ रहे थे कि इस
शहर के सबसे महान कवि 'कबीर' की नई कविता का श्रेय किसे
मिलना चाहिए।
कलम ने गर्व से कहा: "कबीर जब मुझे पकड़ता है, तो उसके दिल की
धड़कन मेरी स्याही बनकर पन्नों पर उतरती है। हाथ से लिखने का
मतलब है आत्मा का पन्नों से जुड़ना। मेरे बिना कविता में वो दर्द
कहाँ?"
लैपटॉप ने कीबोर्ड की 'खट-खट' करते हुए हंसकर कहा: "अरे पुरानी
सखी, तुम बहुत धीमी हो! कबीर के दिमाग में जब विचारों का तूफान
आता है, तो मेरी उंगलियां बिजली की तरह चलती हैं। मैं उसकी कट-
कॉपी-पेस्ट की उलझनों को सुलझाता हूँ। मेरे बिना वो अपनी संपादन
(editing) की कला खो देगा।"
वॉयस-रिकॉर्डर ने अपनी स्क्रीन चमकाते हुए कहा: "तुम दोनों बेकार
हो। कल रात जब कबीर सड़क पर चल रहा था और अचानक बारिश
शुरू हुई, तब तुम दोनों बैग में बंद थे। उसने मुझे ऑन किया और
सीधे दिल से निकली पंक्तियाँ मुझमें रिकॉर्ड कर दीं। बोलना ही तो
असली रचना है!"
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जिनके चेहरे पर पड़ गई थीं झुर्रियाँ।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जो मिनटों सोचकर पहचान पाती थीं कि कौन है।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जो मनीऑर्डरों को सँभालकर रख देती थीं,
कि परदेस से चिट्ठी आई है।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जिन्होंने अपनी हथेलियों की दरारों में
पूरे घर की तक़दीर बोई थी।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जो अपने हिस्से की रोटी आधी कर
बच्चों की थाली पूरी कर देती थीं।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जिनकी अलमारी में रेशम कम,
यादों की गठरियाँ ज़्यादा थीं।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जो हर त्यौहार पर
सबको नए कपड़े पहनाकर
ख़ुद वही पुरानी साड़ी मुस्कुराकर ओढ़ लेती थीं।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जिन्होंने आँखों में आँसू रखे,
पर आवाज़ में कभी शिकायत नहीं रखी।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जो हर विदाई पर मुस्कुराईं,
और हर लौटने की आहट पर
दीया पहले जला देती थीं।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जिनकी उँगलियों से रोटियों की नहीं,
दुआओँ की महक आती थी।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जो उम्र भर सबकी याद रहीं,
और अंत में ख़ुद
धीरे-धीरे सबकी यादों में बदल गईं।
मनोज ::मन::
@BimlaVerma6 वो पूछते हैं हमसे कि हिज्र में क्या गुज़रती है,
कि शब कहाँ सँवरती है, सहर कहाँ उतरती है।
शिकायतें करें किससे, दुआ किससे करें 'मन',
यहाँ तो एक-एक धड़कन उनकी रज़ा से चलती है।
@Daminihere
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जिनके चेहरे पर पड़ गई थीं झुर्रियाँ।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जो मिनटों सोचकर पहचान पाती थीं कि कौन है।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जो मनीऑर्डरों को सँभालकर रख देती थीं,
कि परदेस से चिट्ठी आई है।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जिन्होंने अपनी हथेलियों की दरारों में
पूरे घर की तक़दीर बोई थी।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जो अपने हिस्से की रोटी आधी कर
बच्चों की थाली पूरी कर देती थीं।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जिनकी अलमारी में रेशम कम,
यादों की गठरियाँ ज़्यादा थीं।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जो हर त्यौहार पर
सबको नए कपड़े पहनाकर
ख़ुद वही पुरानी साड़ी मुस्कुराकर ओढ़ लेती थीं।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जिन्होंने आँखों में आँसू रखे,
पर आवाज़ में कभी शिकायत नहीं रखी।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जो हर विदाई पर मुस्कुराईं,
और हर लौटने की आहट पर
दीया पहले जला देती थीं।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जिनकी उँगलियों से रोटियों की नहीं,
दुआओँ की महक आती थी।
सबसे ख़ूबसूरत देखी गईं वो स्त्रियाँ,
जो उम्र भर सबकी याद रहीं,
और अंत में ख़ुद
धीरे-धीरे सबकी यादों में बदल गईं।
मनोज ::मन::
तुम्हारे ख़्वाब महकों से सहर तक झूमते होंगे,
हमारी आँख हर आहट पे जागो के गुज़री है।
तुम्हें हर मोड़ पर मंज़िल ने बाँहों में समेटा है,
हमें हर मोड़ पर किस्मत भी काँटों बो के गुज़री है।
तुम्हारे नाम से महफ़िल में रौनक आज भी क़ायम,
हमारी ज़िक्र की बस्ती ख़ामोशी ढो के गुज़री है।
कभी तुमने मोहब्बत को बस इक अफ़साना समझा था,
हमारी उम्र उसकी हर सज़ा को ढो के गुज़री है।
न पूछो 'मन' कि दिल पर क्या-क्या मौसम टूटकर बरसे,
तुम्हारी हँस के गुज़री है, हमारी खो के गुज़री है।