तलवार ग़र्क़-ए-ख़ूँ है आँखें गुलाबियाँ हैं
देखें तो तेरी कब तक ये बद-शराबियाँ हैं
तलवार ग़र्क़-ए-ख़ूँ है आँखें गुलाबियाँ हैं
देखें तो तेरी कब तक ये बद-शराबियाँ हैं
जब ले नक़ाब मुँह पर तब दीद कर कि क्या क्या
दर-पर्दा शोख़ियाँ हैं फिर बे-हिजाबियाँ हैं
#मीर_तक़ी_मीर
ऐ सैल = सैलाब (जो इस वीराने से गुज़र रहा है), ज़रा सँभल कर चल कि
यहाँ की हर दिशा में मेरी प्यास, मेरी अधूरी तलब, मिट्टी में दफ़्न या कण कण में समाई है।
भाव:
मेरे दिल की इस सूखी ज़मीन पर आओ तो सँभल कर चलो
यहाँ हर ओर मेरी अधूरी प्यास, मेरा दर्द, मेरी तलब दफ़्न है।