लखनऊ
➡BSP में विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज
➡आकाश आनंद प्रचार रणनीति को देंगे नई धार
➡दिल्ली में सोशल मीडिया की कोर टीम के साथ मंथन
➡सोशल मीडिया की कोर टीम के साथ मंथन जल्द
➡युवाओं तक पहुंच बढ़ाने के लिए AI का इस्तेमाल
➡मायावती सरकार की उपलब्धियों को बताया जाएगा
@bspindia@AnandAkash_BSP
जो कहते हैं कि बसपा का अस्तित्व खत्म हो चुका है, बसपा कहीं नज़र नहीं आती हैं ऐसा कहने वाले देखिए बसपा का सड़को पर भौकाल कैसे बना हुआ हैं।
दो दिन पहले कानपुर देहात के विधानसभा क्षेत्र अकबरपुर-रनियाँ में बसपा का कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें क्षत्रिय समाज से आने वाले गुड्डन सिंह को पार्टी ने अपना उम्मीदवार बनाया है।
बसपा प्रत्याशी गुड्डन सिंह अपना शक्ति प्रदर्शन करते हुए सैकड़ों कारों के क़ाफ़िले निकाला, अगर इस सीट पर क्षत्रिय-दलित समीकरण बना तो फिर से बसपा इस सीट पर किला फतेह कर लेगी।
बसपा इस बार दमदार तरीके से अपनी वापसी करने जा रही हैं इस बार ब्राह्मण ही नहीं बल्कि क्षत्रिय समाज का भी बसपा की तरफ़ झुकाव रहेगा।
-40 नंबर पर, 00 पर्सेंटाइल में किसका एडमिशन हुआ था?
जनरल कैटेगरी का लड़का था, उसी का हुआ था।
69 बच्चों को 50 से कम मार्क्स में भी एडमिशन मिला था,
39 जनरल कैटेगरी के थे, यानी इसमें भी 60% सीटें सवर्ण समाज के स्टूडेंट्स ने हासिल किया था।
बहुत बुरा हाल है।🥹
1. जैसाकि मीडिया की ख़बरों से सर्वविदित है कि यूपी की वर्तमान सरकार ने, बी.एस.पी. सरकार द्वारा भदोही को राज्य मुख्यालय का दर्जा देते हुये संत रविदास नगर के नाम से नया ज़िला बनाया था और जिसे समाजवादी पार्टी (सपा) की सरकार ने अपनी संकीर्ण जातिवादी मानसिकता के तहत् बदल दिया था, इसे अब फिर से संत रविदास नगर ज़िला स्थापित कर दिया है, जिसके लिये पार्टी राज्य सरकार की आभारी है।
2. वास्तव में बी.एस.पी. की यूपी में रही चारों सरकारों में प्रशासनिक व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने व आम जनहित को बेहतर बनाने के मद्देनज़र अनेकों नये ज़िले, तहसील, विकास खण्ड तथा पुलिस ज़ोन व रेंज आदि बनाये गये और उनमें से कई ज़िलों के नाम दलित व अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) में समय-समय में जन्मे महान संतों, गुरुओं व महापुरुषों के नाम पर रखे गये और इसी क्रम में संत रविदास नगर व छत्रपति शाहूजी महाराज नगर व भीम नगर आदि अनेकों नये ज़िले बने, जिनके नाम सपा सरकार ने केवल अपनी जातिवादी सोच, द्वेष व संकीर्ण राजनीति के कारण बदल दिये, जिसको लोग कभी भी भुला नहीं पायेंगे।
3. इतना ही नहीं बल्कि ब्रज क्षेत्र में कासगंज इलाके़ के समुचित विकास हेतु कासंगज को ज़िला मुख्यालय का दर्जा देते हुये मान्यवर श्री कांशीराम जी के नाम पर नया ज़िला बनाया गया, जिसका भी नाम सपा सरकार ने अपने पीडीए-पिछड़ा दलित व अक्लि़यत विरोधी रवैयों के कारण बदल दिया।
4. ऐसे में यूपी सरकार संत रविदास नगर की तरह ही, मान्यवर श्री कांशीराम जी व अन्य महापुरुषों के नाम पर बनाये गये नये ज़िलों के भी असली नाम बहाल कर दे तो यह उचित होगा और यह कार्य अगर मान्यवर श्री कांशीराम जी की दिनांक 9 अक्तूबर के परिनिर्वाण दिवस से पहले कर दिया जाये या उसी दिन ही कर दिया जाये तो बी.एस.पी. इसके लिये आभारी रहेगी।
स्कूल में बच्चों ने सिर्फ़ इसलिए खाना नहीं खाया, क्योंकि उसे बनाने वाली रसोइया दलित समुदाय से थी. किसी दलित दूल्हे को अपनी ही शादी में घोड़ी पर चढ़ने के लिए पुलिस सुरक्षा लेनी पड़ी.
