Rahul Gandhi is NO champion of women’s rights. He is simply a Hindu baiter, using the cause of women’s empowerment as a convenient smokescreen to target and discredit Hindu Dharma.
Consider this: how many times has he spoken with the same outrage against patriarchal and medieval practices that persist under Sharia ? NEVER.
While Sharia is foundational to Islamic jurisprudence, Manusmriti has no comparable scriptural authority in Hindu Dharma. It is not even a universally binding code for Hindus.
Yet ask yourself: how many times does Rahul Gandhi attack the Manusmriti, and how many times does he attack Sharia with the same fervour?
The enduring strength of Hinduism lies in its unique ability to evolve, reform and adapt with time- as it has for millennia, and as it will for eternity.
Every Hindu must therefore ask: what is Rahul Gandhi’s real intent- championing women’s rights, or using them as a pretext to malign Hindu Dharma?
Cong rhetoric on women’s rights rings hollow when measured against its own record.
They betrayed our mothers and sisters by reversing the effect of the Shah Bano judgment.
It opposed the law against Triple Talaq. And just to cling to power in Karnataka, Rahul Gandhi ensured that not a single woman found a place in the State Cabinet.
So here is a simple challenge to Rahul Gandhi:
If women’s equality truly comes before politics, will he unequivocally support a Uniform Civil Code that guarantees equal rights irrespective of religion?
Or will his idea of “women’s rights” continue to begin and end with attacking Hinduism?
Congress on stage: Smash the Patriarchy
Congress in power: Zero women in Karnataka and Himachal cabinets
When Preeti Choudhary asked Supriya Shrinate three times about this, she ran from the question every single time.
They print "Smash Patriarchy" on posters but when they get power, they smash women's representation instead.
ब्राह्मण का अपमान भी संविधान के खिलाफ है!
स्वामी रामदेव जी का साफ संदेश:👇
एसएसटी के साथ अन्याय हो रहा है तो ब्राह्मण के साथ भी। कुछ लोग ब्राह्मणों को गाली देकर ब्राह्मण तंत्र-बनिया तंत्र का नारा लगा रहे हैं...ऐसा नहीं चलेगा।
न क्षत्रिय, न वैश्य, न शूद्र, न ब्राह्मण, न सन्यासी — किसी को भी गाली मत दो। समाज में भेद की दीवारें खड़ी करके लोगों को लड़ाने की कोशिशें बंद होनी चाहिए।
संविधानिक अधिकार हर नागरिक के हैं। अपमान किसी का भी गलत है।
ये तो शुरुआत है ...
जिस दिन पुराने अंदाज में आ गया न सवर्ण समाज ताप से जल जाओगे सब के सब, वो तो चुप हैं क्योंकि देश में उपद्रव नहीं होने देना चाहते हैं और वो गर्मी आज भी बच्चा बच्चा के खून में है....
ये जो पावर और सत्ता का खेल खेल रहे हो वो भी सवर्ण समाज का देना है, और भाजपा जो आज 2 सीट से 300+ पर बैठा है वो भी सवर्ण समाज का ही देन है तो मजबूर मत करो....
धन्यवाद अजीत भाई @ajeetbharti@AjeetBhartii
RHA को ले कर सरकार से कुछ बात और माँगें
सरकार अपने स्तर से हर आंदोलन को फूट, समझौता, बल-प्रयोग, समझदारी, मिसइन्फॉर्मेशन कैम्पेन या कायरता दिखा कर कर समाप्त करना चाहती है। और वही उनका कार्य भी है। RHA का नाम ले कर कुछ लोगों ने आंदोलन के लिए जनता को बुलाया और लगभग 7000 की भीड़ जंतर मंतर पर भीतर दिखी, उतने को ही बाहर होल्ड किया गया या लौटा दिया गया।
मैंने केवल दिल्ली पुलिस की बकलोली की अवज्ञा के लिए इसमें भाग लेने की बात की और फिर बहुत लोग मेरे आने पर भी आए। फिर दुबे को पाठक जी ने नेता मान कर एक ऐसे पत्र पर चर्चा के लिए आश्वासन दिया जिसमें आरक्षण शब्द ही नहीं है।
