संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के शब्द केवल व्यक्तिगत विचार नहीं होते बल्कि संस्थाओं की गरिमा का प्रतिनिधित्व करते हैं।ऐसे में दिए गए बयान संतुलित, मर्यादित और समाधान-केंद्रित होने चाहिए।लोकतंत्र में न्यायपालिका पर जनता का विश्वास उसकी गंभीरता और निष्पक्षता से मजबूत होता है।
हमारे बाद महफ़िल में अफ़साने बयां होंगे,
बहारें हमको ढूँढेंगी न जाने हम कहाँ होंगे..." 🕊️
कलाकार शरीर छोड़ते हैं, लेकिन उनकी कला हमेशा अमर रहती है।
सिनेमा जगत के शेर नाना पाटेकर जी भले ही हमारे बीच नहीं रहे लेकिन हमारे दिलों में हमेशा याद रहेंगे।
Om Shanti 🙏
#NanaPatekar
@kaankit आपके बात पर मैं सहमत नहीं हूँ।
वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए विदेश नीति बहुत ही नरम है साथ ही भारत अपना पक्ष शक्तिशाली देशों के खिलाफ भी रख पाने असमर्थ दिख रहा है। चाहे कारण जो भी हो।
@kaankit देश की जनता अदालत से इंसाफ सुनना चाहती है, उपमाएँ नहीं।
‘Cockroach’ जैसे शब्द शायद कुछ सेकंड की सुर्खियाँ दे दें, लेकिन न्यायपालिका की गरिमा शब्दों की गंभीरता से ही बनती है।
कुर्सी जितनी बड़ी, भाषा उतनी संतुलित होनी चाहिए।