थ्रेड 🧵 🧵 🧵
नसीरुद्दीन शाह,ओम पुरी,सतीश शाह,सतीश कौशिक.
१. 'जाने भी दो यारों' हा १९८३ साली प्रदर्शित झालेला एक उत्कृष्ट विनोदी चित्रपट आहे. कुंदन शाह यांनी दिग्दर्शन केलेला हा चित्रपट आजही प्रेक्षकांना खळखळून हसवतो.
दिल्ली के सत्यनिकेतन में हुए दर्दनाक बिल्डिंग हादसे के बाद अगर आप किसी अपने की तलाश में हो, अस्पताल में मदद चाहिए, खून की जरूरत हो या कोई और परेशानी, कांग्रेस सेवादल के साथी दिल्ली में मौजूद हैं। बस हमें फोन कीजिए।
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मलब्यात विद्यार्थी जीवनासाठी संघर्ष करत आहेत, आणि ABVPचे पदाधिकारी ACमध्ये बसून पिझ्झा-बर्गर खात आहेत.
विद्यार्थी जाब विचारत असताना त्यांच्यासोबत मारहाण केली जात आहे.
लाज वाटते की नाही?
@SrcasticSnatani २)
नेता करंट टाईम पे यहां से वहां गयें। चुनाव के ठीक पहले। तो और नुकसान हुआ।
ग्राउंड रियलिटी भाई। जनता बीचों बीच फंस गईं। और एक बात जनता भोली है। ये मान्य करना पड़ेगा।
@SrcasticSnatani यहापर लड़की बहिन योजना चल गया। ५००रुपए। दारू।
और मेरे यहां तो गुजराती मारवाड़ी ज्यादा लोग हैं वो चल गया। धर्म और जात चल गया। जनता को यही चाहिए था। । कुछ डेवलेपमेंट के नाम पर जो कि २०२२ में ही होना चाहिए था।
यहां एक मेन पार्टी दो पार्टियां हुई। उदाहरण दो शिवसेना
नेता यहां से
क्या आपने यह notice किया है, Opposition वालों का इतना बुरा हाल है की मासूम चेहरों वाली बच्चियों को आगे कर-कर के मोदी सरकार को गालियाँ और अपशब्द कहलवा रहें हैं। So low, bro. 😏
एक तरफ़ दर्जनों छात्रों की मौत का मातम है, दूसरी तरफ़ ABVP की जॉइंट सेक्रेटरी दीपिका झा कैफ़े में बैठकर पनीर लबाबदार का आनंद ले रही हैं।
बेशर्मी की भी हद हो गई है।
@SrcasticSnatani Yes. On Tv. She said.
हम लोक बोलने जाएंगे तो मारेंगे। हम लोगों के समय ऐसे डांस नहीं करते थें। थर भी इतने ऊपर नहीं थे। हिंदू संस्कृति में ऐसा नहीं होता। त्योहारों को विकृत बना डाला।
होम्योपैथिक दवा नहीं,
पूरी सर्जरी का प्रबंध है।
माननीय मोदी जी ने अपने इरादे की घोषणा, लाल किले से अबके 15 अगस्त को कर दी थी। आपने ध्यान नहीं दिया।क्योंकि सबका ध्यान तो "दिमागी नक्सल" वाले होम्योपैथिक गोली पर अटक गया था।
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80वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री ने लाल किले से की "आधुनिक सिविल डिफेंस वालंटियर फोर्स" बनाने का ऐलान किया है।उन्होंने कहा कि पुरानी सिविल डिफेंस व्यवस्था, पिछली सदी के युद्धों के हिसाब से बनी थी।
अब वह पुरानी पड़ गई है। अब गारंटी नहीं कि लड़ाई सिर्फ सीमा पर होगी। हमें नागरिकों को तैयार करना होगा। आने वाले दिनों में हम सिविल डिफेंस का एक जीवंत नेटवर्क बनाएंगे।
उन्होंने कहा कि देश को सुरक्षित रखना सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है- चाहे चुनौती सीमा के पार से आए
या देश के भीतर से..
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दरअसल देश को सबसे खतरा, देश के भीतर शत्रु खोजने की इसी आदत से है। सरकार की निगाह मे पुलिस, एजेंसियां, ज्यूडीशिरी इन शत्रुओ से लड़ने को अपर्याप्त हैं।
या शायद इनके हाथ, कानून औऱ संविधान से बंधे हुए हैं। तो भीतरी दुश्मन निपटाने जरा फ्री हैण्ड चाहिए। वह एक खुले हाथ वाला कैडर चाहती है।
एक मिलिट्राइज, पैन इण्डिया ऑर्गनाजेशन!!!
जिसे सरकारी संरक्षण हो।अधिकार मिले हों, औऱ दूसरी एजेंसियो के सामने उसके निष्कर्षो की प्रारंभिक स्वीकार्यता हो। जैसे नाजी जर्मनी मे गेस्टापो थी?
एसएस थी?
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हिन्दुओ का मिलिशियाकरण, RSS का मूल स्वप्न रहा है। संघ के गठन के बाद, उसकी रीती नीति कैसी हो, यह विचार करने बी एस मुंजे इटली गए।
मुसोलिनी से मिले। जनता मिलिट्री कैम्प, बच्चों के मिलिट्री स्कूल देखे। लौटकर लाठी, टोपी औऱ शाखा की रचना की।
जब आप सड़क पर सैनिक दस्ते की तरह, उन्हें पथ संचलन करते देखते है, तो वह उसी मिलिशियाकरण का प्रतीक है।
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लेकिन लाठी भांजने भर से बात कहां बनेगी!!