किसी की सिर्फ़ इसलिए हत्या कर दी गई, क्योंकि उसने समाज की जातिगत सीमाओं को चुनौती देते हुए तथाकथित ऊँची जाति की लड़की से शादी कर ली.
ये ऐसी ख़बरें हैं जो हम अक्सर सुनते हैं, लेकिन इन्हीं हालात के बीच कुछ दलित कलाकार अपनी कला के ज़रिए इन घटनाओं और भेदभाव के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं. उन्होंने बोलना क्यों चुना? आख़िर ऐसा क्या था कि वे चुप नहीं रह पाए?
ऐसे ही दो कलाकार रैपर नवीन कुमार और कवयित्री अंजलि बंगा से बीबीसी संवाददाता अश्वनी पासवान @Ashwaniiiiiii ने बात की है.
शूट-एडिट: अरीबा अंसारी
होल्डिंग एडिटर: सुशीला सिंह
यूपी की फैक्ट्रियों में गेहूं के साथ पत्थर की पिसाई: फैक्ट्री का ऑपरेटर बोला- 'मालिक ज्यादा मुनाफे के लिए आटे में सफेद पत्थर का चूरा मिलाते हैं', आटा देशभर में ब्रांडेड कंपनियों के नाम पर बिक रहा; रिपोर्टर ने मजदूर बनकर आटे की फैक्ट्री में 25 दिन गुजारे, जानें कैसे एक्सपोज हुआ यह खेल
#UPNews #HindiNews #Investigation
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@vkjatav84 BSP खतम है सर,
बहन जी कार्यकर्ताओं से संवाद बिल्कुल नही करती!जिला और मण्डल स्तर के लोगों के बीच कभी नही जाती हैं!
