सारी सफलताओं की महान कुंजी है संयम । वीर्यरक्षण से मनुष्य ऐसा सामर्थ्य प्राप्त करता है कि जिससे वह जीवन के जिस क्षेत्र में सफल होना चाहे, हो सकता है ।
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स्कंद पुराण में ब्रह्माजी ने नारद से कहा :-
न कार्तिकसमो मासो न कृतेन समं युगम्।
न वेदसदृशं शास्त्रं न तीर्थं गंगा समम्।।
कार्तिक के समान कोई मास नहीं, कार्तिक मास पुण्यदायी है । इस मास में पुण्य, दान, जप-तप जितना अधिक करें, अच्छा है। संयम बरते पति-पत्नी संसार व्यवहार से, कार्तिक मास के समान कोई मास नहीं, सतयुग के समान कोई युग नहीं, वेद के समान कोई सत्शास्त्र नहीं, गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं...।
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जो कार्तिक मास में सूर्योदय के बाद स्नान करता है वो अपने पुण्य क्षय करता है और जो सूर्योदय से पहले स्नान करता है वो रोग और पापों को नष्ट करने वाला हो जाता है। कार्तिक मास के स्नान की बड़ी भारी महिमा है।
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इस मास में ब्रह्माजी कहते हैं कि "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" इस महामंत्र का जितना अधिक जप करें उस व्यक्ति का उतना अधिक मंगल होता है और अधिक नहीं तो कम से कम कार्तिक मास में "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" 108 बार तो जपना चाहिए।
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जिससे तुम व्यवहार करते हो उसका अभी और भविष्य में भला हो, इस भाव से जो आपका व्यवहार है तो आप जिस भी धर्म में हो इस भाव से व्यवहार करोगे तो आपका भला होकर ही रहेगा। सनातन सत्य सर्वत्र एक रूप होता है।
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आपकी बुद्धि में ये बिठा दो कि परमात्मा का सुख पाना ही सार है, हमारा अंत नहीं होगा, शरीर का अंत होगा। हमारी मौत नहीं होती और परमात्मा एकरस और सदा है। शरीर भी बदलता है संसार भी बदलता है तो बदलने वाले के लिए मांग - मांग कर युग बीत गए अब तो अबदल की ही मांग पैदा हो।
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