🌺🙏 माँ कामाख्या की महिमा अपरंपार है! 🙏🌺
असम की पावन धरती पर स्थित Kamakhya Temple सदियों से श्रद्धा, भक्ति और शक्ति का प्रतीक रहा है। 🔱
कहते हैं कि जहाँ सच्ची आस्था होती है, वहाँ भक्तों को माँ की उपस्थिति का दिव्य अनुभव होता है। 🌸
यह वीडियो भी माँ की महिमा से जुड़ी एक अद्भुत झलक प्रस्तुत करता है, जिसे देखकर मन श्रद्धा से भर उठता है। 🙏💖
जय माँ कामाख्या! 🌺
माँ की कृपा आप सभी पर बनी रहे।
#JaiMaaKamakhya #KamakhyaTemple #Faith #Bhakti 🙏🔱🌸
हिन्दू धर्म को अपशब्द कहे ब्राह्मणों को गाली दी देश विरोधी नारे लगे शाहीन बाग बनाने की तैयारी की
पुलिस स्टेशन के बाहर छोड़ो अंदर घुस के पीटूँगा
5 बजे अधिवक्ताओं का एक दल @DCPNewDelhi को याचिका देगा
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पश्चिम बंगाल के जनादेश के बाद भारतीय राजनीति सदा के लिए बदल चुकी है
कल मुझे बताया गया कि INDI गठबंधन के सदस्य अब ममता बनर्जी के फोन तक नहीं उठा रहे हैं। कुछ माह पहले तक यह अकल्पनीय था। किन्तु यह तो केवल उन घटनाओं की प्रस्तावना है जो आगे घटित होने वाली हैं।
पश्चिम बंगाल का परिणाम मात्र एक चुनावी परिणाम नहीं है। यह एक वैचारिक भूकम्प है, जिसके झटके आने वाले एक दशक तक भारतीय राजनीति में महसूस किए जाएंगे।
बंगाल में भाजपा की विजय केवल ममता बनर्जी को पराजित करने अथवा तृणमूल कांग्रेस के दीर्घकालीन शासन का अंत करने की घटना नहीं है। यह उससे कहीं अधिक व्यापक विषय है—यह भारतीय राजनीति की केंद्रीय भाषा के रूप में हिन्दू चेतना के पूर्ण मुख्यधाराकरण का प्रतीक है।
दशकों तक भारत को यह बताया गया कि हिन्दू अस्मिता का उद्घोष खतरनाक है, सनातन पर गर्व साम्प्रदायिकता है, मंदिर-आधारित राजनीति प्रतिगामी है, और राजनीति का एकमात्र स्वीकार्य स्वरूप तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीति है, जो तुष्टीकरण, अल्पसंख्यक वीटो, चयनात्मक आक्रोश और हिन्दू अपराधबोध पर आधारित है।
बंगाल ने उस सम्पूर्ण तंत्र को भेद दिया है।
जिस राज्य को कभी हिन्दुत्व-विरोधी राजनीति के बौद्धिक दुर्ग के रूप में प्रस्तुत किया जाता था, उसी राज्य ने अब ऐसा जनादेश दिया है जो कहता है कि भारतीय मतदाता अब अपनी सभ्यतागत पहचान के लिए क्षमायाचक नहीं है। मतदाता अब यह स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिन्दू स्वाभिमान को दबाया जाए।
और लगभग तत्काल ही देखिए कि तमिलनाडु में क्या हो रहा है।
सनातन-विरोधी वक्तव्यों के सबसे मुखर राजनीतिक वाहकों में से एक DMK धराशायी हो चुकी है। DMK के नेता अब खुले रूप से कह रहे हैं कि INDIA गठबंधन समाप्त हो चुका है। यह केवल एक गठबंधन का विघटन नहीं है; यह सम्पूर्ण भाजपा-विरोधी मोर्चे के वैचारिक विखंडन की शुरुआत है।
INDI गठबंधन कभी विचारों का गठबंधन था ही नहीं। वह भय का गठबंधन था।
मोदी का भय।
भाजपा का भय।
RSS का भय।
उस हिन्दू मतदाता का भय, जिसने मौन रहना छोड़ दिया था।