पार्टी पोर्टल नही है,बहन जी के बाद कोई बड़ा चेहरा नहीं है! पार्टी के नेता किसी मुद्दे पर कान्फ्रेंस नही कर सकते, कॉरपोरेट/ इंडस्ट्रियलिस्ट से संबंध अच्छे नही हैं
नोएडा : सेक्टर-150 स्थित एल्डिको सोसाइटी में STP टैंक की जहरीली गैस की चपेट में आने से दो लोगों की मौत हो गई
◆ सफाई कर्मचारी टैंक की सफाई करने उतरा था, जिसे सिक्योरिटी गार्ड बचाने के लिए टैंक में उतरा था
#Noida | Noida | #UttarPradesh | Uttar Pradesh
आदरणीय बहन जी ने विरोधी पार्टियों के दबाव में अपने सारे मंत्रियों के इस्तीफ़े ले लिए और 2012 में चुनाव हार गईं। तब से कोई चुनाव नहीं जीत रही हैं।
राजनीति ईमानदारी और नैतिकता का खेल नहीं है, लेकिन बहनजी जैसी पवित्र मन की नेता ढूंढे से भी नहीं मिलेगी।
-देश के छात्रों व युवाओं केे आन्दोलन के चलते आज केन्द्रीय शिक्षा मन्त्री श्री धर्मेन्द्र प्रधान द्वारा इस्तीफा दिये जाने का फैसला उचित, जो यह पहले ही ले लिया जाता तो बेहतर होता। साथ ही, हमारी पार्टी केन्द्र सरकार से यह भी अपेक्षा करती है कि जिन पुलिसकर्मियों ने जन्तर-मन्तर पर शान्तिमय ढंग से प्रदर्शन कर रहे निहत्ते लड़के व लड़कियों पर बरबर्तापूर्वक लाठी, डन्डों आदि से चोट पहुँचायी है जिससे ये बड़ी संख्या में गम्भीर रूप से घायल हुए, उनपर सख़्त कार्रवाई की जानी चाहिये।
-और ख़ास तौर से जिन पुरूष पुलिसकर्मियों ने लड़कियों के साथ बेहूदा व शर्मनाक बदसलूकी की और बल प्रयाग किया, उनको चिन्हित करके, उनके खिलाफ अनुशासनिक एवं क्रिमनल केस चला कर सख़्त से सख़्त क़ानूनी कार्रवाई की जानी चाहिये, जिससे कि भविष्य में इस तरह की घिनौनी हरकत करने की कोई हिम्मत ना कर सके।
- इसके साथ-साथ, सरकार को आन्दोलन कर रहे छात्रों व युवाओं के ख़िलाफ जो भी FIR या complaint दायर की गई है, उन सभी को वापस ले लिया जाये, जिससे इनको आगे चलकर थानों व कोर्ट कचहरी के चक्कर ना काटने पड़े और इस वजह से उनका भविष्य भी ख़राब ना हो, जिससे फिर देश में सौहार्दपूर्ण वातावरण बन सके।
- साथ ही मेरा सभी आन्दोलनकारियों से यह कहना है कि वो इस मामले में किसी भी पार्टी को उनके इस संघर्ष का राजनीतिकरण ना करने दें तथा अपने भविष्य को भी ख़राब ना होने दें।
लखनऊ
➡️BSP अध्यक्ष मायावती के आवास का घेराव
➡️69000 शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थियों ने घेराव किया
➡️कल मंत्री संदीप सिंह के आवास पर प्रदर्शन किया था
➡️नियुक्ति की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थी
➡️मायावती के आवास पर अभ्यर्थियों का प्रदर्शन
➡️6800 चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्ति की मांग
➡️5 जनवरी को अभ्यर्थियों की चयन सूची आई थी
#Lucknow #protest @UPGovt@CMOfficeUP@AdminLKO@lkopolice
बहुजन समाज के लोग आज जिस गर्व और जोश के साथ जय भीम का नारा लगा रहे हैं, उसके पीछे मुख्य रूप से मान्यवर कांशीराम साहब और बहन मायावती जी का संघर्ष है। जहाँ-जहाँ उनका आंदोलन पहुँच पाया, वहाँ बहुजन समाज राजनीतिक और सामाजिक रूप से मजबूत हुआ। कई राज्यों में बहुजन समाज के नेता मुख्यमंत्री तक बने, और यह दशकों के संघर्ष का परिणाम है।
इसलिए बहन जी की बात को शांत मन से समझिए। वह जो कहती हैं, उसमें आपके और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की चिंता और हित निहित है।