गोली, बम, पिस्टल -सम्पूर्ण सैनिक प्रशिक्षण देना होगा। तो मुंजे ने भोसले मिलिट्री स्कूल की स्थापना की। लेकिन भारतीय सेना से बेहतर प्रशिक्षण केंद्र क्या हो सकता है भला।
तो जब दूसरे विश्व युद्ध मे गांधी, भारत छोडो की मुहिम मे जुटे थे। सावरकर, हिन्दुओ से ब्रिटिश सेना में शामिल होने का आवाहन कर रहे थे। मंशा यह कि हिन्दू की सैन्य प्रशिक्षण ले। हथियारों का इस्तेमाल सीखें।
इस ट्रेनिंग का इस्तेमाल कैसे होता, इस बात का अंदाजा आप इसे लगाइये, कि गोपाल गोडसे, आप्टे और मदनलाल पाहवा- ब्रिटिश आर्मी में सेवा दे चुके थे।
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गाँधी हत्या के बाद लम्बे समय की सुसुप्तावस्था मे भी, हिंदू मिलीशियाकरण का स्वप्न मिटा नहीं। पर्दे के पीछे शस्त्र पूजन चलता ही रहा होगा। आखिर तीन दिन में तैयार होने वाली सेना का दावा, बिलकुल बेबुनियाद नहीं हो सकता।
औऱ अब इस स्वप्न मे सेना भी शामिल कर ली गई है। जरा सोचिए, अग्निवीर योजना में 4 साल सैनिक प्रशिक्षण लेने के बाद ( जिनकी पहले बैच अगले 2 सालों में सेवा से बाहर आ जाएगी) लाखों बेरोजगार युवा जब समाज में घूम रहे हों, तो इनका इस्तेमाल कौन करेगा??
किसके पास उन्हें उपयोग करने के संसाधन होंगे??
और परपज होंगे?
गोडसे, आप्टे, पाहवाओ की जरूरत होगी।
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प्रधानमंत्री स्वयं, इस संगठन के घोषित स्वयंसेवक है। उसके एजेंडे को लागू करने के लिए जाने जाते हैं। ऐसे सिविल डिफेंस में नए बदलाव, उसे नया मैंडेट, नए अधिकार देने की क़वायद, उसे लंबे देखे गए सपने की परिणिति तो नहीं??
समस्या सिविल डिफेन्स की मूल अवधारणा नहीं हैं। लेकिन कोई भी बड़ा स्वयंसेवी सुरक्षा नेटवर्क गलत डिजाइन से राजनीतिक औजार बन सकता है।
खतरा उसकी संरचना, अधिकार, नियुक्ति और जवाबदेही की प्रक्रिया (या उसके अभाव) में होता है।
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एसएस और गेस्टापो क्या थे?
वे भी नागरिक बचाव दल के नाम पर बने थे।
लेकिन गेस्टापो गुप्त राज्य पुलिस थी। उसका काम राजनीतिक दुश्मन ढूंढना, गिरफ्तार करना, यातना, बिना अदालत के दमन था। एसएस पार्टी की सशस्त्र शक्ति थी। उसका काम यातना शिविर, नस्लीय सफाया, और राज्य के अंदर आतंक फैलाने का था।
ये सभी पार्टी से जुड़े वर्कर ही थे। गैर नाजी इसमें शामिल हो ही नहीं सकता था। ये स्टेट की गुप्त शक्ति थी, कानून से ऊपर थी। लक्ष्य था - विचारधारा के दुश्मन को निशाना बनाना, और हिंसा को राज्य की नीति बनाना।
औऱ संविधान की कसम खायी सेना, पुलिस, ब्यूरोक्रेसी को बाईपास करना।
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भारत का सिविल डिफेंस अधिनियम, 1968 के तहत इसके सदस्यों का काम जान बचाना, नुकसान कम करना, आपदा/हमले के असर घटाना है।
ग्राउंड ज़ीरो से सत्य निकेतन हादसे का सच! जानिए राहत कार्य में जुटे NSUI के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने प्रभावितों की मदद और कैंपस की सुरक्षा व्यवस्था पर क्या कहा...
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हादसे के बाद सच की आवाज दबाने का प्रयास!
पुलिस द्वारा हादसे के बाद पीजी से बाहर निकलने और मीडिया के सामने सच्चाई रखने से छात्रों को रोकना जा रहा है...
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जिन लोगों ने हमें “नाराज़ फूफा” कहकर तंज कसा था, आज वही मुँह के बल गिर गए।
अगर आपको शिकायत है कि हम नाराज़ हैं, तो सुनिए - हाँ हम नाराज़ फूफा हैं। हम सिर्फ़ नाराज़ नहीं हैं। हम परेशान हैं। हम गुस्से में हैं।
हमारे नौजवान किसी न किसी तरह अपनी जान गँवा रहे हैं - आत्महत्या, डूबना, करंट लगना, ज़िंदा जल जाना या मलबे में दब जाना। हमारे युवा हर तरफ़ से मुश्किलों और संघर्ष से घिरे हुए हैं।
ये परेशानी, नाराज़गी और गुस्सा ग़लत नहीं है।
ग़लत वह हैं जो हमारे नौजवानों को मरते देखे और फिर भी कुछ ठीक करने के लिए प्रेरित न हों।
ग़लत वह हैं जिन्हें बच्चों को यूँ मरते देख कर गुस्सा नहीं आता।
NSUI के साथी ज़मीन पर डटे हुए हैं। राहत और बचाव कार्य में लगातार जुटे हैं। ग्राउंड पर खाने-पानी, रहने, मेडिकल सहायता समेत हर जरूरी व्यवस्था करवा रहे हैं।
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