ग़र मेरी ज़िन्दगी है तो मेरे बस में क्यूँ नहीं है
क्यूँ ज़िन्दगी में अपनी बेबस जिया करें।
ये जो लोग हैं पराये मेरी ज़िन्दगी में क्यूँ हैं
क्यूँ ये करें सितम और क्यूँ हम सहा करें।
मिलती नहीं है सबको इक ज़िन्दगी मुकम्मल
अब जो भी है यही है अब क्या गिला करें।
#आशीष_जोग@meterWalah
मैं ख़ुद प्रत्यक्षदर्शी हूँ। 90s में जब मोगली सीरियल दूरदर्शन पर आता था तो इस सीरियल का हर एपिसोड मैंने अपने बेटे के साथ देखा है। “जंगल जंगल” पर उसकी खुशी मैंने ख़ुद महसूस की है। कमाल है गुलज़ार साहब का और @VishalBhardwaj जी का।
कूचा वही है मोड़ वही है वही घर है,
टूटा सा इक आँगन है बूढ़ा सा शजर है।
होश-ओ-हवास ना रहे न खुद की खबर है,
कुछ हो न जाए ऐसा जिसका मुझे डर है।
सब कुछ बदल गया है सब कुछ गया बिखर,
मैं अब तलक़ वहीं हूँ तू जाने किधर है।
हाज़िर है दिल चलाइये फिर तीर-ए-तग़ाफ़ुल,
इलज़ाम-ए-वफ़ा यूँ भी मेरे ही तो सर है।
ला कर क़रीब मौत के इतना न छोड़िये,
थोड़ी से देर है बस थोड़ी सी क़सर है।
क़दमों तले न आये चलियेगा सम्भल के,
छलनी हुआ पड़ा है आशिक़ का जिगर है।
हाज़िर है दिल चलाइये फिर तीर-ए-तग़ाफ़ुल,
इलज़ाम-ए-वफ़ा यूँ भी मेरे ही तो सर है।
ला कर क़रीब मौत के इतना न छोड़िये,
थोड़ी से देर है बस थोड़ी सी क़सर है।
क़दमों तले न आये चलियेगा सम्भल के,
छलनी हुआ पड़ा है आशिक़ का जिगर है।
अच्छी भली गुज़र रही थी ज़िन्दगी मगर,
ठहरा जो घडी भर को मैं सब कुछ ठहर गया |
दिल के किसी कोने में छिपाया था कोई ख्वाब,
टूटा जो दिल तो ख्वाब वो गिर कर बिखर गया |
ठहरे हुए पानी सी थी ठहरी ये ज़िन्दगी,
पत्थर उछाल कर कोई हलचल सी कर गया |
जो मैं समझ रहा था वो ये शख्स नहीं है,
आइना देख कर मैं खुद ही से ही डर गया |
अब तक था गुलिस्तान ये बेरंग खिजां में,
कल रात आके कौन इसमें रंग भर गया |
कहने को तो जिंदा हूँ मगर लग रहा है क्यूँ,
हिस्सा मेरा कल तक जो था वो आज मर गया |
रहता था कोई दिल में मेरे अब तलक मगर,
हैरान हूँ के दिल को तोड़ कर किधर गया |
वादों पे अब नहीं रहा है मेरा ऐतबार,
जिसने भी किया जाने क्यूँ वो फिर मुक़र गया |
बूँद-बूँद पानी
श्रावण की कृष्ण-वर्णी,
पलकों में, अलकों में,
छलक-छलक जाता है,
बूँद-बूँद पानी!
तूलिका के मृदुस्पर्शी,
रेशों में, केशों में,
झलक-झलक जाती है,
अनकही कहानी!
मरुथल की अनबुझी,
तृष्णा- वितृष्णा की,
तुष्टि-संतुष्टि का,
समाधान पानी!
सब कुछ बदल गया है या मेरी नज़र बदल गयी,
जो शख्स आईने में था मैं तो ना था वो और था।
खोया था जो वो पा लिया, मैं खुद कहीं खो गया,
जो खो दिया वो मैं ही था, जो मिल गया वो और था।
जलता रहा था देर तक हिस्सा मेरा कहीं कोई,
जो जल गया वो मैं ही था, जो बच गया वो और था।
Bahaut dinon baad paayi fursat, to maine khud ko palat ke dekha
Magar main pehchaanta tha jisko, vo aadmi ab kahiin nahhin hai
- Javed Akhtar Sb.
#Shair / @shairoftheday#maazi
तेरी जानिब नहीं जाती मेरी जानिब नहीं आती,
मगर इस राह पर चल करके आखिर मिल गये हम तुम।
न नज़रों में, न दिल में और ना आग़ोश में तो क्या,
ख़यालों में कमसकम एक दूजे के रहे हम तुम।
गिले शिक़वे भुला कर ज़िन्दगी से फिर मिले हम तुम,
सवालों से परे थे और जवाबों से परे हम तुम।
दिलों में दर्द था कितना मगर लब तक नहीं आया,
जिये थे साथ कुछ पल साथ फिर कुछ पल मरे हम तुम।