1.काकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का देश की राजधानी नई दिल्ली में संसद के नज़दीक जन्तर मन्तर में पिछले कई दिनों से, ख़ासकर मेडिकल की नीट जैसी विशेष परीक्षा आदि में पेपरलीक व अन्य गड़बडियों के दुष्परिणामों से छात्र-छात्राओं व उनके परिवार के काफी बुरी तरह से प्रभावित हो रहे जीवन को लेकर जारी अनिश्चितकालीन आन्दोलन के कारण सड़क से लेकर संसद तक में ज़बरदस्त हंगामा बरपा है और अब इसका राजनीतिकरण करने से यह मुद्दा सरकार के साथ सीधे टकराव का हो गया है, जिस विषम स्थिति से देश को निकालना ज़रूरी है, क्योंकि इससे दिल्ली में ही नहीं बल्कि विभिन्न राज्यों में भी आम जनजीवन प्रभावित हो रहा है।
2.वैसे चाहे पूरे देश में अयोध्या श्रीराम मन्दिर में चढ़ावा चोरी/ग़बन आदि का गर्म मामला हो या फिर आल-इण्डिया व राज्यों की परीक्षाओं आदि में पेपरलीक का मुद्दा हो, यह सभी मूलतः भ्रष्टाचार के हर स्तर पर पनपने का ही परिणाम है।
3.इसके साथ ही यह संवैधानिक नैतिकता (constitutional morality) से भी जुडा़ मामला है, जिसके अभाव में यह देश को दीमक की तरह खाता चला आ रहा है, जबकि संविधान निर्माता परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर ने गुड गवरनेन्स हेतु इस पर ख़ास ध्यान देने की ज़रूरत पर विशेष बल दिया है।
4.संक्षेप में मेरा यही कहना है कि देश व जनहित से जुड़े वर्तमान विकट हालात के सौहार्दपूर्ण समाधान हेतु सरकार तथा माननीय कोर्ट जैसी संवैधानिक संस्थाओं को अपनी भूमिका निभाने की पहल करनी चाहिये तो यह बेहतर होगा।
5.साथ ही, सीजेपी के व्यापक हो रहे आन्दोलन का अब विभिन्न राजनीतिक पार्टियों द्वारा अपने-अपने संकीर्ण स्वार्थ में राजनीतिकरण करके सड़क से लेकर संसद तक में टकराव व हिंसा किया जाना घोर अनुचित। सरकार व आन्दोलनकारी दोनों मिलकर इसका शान्ति व सौहार्दपूर्ण समाधान जितना जल्द निकालें उतना ही उचित।
जो कुछ ना समझे वो अनाड़ी है
संजय सिंह ने राहुल गांधी को भाजपा की बी टीम बता दिया बल्कि उससे भी आगे @RahulGandhi को @narendramodi का आदेश मानने वाला नौकर कह दिया है अपनी शैली में
उसी धरने में गए @yadavakhilesh के बारे में खामोशी ।
सबसे बड़े संवैधानिक पद पर बैठी द्रौपदी मुर्मू जी कोलेजियम जजों से नाखुश रहती हैं तो कुछ कर नहीं पाती हैं बस दबी आवाज़ में नाराज़गी जता देती हैं।
सबसे कम संसदीय प्रतिनिधित्व के साथ बैठी मायावती जी जब जजमेंट से नाराज़ हुई हैं तो 21 अगस्त को पूरा देश नीला होने जा रहा है।
ये फ़र्क होता है खुद की ज़ुबान रखने वाले नेताओं में और एहसान तले दबे कथित बड़े नीति निर्माताओं में।
2 अप्रैल 2018 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद थे।
21 अगस्त 2024 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू हैं।
मगर दोनों भारत बंद का इतिहास लिखा जाएगा तब मायावती का नाम सबसे ऊपर रखा जाएगा।
बस हिंसा न हो, किसी की जान ना जाए तो सबकुछ सफल, सोने पर सुहागा सा हो जाएगा।
राहुल गांधी कह रहे हैं "नेहरूजी जिंदा होते तो कांशीराम जी को मुख्यमंत्री बनाते।"
प्रधानमंत्री का पद नेहरू गांधी परिवार के लिए ही रिजर्व था तो मजबूरी थी, इसलिए बनाते तो अधिकतम मुख्यमंत्री ही बनाते।
आगे इंदिरा के कार्यकाल में कांशीराम ने पॉलिटिक्स शुरू की, संगठन बनाए। राजीव गांधी के कार्यकाल में पार्टी बनाकर कई राज्यों में विस्तार किए। फिर भी नहीं खयाल आया कोई बात नहीं राजीव के बाद जरूरत थी मगर राव को प्रधानमंत्री बना दिए।
उनके कार्यकाल में कांशीराम ने सबसे बड़े प्रदेश में पहले मुलायम सिंह फिर मायावती को मुख्यमंत्री बनाया, यूपी ही नहीं मध्य प्रदेश से लेकर पंजाब तक सांसद, 7-8 राज्यों का तीसरा सबसे बड़ा दल बना दिया।
BJP ने उन्हें राष्ट्रपति का पद ऑफर किया उन्होंने ठुकरा दिया।
इसके बाद क्या बचा?
