@JagranNews गाय माता है लेकिन सिर्फ 14 साल तक.
गाय माता है लेकिन केवल बाहर, अंदर उसको खा सकते.
गाय को खाना है तो मिथुन को खा सकते.
ऐसा दोगलापन कहाँ से लाते?
मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन आज इसका एक बड़ा हिस्सा खबर दिखाने से ज्यादा देश में मानसिक प्रदूषण फैलाने का काम कर रहा है। हर मुद्दे को सनसनी बनाना, आधी अधूरी जानकारी चलाना, लोगों को भड़काना और टीवी स्टूडियो को अदालत बना देना अब इनका रोज का काम हो चुका है। टीआरपी और एजेंडा की भूख में इन्हें अब किसी की इज्जत, करियर और मानसिक स्थिति की भी परवाह नहीं रही।
सबसे शर्मनाक बात यह है कि अब ये किसी को भी निशाना बना देते हैं। शिक्षक हों, छात्र हों, आम लोग हों, किसी की भी एक क्लिप उठाकर पूरा नैरेटिव बना देंगे और फिर घंटों बैठकर चरित्र हनन करेंगे। जैसे देश की हर समस्या का समाधान टीवी स्टूडियो में बैठा एंकर ही तय करेगा। पत्रकारिता के नाम पर चीखना, उकसाना और भीड़ को भड़काना अब इनकी पहचान बन चुका है।
अगर समय रहते इस मीडिया पर लगाम नहीं लगाई गई तो ये समाज को अंदर से खोखला कर देंगे। लगातार नफरत, डर, झूठ और सनसनी परोसी जाएगी तो उसका असर लोगों की सोच पर पड़ेगा ही। दुख की बात यह है कि सत्ता में बैठे लोग इनके खिलाफ शायद ही कुछ करेंगे क्योंकि इनका एक बड़ा हिस्सा हमेशा सरकारों की चमचागिरी में लगा रहता है। सत्ता के लिए ये ढाल हैं और बदले में इन्हें खुली छूट मिली हुई है।
लेकिन अब समाज को समझना होगा कि पत्रकारिता और प्रोपेगेंडा में फर्क होता है। मीडिया की स्वतंत्रता जरूरी है, लेकिन गैरजिम्मेदार मीडिया को खुली छूट देना आत्मघाती है। जो चैनल और एंकर लगातार समाज में जहर घोल रहे हैं, लोगों को बांट रहे हैं और बिना तथ्य के माहौल बना रहे हैं, उन्हें कानून और जनता दोनों के जरिए जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।
वरना वो दिन दूर नहीं जब खबरें कम और नफरत ज्यादा दिखाई जाएगी, सच कम और एजेंडा ज्यादा बेचा जाएगा। और तब नुकसान किसी एक व्यक्ति का नहीं, पूरे देश के सामाजिक संतुलन का होगा।
@anjanaomkashyap@sudhirchaudhary@RubikaLiyaquat
Nitin Suryawanshi - MFD
@BasantBaheti3 Net capital inflows at risk of turning negative in FY27 for the first time since 1974 . ये हाल हुआ रखा है. बाकी छोड़ते रहो विकसित भारत के जुमले . 80-90% युवा आबादी इस देश की किसी लायक नहीं, कोई skill नहीं उनके पास. विकसित भारत अभी दूर की कौड़ी है.
Markets have moved. Rates have shifted. New funds have emerged. But most portfolios? Still sitting exactly where they were.
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आज की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि हमारे सामने जो असली संकट खड़ा है, उस पर सबसे कम चर्चा हो रही है। World Bank की रिपोर्टें साफ संकेत दे रही हैं कि आने वाले वर्षों में भारत भीषण गर्मी और खतरनाक लू का केंद्र बन सकता है, जहाँ “वेट-बल्ब तापमान” जैसी स्थितियाँ इंसानी सहनशक्ति की सीमा को छूने लगेंगी। इसका मतलब सिर्फ असहज गर्मी नहीं है, बल्कि ऐसी स्थिति जहाँ शरीर खुद को ठंडा रखने में असमर्थ हो जाता है। सोचिए, जब पसीना भी आपको बचा नहीं पाएगा, तब हालात कितने गंभीर होंगे।
फिर भी, यह विषय हमारी रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा नहीं है। राजनीतिक मंचों पर इसकी आवाज़ बहुत कम सुनाई देती है, और जब सुनाई भी देती है तो वह प्राथमिकता नहीं बन पाती। कारण सीधा है, जिस मुद्दे पर जनता दबाव नहीं बनाती, वह मुद्दा राजनीति में जगह नहीं बना पाता। आज समाज का बड़ा हिस्सा ऐसी बहसों में उलझा हुआ है जो भावनात्मक तो हैं, लेकिन भविष्य की वास्तविक चुनौतियों से ध्यान हटा देती हैं। धर्म, जनसंख्या या छोटे-छोटे विवाद हमारी सोच पर इतना हावी हो जाते हैं कि पर्यावरण जैसे बड़े और ठोस खतरे पीछे छूट जाते हैं।
जबकि सच्चाई यह है कि यह संकट किसी एक वर्ग, धर्म या क्षेत्र को नहीं, बल्कि हर व्यक्ति को प्रभावित करेगा। रिपोर्टें बताती हैं कि 2030 तक करोड़ों लोग हर साल लू की चपेट में आ सकते हैं, काम करने की क्षमता घटेगी, नौकरियाँ प्रभावित होंगी और अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होगा। शहरों में हालात और कठिन होंगे, जहाँ रात में भी तापमान कम नहीं होगा और जीवन लगातार असहज बना रहेगा।
सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम भविष्य की इस स्पष्ट चेतावनी को जानते हुए भी उसे नजरअंदाज कर रहे हैं। सरकारें तभी तेज़ी से कदम उठाती हैं जब जनता उस दिशा में सवाल पूछती है, लेकिन जब जनता ही इस विषय को प्राथमिकता नहीं देती, तो नीति-निर्माण भी उसी हिसाब से चलता है।
अब सवाल यह नहीं है कि नेता इस पर बात क्यों नहीं कर रहे, बल्कि यह है कि हम खुद इस पर बात क्यों नहीं कर रहे। क्या हमने कभी इसे चुनावी मुद्दा बनाया? क्या हमने कभी अपने शहर में गर्मी से निपटने की योजनाओं के बारे में पूछा? जब तक यह विषय हमारे लिए “तत्काल” नहीं बनेगा, तब तक यह सिर्फ रिपोर्टों और खबरों तक सीमित रहेगा।
हकीकत यह है कि आने वाला समय बहसों से नहीं, तैयारी से संभलेगा। अगर आज भी हमने ध्यान नहीं दिया, तो कल यह समस्या इतनी बड़ी हो सकती है कि उससे बचने के विकल्प बहुत सीमित रह जाएँगे।
Nitin Suryawanshi
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आजकल बहुत से लोग कमेंट में या व्हाट्सएप पर कहते हैं कि 2 साल हो गए, 3 साल हो गए SIP करते हुए लेकिन अभी तक कोई खास रिटर्न दिखाई नहीं दे रहा। सच तो यह है कि निवेश की यात्रा में शुरुआती कुछ साल कई बार ऐसे ही गुजरते हैं, जब बाजार की चाल धीमी होती है या उतार चढ़ाव ज्यादा रहता है। ऐसे समय में सबसे बड़ी परीक्षा धैर्य की होती है, क्योंकि यहीं पर बहुत से लोग SIP रोक देते हैं या निराश होकर निवेश से दूरी बना लेते हैं।
लेकिन आंकड़े एक अलग ही कहानी बताते हैं। लंबे समय के SIP डेटा को देखें तो पाया गया कि जिन निवेशकों को पहले 5 वर्षों में 8% से कम रिटर्न मिला, 10 साल पूरे होने तक उनका औसत रिटर्न लगभग 19% के आसपास पहुंच गया। वहीं जिन SIP को शुरुआती 5 वर्षों में 8% से ज्यादा रिटर्न मिल गया था, उनके लिए 10 साल का औसत रिटर्न करीब 15% के आसपास रहा। यानी धीमी शुरुआत कई बार आगे चलकर बेहतर औसत रिटर्न का रास्ता बना देती है और केवल थोड़ा सा धैर्य लगभग 4% अतिरिक्त रिटर्न का अंतर पैदा कर सकता है।
इसका सीधा मतलब यह है कि SIP कोई छोटी दूरी की दौड़ नहीं है। यह एक लंबी यात्रा है जिसमें बाजार की गिरावट, ठहराव और तेजी सभी आते हैं। जो निवेशक इन सभी चरणों में अनुशासन बनाए रखते हैं और समय को अपने पक्ष में काम करने देते हैं, वही अक्सर बेहतर परिणाम हासिल कर पाते हैं। इसलिए यदि अभी रिटर्न कम दिखाई दे रहा है तो इसे असफलता नहीं बल्कि प्रक्रिया का हिस्सा समझना चाहिए, क्योंकि कई बार असली फायदा उसी निवेश को मिलता है जो मुश्किल समय में भी जारी रहता है।
Nitin Suryawanshi - MFD
Disclaimer: Mutual Fund investments are subject to market risks. Read all scheme related documents carefully before investing. Past performance may or may not be sustained in the future and is not a guarantee of any future returns. SIP does not assure profit or protect against losses in declining markets.
अक्सर लोगों को लगता है कि wealth इस बात से बनती है कि आपने कौन-सा फंड या शेयर चुना और उसका प्रदर्शन कैसा रहा। लेकिन सच्चाई यह है कि लंबे समय में wealth का निर्माण निवेश के प्रदर्शन से कम और निवेशक के व्यवहार से ज्यादा तय होता है।
एक ही फंड में निवेश करने वाले दो निवेशकों के परिणाम अलग हो सकते हैं। जो निवेशक गिरावट के समय घबराता नहीं, नियमित SIP जारी रखता है, बार-बार खरीद-बिक्री नहीं करता और निवेश को पर्याप्त समय देता है, वह धीरे-धीरे बेहतर wealth बना लेता है। वहीं दूसरा निवेशक बाजार की हलचल देखकर निवेश रोक देता है, नुकसान में बेच देता है या पुराने रिटर्न देखकर जल्दबाजी में निवेश करता है। निवेश समान था, लेकिन निवेशक का रवैया अलग था, इसलिए परिणाम भी अलग हुए।
निवेशक का प्रदर्शन धैर्य, अनुशासन, सही asset allocation, जोखिम की समझ और भावनाओं पर नियंत्रण पर निर्भर करता है। बाजार में उतार-चढ़ाव हमेशा रहेंगे, अनिश्चितता भी बनी रहेगी, लेकिन wealth आमतौर पर वही लोग बना पाते हैं जो वर्षों तक एक स्पष्ट और सरल योजना पर टिके रहते हैं।
सरल शब्दों में, returns बाजार से मिलते हैं, लेकिन wealth निवेशक का व्यवहार बनाता है।
Nitin Suryawanshi - MFD
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