15 years old. Main character energy⚡ The centre of every Indian cricket conversation.
𝐕𝐀𝐈𝐁𝐇𝐀𝐕 𝐒𝐎𝐎𝐑𝐘𝐀𝐕𝐀𝐍𝐒𝐇𝐈 is built different. 🌟
What were 🫵 doing at 15? 👀
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Before she left the competition mat for the final time for the day, Vinesh Phogat turned around and looked straight at where the WFI officials were seated.
As she caught their eye, she pointed her index finger down at the mat.
“Wapas aungi isi mat pe (I’m going to come back on this very same mat)” she said.
@jon_selvaraj✍️on the day Vinesh faced and overcame multiple obstacles but ultimately fell short in her comeback at the Asian Games selection trials in New Delhi.
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A wise man had once said, “Shubman ke run nahi ho rahe, Sanju ko waapas try kare?”
Meanwhile, Shubman:
“Rood Matt, sirra jatt
Likhe tatt, hale jaana end tak”
Ghost Debut से Best Debut in IPL तक, कहानी प्रफुल्ल हिंगे की
जॉइनिंग के दिन, ऑफ़िस पहुंचने के बाद भी नौकरी ना मिले तो कैसा लगता है? बहुत बुरा. लेकिन ये जीवन का अंत नहीं है. जीवन इससे कहीं आगे है और इस जीवन को कैसे जीना है, इसकी प्रेरणा प्रफुल्ल हिंगे से लीजिए. विदर्भ से आने वाले प्रफुल्ल IPL के इतिहास में पहले ओवर में तीन विकेट लेने वाले इकलौते बॉलर हैं. और इसी IPL में इनके साथ वैसा ही कुछ हुआ था, जिसका ज़िक्र मैंने शुरू में किया.
पंजाब के खिलाफ़ मैच में ईशान किशन ने टॉस पर कहा था,
‘सलिल अरोड़ा लियम लिविंगस्टन की जगह और प्रफुल्ल हिंगे जयदेव उनादकट की जगह उतरेंगे. ये उनका डेब्यू गेम होगा.’
मैच में जाने क्या बदला, हिंगे को मौका नहीं मिला. उनादकट उस मैच में इम्पैक्ट प्लेयर के रूप में उतरे. Change of plans, may be. प्रफुल्ल के लिए इसमें कुछ नया नहीं था. उन्होंने अपना करियर एक बल्लेबाज के रूप में शुरू किया था. लेकिन बाद में पिता के कहने पर वो बोलिंग करने लगे. भारतीय पेसर उमेश यादव ने कॉमेंट्री में बताया कि प्रफुल्ल अभी भी अच्छी बैटिंग करते हैं. लेकिन हाइट और बिल्ट के चलते पिता के कहने पर उन्होंने मुख्यतः बॉलर बनने का फैसला किया.
बड़े लेवल पर आते ही प्रफुल्ल को जीवन का सबसे बड़ा चैलेंज मिल गया. उनकी कमर में तकलीफ़ हो गई. पेस बोलर्स के लिए कमर की तकलीफ़ बहुत आम है. सही से ट्रीट ना हो तो करियर खराब हो जाता है. बाद में इससे उबर प्रफुल्ल ने विदर्भ के लिए 2024-25 में फर्स्ट क्लास डेब्यू किया. रणजी चैंपियन बने. अभी तक उनके नाम 10 मैच में 27 फर्स्ट क्लास विकेट हैं. प्रफुल्ल ने राजस्थान के खिलाफ़ उतरने से पहले सिर्फ एक T20 मैच खेला था. SMAT के इस मैच में उन्होंने उमेश यादव के साथ बोलिंग की थी. 4 ओवर में 23 रन देकर 1 विकेट लिया.
SRH के बॉलिंग कोच वरुण ऐरन ने व्यक्तिगत तौर पर ज़ोर देकर प्रफुल्ल को खरीदा. जब प्रफुल्ल डेब्यू पर ही इतिहास रच रहे थे, तो वरुण के चेहरे की हंसी थम ही नहीं रही थी. वरुण ये सारी खुशियां डिजर्व करते हैं क्योंकि उन्होंने ना सिर्फ प्रफुल्ल को 30 लाख में खरीदा. बल्कि उन्हें जयदेव उनादकट और हर्षल पटेल पर वरीयता भी दी. MRF पेस अकैडमी के ट्रेनी रहे प्रफुल्ल पैट कमिंस को अपना आइडल मानते हैं. स्पोर्ट स्टार से बातचीत में उन्होंने कहा था,
‘मैंने शुरुआत से ही उन्हें देखा है. जिस तरह से वह बॉलिंग करते हैं, जैसे कप्तानी करते हैं. मैं उनकी टीम का हिस्सा होकर ख़ुद को बहुत भाग्यशाली मान रहा हूं.’
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Indian Football Club defeated Liverpool U-15 सच में?