यही सबसे पावरफुल पद, प्रधानमंत्री का।
उधर अटल थे और इधर सन्नाटा, सोनिया गांधी शुरुआत में सिर्फ सक्रिय हुई थीं।
आधे राज्य के नेता देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री बना दिया गया, चलो यहां बहाना है कि जनता दल और सहयोगियों की तरफ से प्रस्ताव था और उन्हीं की सरकार, हमारी कितनी चलती।
फिर अटल की सरकार बनी और एकतरफा छाए रहे। केंद्र में वो गठबंधन का दबाव डालते रहे तो बीएसपी ने राज्य में अपनी ही सरकार गिरा दी और 2004 में BJP यूपी में गर्त में चली गई, इसी वजह से केंद्र की सत्ता चली गई।
साफ था सांप्रदायिक शक्तियों से गठबंधन न करने की कीमत पर अपनी सरकार गिरा देने वाली नेता को प्रधानमंत्री बना सकते थे क्योंकि कांशीराम बीमार थे मगर मनमोहन को पकड़ ले आए कहीं से।
उधर कांशीराम के निधन के बाद बिखरने के बजाय उनकी पार्टी और एकजुट हुई बहुमत से यूपी की सरकार में आ गई।
मनमोहन अच्छा कर रहे थे, मायावती उनसे दोगुना अच्छा करके दिखा दीं। लेफ्ट ने लामबंदी करके लगभग 100 सांसदों का समर्थन मायावती के लिए किया, तब भी दोबारा मनमोहन को ही बना दिए।
यहां तक ठीक था मगर देशभर की मीडिया लेकर, तब की अपनी गोदी मीडिया लेकर खुद राहुल नोएडा में हल्ला मचाने लगे, BSP सरकार को किसानों का दुश्मन बताने लगे, जबकि किसानों को चार गुना ज्यादा मुआवजा देकर जमीन ली गई थी जो बाद में खुद भी स्वीकार किए और यूपीए 2 सरकार के आखिरी में इसी को खुद कानून बना दिए।
फिर 2014 और 2019 में जो बुरा हाल था कि विपक्ष में कोई किसी को नहीं बचा बना सकता था।
2024 में मौका मिला तब आपने क्या किया? शिवपाल और रामगोपाल को चौधरी घोषित कर दिए?
आंकड़े उठाकर देखिए, इस चुनाव में इंडिया गठबन्धन की सरकार सिर्फ इसलिए नहीं बनी है कि बीएसपी से गठबंधन नहीं किया गया।
अब शायद अफसोस हो रहा है इसलिए राहुल गांधी पुरानी बात के बहाने कहना चाह रहे हैं कि कांशीराम को नेहरू जी मुख्यमंत्री नहीं बना सके, हम बहनजी को मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं।
जो गलती 2024 में हुई उसे 2027 और 29 में नहीं दोहराना चाहते हैं।
BSP कमजोर हुई है तो मौका है खुलकर बोलिए राहुल जी, हम साझा और बड़ा गठबंधन बनाना चाहते हैं।