इसके विपरीत, लेबनान के यही दिन उन लोगों के लिए अपमान और अंततः बदनामी के दिन सिद्ध होंगे, जिन्होंने ज़ायोनी शत्रु के सामने अपने वास्तविक शुभचिंतकों के बजाय क़ाबिज़ शक्तियों और अपने विरोधियों के झूठे वादों से उम्मीदें लगा रखी हैं।
लेबनान के ये दिन इतिहास के सामने—बल्कि अभी से—जनाब शैख़ नईम क़ासिम और प्रतिरोध के सभी मुजाहिदीन के लिए ऐसे विशिष्ट और गौरवपूर्ण दिन हैं, जिन्हें सदैव याद रखा जाएगा।
आज उनका वही ऊँचा और गौरवपूर्ण परचम जनाब शैख़ नईम क़ासिम के हाथों में है। वे हिज़्बुल्लाह के मज़बूत और आशूराई प्रतिरोध मोर्चे की अग्रिम पंक्तियों में साहसपूर्वक खड़े होकर उनके मिशन को उसी दृढ़ संकल्प और स्थिरता के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।
विजय और सफलता सदैव उनके साथ रही। निस्संदेह, शाम के इस पूरे क्षेत्र के इतिहास में, पैग़म्बरों और उनके उत्तराधिकारियों के बाद, इस प्राचीन भूमि ने आज तक उनके जैसा महान पुरुष नहीं देखा।
शहीद नसरुल्लाह ने लेबनान जैसे एक छोटे-से देश का नाम—जो वर्षों से कुछ शक्तियों के लिए केवल बैकयार्ड बना हुआ था—गौरव और बुलंदी की ऊँचाइयों तक पहुँचा दिया।
शहीद सैयद हसन नसरुल्लाह अपनी क़ौम और अपनी विचारधारा के सच्चे हितैषी थे। उनके सच्चे, प्रभावशाली और मधुर भाषण तथा उनके साहसपूर्ण क़दम न केवल उनकी क़ौम के दिलों को मज़बूती प्रदान करते थे, बल्कि दुनिया भर के स्वतंत्र विचार रखने वाले लोगों के लिए भी हौसले और शक्ति का स्रोत थे।
इस अवसर पर यह अत्यंत उपयुक्त होगा कि अरब जगत के महान नेता और प्रतिरोध के अग्रणी प्रतीक, शहीद-ए-आली-मक़ाम जनाब सैयद हसन नसरुल्लाह की शहादत की दूसरी बरसी पर उनकी याद को ताज़ा किया जाए।
एक समय ऐसा था जब दुश्मन ने कोशिश की थी कि इस्लामी व्यवस्था की सामाजिक लोकप्रियता को कमज़ोर कर दे; लेकिन आज समाज के विभिन्न वर्ग अपने न्यायसंगत और सही रुख़ पर दृढ़ता से क़ायम हैं और विशेष रूप से हॉर्मुज़ स्ट्रेट पर नियंत्रण बनाए रखने के अपने रुख़ पर अडिग हैं।
पिछले सात महीनों से हमारे हमवतनों ने पूरे देश के चौराहों और सड़कों को अपनी ज़िम्मेदाराना और उत्साहपूर्ण उपस्थिति से सजा रखा है, ताकि इस्लामी मुजाहिदीन का मनोबल ऊँचा रहे और दुश्मन भय और आतंक में मुब्तला हो।
आज कुछ लोग हमें चौथा सुपर पावर कहते हैं। हालांकि वे यह बात सांसारिक गणनाओं के आधार पर कहते हैं; जबकि इलाही मानदंड के अनुसार, जो देश स्वयं को पैग़म्बर के पाकीज़ा परिवार से जुड़ा हुआ मानता हो और जिसके लोग सत्य की स्थापना में किसी से न डरते हों, वह दुनिया की पहली शक्ति है।
जिन दिनों में दुश्मन हमें वापस ले जाना चाहता है, वे दिन पिछड़ेपन, अपमान और निर्भरता से भरे हुए थे। इसके विपरीत, आज के दिन प्रगति, सम्मान, स्वतंत्रता और इस्लामी जगत बल्कि पूरी दुनिया में ईरान की प्रतिष्ठा और गौरव के दिन हैं।
आज ऐसे दिन आ गए हैं कि वो आक्रांता और वर्चस्ववादी शक्तियाँ ख़ुद, यानी सिर्फ़ उनके घटक नहीं, इस्लामी मुजाहेदीन के हमलों के सामने शरण तलाशती फिर रही हैं और युद्ध समाप्त करने के लिए गुहार लगा रही हैं।
उस थोपी गई जंग की आग से, जिसे जनता-विरोधी बास सरकार ने भड़काया था, इस्लामी व्यवस्था पहले से अधिक मज़बूत होकर उभरी; उसकी आवाज़ पहले से अधिक बुलंद हुई और उसकी उड़ान पहले से अधिक ऊँची हुई। बाद में भी दुश्मन के पैदा किए गए संकटों में भी यही इस व्यवस्था की स्थायी ख़ासियत रही।
इस्लामी क्रांति उन शक्तियों के लिए अत्यंत अप्रिय थी, जिनकी निगाहें इस धरती के संसाधनों पर टिकी हुई थीं और जो वर्षों से इस पर अपना क़ब्ज़ा बनाए रखने के लिए यहाँ की जनता पर तरह-तरह के ज़ुल्म करती आई थीं।
इस्लामी इंक़ेलाब से पहले के दिन अँधेरे और घुटन भरे हुए थे। साम्राज्यवादी शक्तियों के प्रतिनिधि ईरान के शाह को आदेश देते थे और वह उन्हें अक्षरशः लागू करता था। यहाँ तक कि इमाम ख़ुमैनी की अगुवाई में ईरान की महान जनता की क्रांति ने इस पूरे तंत्र को तहस-नहस कर दिया।
मेहर महीने के शुरुके दिन ईरान पर थोपी गई पहली जंग में नेशन के आठ वर्षीय प्रतिरोध की याद ताज़ा करते हैं। उन दिनों इस्लामी क्रांति के साथ एकजुटता की भावना पैदा हुई, जो क्रांति के उगते सूरज की चमक से प्रेरित थी। इसके प्रभाव से प्राचीन और नए साम्राज्यवाद की जमी हुई बर्फ़ पिघलने लगी।
बिस्मिल्लाह अर्रहमान अर्रहीम
“और बेशक हमने मूसा को अपनी निशानियों के साथ भेजा था (और हुक्म दिया था) कि अपनी क़ौम को (कुफ़्र के) अँधेरों से निकालकर (ईमान की) रोशनी में लाएं और उन्हें अल्लाह के मख़सूस दिनों की याद दिलाएं।”
(सूरए इब्राहीम, आयत 5)
इस समय पूरे इस्लामी ईरान में विभिन्न प्रकार की तैयारियाँ, विशेष रूप से सशस्त्र कार्रवाई की तैयारियाँ जारी हैं, ताकि ऐसा रणक्षेत्र तैयार किया जा सके जो ईरानी जनता को सम्मान और गौरव दिलाए तथा दुश्मन को अपमान और शर्मिंदगी का सामना करना पड़े।
इन दिनों दुश्मन, हमारे बहादुर ईरानी मुजाहिदीन और होर्मुज़ स्ट्रेट के रक्षकों से मिली दर्दनाक चोट के कारण अरब सागर से आगे बढ़ने का साहस नहीं कर पा रहे हैं... और वह समय भी दूर नहीं, जब अरब सागर को भी उनके अस्तित्व से पाक कर दिया जाएगा।