बीते कुछ वक्त से पूरा सोशल मीडिया एक क्लेम से भरा है. एक भारतीय क्लब ने दुनिया के सबसे बड़े क्लब्स में से एक की अंडर-15 साइड को बुरी तरह से हरा दिया. दावे हैं कि ये मैच यूथ वर्ल्ड कप टाइप के किसी इवेंट में हुआ. इसे भारतीय फ़ुटबॉल के लिए आशा की किरण बताया जा रहा है. काफी सेलिब्रेशंस हैं. लेकिन सच क्या है? कौन बताएगा? अगर आपके दिमाग़ में भी ऐसे सवाल आए तो सुनिए- मैं हूं ना.
सच है कि मिनर्वा फ़ुटबॉल क्लब ने लिवरपूल की अंडर-15 टीम को कैटालोनिया में हराया. लेकिन सच बस इतना ही है. इस ख़बर के इर्द-गिर्द चल रहे लगभग सारे दावे बेकार हैं. उनमें उतना ही दम है जितना किसी क्रिकेटर के बच्चे के चलते आदित्य धर के अंडर-19 वर्ल्ड कप मिस करने की ख़बर में. जिस टूर्नामेंट में ये मैच खेला गया वो कम से कम इस लेवल पर तो बहुत सीरियस टूर्नामेंट नहीं है. ये एक मेले जैसी व्यवस्था है. पैसे देकर आप भी अपनी टीम के साथ इसमें भाग ले सकते हैं.
भाग लेने के लिए शुल्कों की बाक़ायदा सूची है. आपको होटल समेत तमाम व्यवस्थाएं चाहिए तो ज्यादा पैसे, नहीं तो कम पैसों में काम हो जाएगा. तो सबसे पहली बात तो यहीं क्लियर है कि ये योग्यता पर आधारित टूर्नामेंट नहीं है. और जिस टूर्नामेंट में भाग लेने के लिए योग्यता नहीं, पैसे लगते हों. वहां के रिजल्ट्स को मैं उतना ही मानता हूं जितना साउथ वाले फिजिक्स को. इस टूर्नामेंट में भाग लेने के पीछे मुख्यतः दो कारण होते हैं- पहला एक्सपोज़र मिल जाएगा और दूसरा भाग्य सही रहा तो किसी स्काउट की नज़र में आ जाएंगे. जिससे बड़े लेवल पर मौके मिलने की उम्मीद जग जाती है.
आगे ब़ढ़ने से पहले एक और चीज़ जाननी जरूरी है. एलीट क्लब्स की अकैडमीज़ इन टूर्नामेंट्स में अलग स्ट्रैटेजी के साथ उतरती हैं. इनमें सबसे कॉमन स्ट्रैटेजी है- नीचे के ग्रुप वाले बेस्ट प्लेयर्स को उनकी उम्र से ऊपर खिलाओ. जिससे उन्हें और बेहतर होने का मौका मिले. इस मैच मे भी यही हुआ. लिवरपूल के अंडर-15 के बेस्ट प्लेयर्स ऊपर की टीम्स में खेल रहे थे. बचे हुए प्लेयर्स में भी जो एलीट थे, वो इस मैच में नहीं खेले. क्योंकि सुबह ही टीम ने एक और मैच खेला था. जी हां, यहां ऐसे ही मैच खेले जाते हैं. दिन में एक से ज्यादा मैच खेलना कॉमन है. और ये मैच भी रेगुलर 90 मिनट की जगह 25-25 मिनट के दो हाफ में बंटे होते हैं.
क्यों, क्योंकि जग दर्शन का मेला. और 5-6 दिन चलने वाले इस मेले में आने वालों की नज़र खेलने और मौज-मस्ती दोनों पर होती है. खेलो, टहलो-घूमो, एन्जॉय करो और घर जाओ. हालांकि इन तमाम चीजों के बावजूद मिनर्वा की उपलब्धि कम नहीं हो जाती. यूरोप की घटिया से घटिया अकैडमी के पास भी भारत की टॉप अकैडमी से बेहतर सुविधाएं होती हैं. किसी भी लेवल पर उन्हें हराना एक बड़ी अचीवमेंट है. इसे सेलिब्रेट करना चाहिए, लेकिन ज़मीन पर रहते हुए. इस जीत का बिल्कुल भी अर्थ नहीं है कि हमारी फ़ुटबॉल एकाएक बहुत शानदार हो गई है.
आपकी फ़ुटबॉल अभी भी उसी स्तर पर है. इस जीत का कोई ख़ास महत्व नहीं है. ये ऐसा ही है कि किसी broke person को गिरे हुए पांच लाख मिल गए. पांच लाख के मजे उठाइए, खुशियां बांटिए लेकिन याद रखिए कि आप अभी भी वही broke person हैं. जिसे ग़रीबी रेखा से ऊपर उठने के लिए भी बहुत प्रयत्न करने हैं. तो ये जीत की बधाई रहेगी आप सबको, लेकिन जानकारी पूरी रखिए. अरे हां, इससे बड़ी जीत 5-6 अगस्त 2018 को मिली थी. जब हमने सीरियस टूर्नामेंट Cotif में अर्जेंटीना अंडर-20 को हराया था. वो टीम भी असली थी और उसके प्लेयर्स भी एलीट थे. आधी से ज्यादा टीम आज यूरोप की टॉप लीग्स में खेल रही है. ये जीत उसके आगे कुछ नहीं है. कुछ भी नहीं.
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