कुछ प्राइवेट फार्मा कंपनियाँ ब्रांडेड दवाइयों (medicines) पर 600% से 1000% तक मुनाफ़ा कमा रही हैं। यह कोई आरोप नहीं, बल्कि संसद की समिति की रिपोर्ट में दर्ज तथ्य है।
जहाँ वही दवा generic रूप में 80-90% सस्ती मिल सकती है, वहीं सिर्फ ब्रांड के नाम पर आम आदमी से कई गुना कीमत वसूली जा रही है।
बीमार इंसान के पास मोलभाव का विकल्प नहीं होता,
उसे किसी भी हाल में दवा चाहिए, और इसी मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है।
स्वास्थ्य कोई व्यापार नहीं, अधिकार है। गरीब और मध्यम वर्ग की गाढ़ी कमाई दवा कंपनियों के मोटे मुनाफ़े में नहीं जानी चाहिए।
इसमें गलत क्या है सही तो कहा इन्होने जो हिंदुस्तान में रह रहा है उसे तिरंगे के आगे झुकना ही चाहिए और बंदे मातरम कहना ही चाहिए जो ये नहीं कर सकता इसका मतलब वाह देश का गद्दार है
पहले ये बता!
आजादी के बाद 52 साल तक तुम्हारे बाप दादा ने तिरंगा क्यों नहीं फहराया??
या फिर ये बता तुम्हारे बाप दादा ने कितनी कुर्बानी दी देश को आजाद कराने में??