खैर, मैं ये सब तकनीक देखता और जानता आया हूँ। मुझे इस विषय पर सरकार को भीड़ दिखाने की आवश्यकता न पहले थी, न आज है, पर जब चाहूँ वह भी कर सकता हूँ। अगली बार बिना अनुमति के भी ऐसा किया जा सकता है यदि प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट चाहिए, तो वह भी दिखा देंगे। पर मेरा लक्ष्य वह है ही नहीं।
सरकार को ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ से इसलिए नहीं डरना चाहिए क्योंकि एक भीड़ पूरे कनॉट प्लेस को घर कर पत्थरबाजी करते हुए संसद घेर लेगी। सरकार को इसलिए डरना चाहिए कि ऐसी कोई भीड़ ही नहीं है, न ही हम संसद को घेरने की योजना बना रहे हैं।
आंदोलन की तपन केवल जलती हुई कार की आग और अराजक भीड़ की ही नहीं होती। एक तपन ऐसी भी होती है जब जनमानस को वैचारिक रूप से इतना सक्षम बना दिया जाता है कि वह स्वयं ही अपने लिए वह निर्णय कर ले, जो वो कल तक किसी दूसरे बहकावे में आ कर कर रहा था।
हमारी माँगें:
१. आरक्षण पर श्वेत-पत्र: क्या लाभ हुआ, किन जातियों को अनुपात से अधिक लाभ लगातार मिला, कौन सी जातियाँ पूर्णतः छूट गईं। आरक्षण किस तरह से देश या समाज के उत्थान में सहायक है, उसके लिए आँकड़े क्या कहते हैं आदि आदि! इस से जुड़ी हर वह रिपोर्ट और सर्वेक्षण जो सार्वजनिक नहीं हुई।
२. EWS को हर वह आर्थिक सहायता दी जाए जो SC को मिलती है। निःशुल्क कोचिंग, निःशुल्क फॉर्म, शून्य हॉस्टल और कोर्स फीस। फिर भी लोन यदि लेना पड़े तो उसमें भी सुविधा।
३. तीनों ही आरक्षित वर्ग में ‘कोटा विदिन कोटा’ लागू हो ताकि वास्तविक दलित-पीड़ित-वंचित जातियों तक लाभ पहुँचे। अभी SC और OBC में हजार-हजार जातियाँ ऐसी हैं जिन्हें नगण्य आरक्षण मिला है। और 4-5 जातियाँ ऐसी हैं जो 70-80% आरक्षण खा रही हैं। इसका आधार पारिवारिक आय हो, न कि वैयक्तिक और दुरुपयोग की संभावना न रहे।
४. मेरिट का सम्मान हो। आरक्षित वर्ग का कटऑफ किसी भी हालत में सामान्य वर्ग के कटऑफ के (से नहीं) 10% के रेंज से बाहर न जाए। और यह भी आज की परीक्षा के अधिकतम आयु सीमा वाले बच्चों की आयु के बाद समाप्त किया जाए। न्यूनतम क्वालिफाइंग मार्क्स तो तय होना ही चाहिए।
५. सरकार यह सर्वेक्षण करे कि क्या गरीबी, भेदभाव या पिछड़ेपन से किसी की बौद्धिक क्षमता घट या बढ़ सकती है? इम्पीरिकल एविडेंस सार्वजनिक करें और उसी आधार पर आरक्षण की नीतियाँ बनें।
६. एक व्यक्ति को एक बार आरक्षण मिले। एक परिवार को एक बार आरक्षण मिले।
७. दशकीय समीक्षा हो। समाप्ति के लिए एक ‘सनसेट क्लॉज’ या रोडमैप कि कब तक रहेगा।
८. कॉलेज/यूनिवर्सिटी पुस्तकालयों में पुस्तकों के अलॉटमेंट का आरक्षण तत्काल निरस्त हो। इसका कोई लॉजिक नहीं है। यह आरक्षण से लड़ कर वहाँ पहुँचे बच्चों को सताने की व्यवस्था मात्र है। या आप पुस्तकों की मात्रा दोगुनी कीजिए और वहाँ ‘आरक्षित सेक्शन’ लिख दीजिए।
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अन्य माँगें:
९. यूजीसी नियमावली निरस्त हो या समीक्षा कर के हर जाति समूह को इसमें सम्मिलित किया जाए।
१०. SC/ST Act की तर्ज पर ‘सवर्ण उत्पीड़न (रोकथाम) कानून पास’ हो। दोनों ही कानून में केस झूठा पाए जाने पर, उस केस में होने वाला दंड आरोप लगाने वाले को झेलना पड़े। आर्थिक जुर्माना भी वसूला जाए।
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सरकार और सुधिजन देख लें। बाकी, चाहे आप दुबे, शेखावत या अन्य को मैनेज कर लें, आंदोलन चलता रहेगा।
@Mayawati अम्बेक्डकर का तो मान लो उसने भी 10 साल का आरक्षण मांगा लेकिन आप लोग साँप बनकर कुंडली मार के बैठे आरक्षण के वोट बैंक पर
आरक्षण तो उन्हें मिले जो लायक़ है जो एससी एससीटी में अति पिछड़े है समीक्षा हो
और कौनसी सदियो से दलितों पर अत्याचार हुआ है
कहाँ लिखा है
CJP’s credibility is over
CJP co-convenor Ashutosh Ranka and his team were chased away by locals the moment they tried to enter Bagru village in Rajasthan.
No welcome...No support....Just rejection😆😆
The same group that claimed to represent students and the public is now being driven out by ordinary people.
No one trusts them anymore