उस भारत का भय, जो अब वंशवादी राजनीति, द्रविड़ अभिजात वर्ग, वामपंथी बुद्धिजीवियों और बैठकखानों में बैठकर धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाने वालों के उपदेश सुनने को तैयार नहीं था।
कुछ समय तक यही भय उन्हें एक साथ बाँधे रहा। किन्तु भय कभी राष्ट्रीय दृष्टि नहीं बन सकता।
ममता बनर्जी और वामपंथियों में भाजपा-विरोध के अतिरिक्त कुछ भी समान नहीं था। DMK और कांग्रेस के बीच सुविधा के अतिरिक्त कोई साझा आधार नहीं था। कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच भी प्रासंगिक बने रहने की विवशता के अतिरिक्त कोई वास्तविक समानता नहीं थी। सम्पूर्ण संरचना किसी के निर्माण की सकारात्मक ऊर्जा पर नहीं, बल्कि किसी को रोकने की नकारात्मक ऊर्जा पर खड़ी की गई थी।
अब वही संरचना दरक रही है।
और उसके साथ भारत की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीति की पुरानी परत भी ध्वस्त होगी।
क्योंकि स्पष्ट शब्दों में कहें तो भारत में अब ऐसी कोई स्वाभाविक जनाधार वाली राजनीति शेष नहीं है जो सनातन धर्म को अपमानित करके, हिन्दू अनुष्ठानों का उपहास उड़ाकर, मंदिरों को तिरस्कृत करके और फिर चुनाव आते ही जनेऊ धारण कर विजय प्राप्त कर सके। वह युग समाप्ति की ओर है।
भारतीय राजनीति के अगले सौ वर्ष इस बात पर केंद्रित होंगे कि कौन स्वयं को अधिक जड़ों से जुड़ा हुआ, अधिक सभ्यतागत, अधिक सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी और अधिक स्पष्ट रूप से हिन्दू-चेतस सिद्ध कर पाता है।
अब प्रत्येक दल किसी-न-किसी रूप में हिन्दू-प्रथम दल बनने का प्रयास करेगा।
कुछ यह कार्य भद्दे ढंग से करेंगे। कुछ केवल दिखावे के लिए करेंगे। कुछ मंदिरों के दर्शन करेंगे। कुछ शास्त्रों का उल्लेख करेंगे। कुछ त्योहारों की महत्ता अचानक खोज निकालेंगे। कुछ को अचानक स्मरण हो आएगा कि उनकी दादी अत्यंत आध्यात्मिक थीं। कुछ यह दिखाने का प्रयास करेंगे कि उन्होंने कभी सनातन का अपमान किया ही नहीं था।
किन्तु उनके सामने एक समस्या है।
वह वैचारिक क्षेत्र पहले से ही अधिगृहित है।
RSS और भाजपा ने हिन्दू राजनीति में प्रवेश चुनावी मौसम की पोशाक पहनकर नहीं किया था। उनका गठन ही इसी मूल विचार पर हुआ था। दशकों तक उन्होंने संगठन, अनुशासन, त्याग, वैचारिक स्पष्टता, मंदिर आंदोलनों, सांस्कृतिक कार्यों, सामाजिक पहुँच और उस साहस के माध्यम से यह स्थान निर्मित किया, जिसके कारण उन्हें उस समय उपहास का पात्र भी बनाया गया।
आप पचास वर्षों तक हिन्दू राजनीति को कोसते रहें और फिर यह अपेक्षा करें कि एक चुनावी चक्र में उसके स्वामी बन जाएंगे—यह संभव नहीं है।
C2
Ten lifetimes won't be enough for your Bangla Birodhi Gujarati gang and their stooge Gyanesh Kumar to put even a dent in my DIAMOND HARBOUR MODEL.
Bring everything you have got. I challenge the entire Union of India- Come to Falta. Send your strongest, send one of the godfathers from Delhi. If you have got the nerve, contest in Falta.