कांचा घांचीबौली तो झांकी है
पृथ्वी अभी बाकी है।।
अगर आज हमने पृथ्वी को क्लाइमेट चेंज के खतरे से बचाने के लिए अपने किसी पर भी आश्रित रहे बिना प्रयास नहीं किया, तो फिर तो पृथ्वी को बचाना बहुत मुश्किल ही नहीं नामुमकिन बन जाएगा।
मीडिया, सरकार, धनपति, कोर्ट , प्रशासन कुछ नहीं करने वाले आप और मैं ही सोशल मीडिया पर सतर्क रहकर, क्लाइमेट चेंज के सारे तथ्यों को जानकर इस संकट से पृथ्वी को बचा सकते है।
कृष्ण सिर्फ उनके है जो संघर्ष करते है।
https://t.co/2zR83NTC6m
@Advait_Prashant
पूरा-का-पूरा ग्रह भेंट चढ़ गया हमारे अरमानों की और ये अरमान ऐसी चीज़ है न, ये सबकुछ खा लें तो भी पूरे नहीं होते।
मरेंगे हम, पर ऐसा नहीं कि सिर्फ गर्मी के हाथों मरेंगे, हम अपने पागलपन के हाथों मरेंगे। हम मरने से पहले पागल होकर मरेंगे। विक्षिप्त सब घूम रहे होंगे सड़कों पर, पागल। अपने ही कपड़े फाड़ते हुए, बिलकुल तपती हई सड़कों पर निकलेंगे कुछ दूर तक चलेंगे और फिर लाश बनकर जलती हुई सड़क पर ढह जाएँगे – ऐसे अंत होगा मानवता का। वो जानवरों में दिखाई दे रहा है, पक्षियों में दिखाई दे रहा है, पक्षियों का व्यवहार बदल गया है, पक्षियों का मीटिंग बिहेवियर बदल गया है। जो लोग थोड़ा कृषि की पृष्ठभूमि से हैं, ग्रामीण क्षेत्रों से हैं, वो जानते होंगे कि फ़सलों का व्यवहार बदल गया है।
तापमान बढ़ रहा है। बाहर जो तापमान बढ़ रहा है वो हमें भीतर से विक्षिप्त कर रहा है, हम पागल हो रहे हैं। हम भी पागल हो रहे हैं, चिड़िया पागल हो रही है, गाय पागल हो रही है, कुत्ते पागल हो रहे हैं, मास इनसेनिटी। हमे सज़ा ये मिल रही है कि अपनी विलुप्ति से पहले हम अपनी विक्षिप्तता देखेंगे। घर-घर में लोग एक-दूसरे को मार रहे होंगे।
जब पीने को पानी नहीं मिलने वाला, तो क्या करोगे? तापमान इतना बढ़ जाएगा क्या करोगे? और ये सबकुछ न एक जगह पर जाएगा, एक टिपिंग प्वाइंट (टिप बिंदु) पर और वहाँ से भरभराकर गिरेगा। अभी तो क्या हो रहा है, तापमान बढ़ता है, तो हम एसी के माध्यम से उसको कंटोल कर लेते है। बहुत लोगों को तो पता भी नहीं चलता। जिन लोगों के पास कूलिंग की व्यवस्था है, उनको ये सब बातें ऐसी लगती हैं कि किसी और लोक की हो रही हैं। 'कौनसा क्लाइमेट, कौनसा टेम्प्रेचर, सब तो ठीक चल रहा है, क्या हो गया?' उन्हें नहीं समझ में आ रहा।
~ @Advait_Prashant ❤️
नमस्ते! आपने सही कहा—हम नदी और भूमि को "माँ" कहते हैं, पर उनकी हालत दयनीय है। 2024 के पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक में भारत 180 में से 176वें स्थान पर है, जो खराब हवा और प्रदूषण को दर्शाता है। संस्कृति में सम्मान है, लेकिन कोयले पर निर्भरता और कचरा प्रबंधन की कमी इसे बिगाड़ रही है। शायद यह हमारी लापरवाही है—क्या हम सच में "लटखोर" हैं, या अब जिम्मेदारी लेने का वक्त है?
संक्षेप: भारत नदी-भूमि को "माँ" कहता है, पर 2024 EPI में 176वें स्थान पर है। संस्कृति और कार्यों में अंतर है—क्या हम लापरवाह हैं?
जब गृहस्थी चलाने के लिए पर्याप्त कमाई की योग्यता न हो तब पाखण्ड फैलाते हैं।
सनातन के नाम पर अंधविश्वास फैलाते हैं।
देश की जनता का खून चूस कर पीते हैं।
कोई सवाल पूछो तो जवाब नहीं देते है।