वीर शिरोमणि प्रताप की प्रतिज्ञा
"जब तक शत्रुओं से मैं अपनी पावन मातृभूमि को मुक्त नहीं करा लेता, तब तक न मैं महलों में रहूँगा और न ही सोने चाँदी के बर्तनों में भोजन करूँगा। घास ही मेरा बिछौना और पत्तल दोने ही मेरे भोजन करने के पात्र होंगे।"
#HaldighatiVijay450
⚔️ महान योद्धा वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जी अदम्य साहस, अद्भुत शौर्य और दृढ संकल्प के प्रतीक थे। आज उनके जयंती दिवस (तिथि अनुसार) पर उन्हे कोटि-कोटि वंदन।🙏🏻🇮🇳
#महाराणा_प्रताप#MaharanaPratap
"मानसिंह को गोगुंदे में रहते हुए चार मास बीत गये थे, परन्तु उससे कुछ न बन पड़ा, जिससे बादशाह ने उसे तथा आसफखां को वहां से चले आने की आशा लिख भेजी और उनकी गलतियों के कारण मानसिंह तथा आसफखां की ड्योढ़ी बंद कर दी।"
#HaldighatiVijay450
संदर्भ पुस्तक: उदयपुर राज्य का इतिहास, पृष्ठ 443
हल्दीघाटी विजय के 450 वर्ष पूर्ण होने के पावन अवसर पर उदयपुर में आयोजित राष्ट्र चेतना संकल्प सभा में आप सभी सादर आमंत्रित हैं।
📍 चेतक सर्किल, उदयपुर
🎙 मुख्य वक्ता: डॉ मोहन भागवत जी
🏛 आयोजक: प्रताप गौरव केन्द्र
#HaldighatiVijay450
#हल्दीघाटी विजय के 450 वर्ष पूर्ण होने के पावन अवसर पर उदयपुर में आयोजित राष्ट्र चेतना संकल्प सभा में आप सभी सादर आमंत्रित हैं।
📍 चेतक सर्किल, उदयपुर
🎙 मुख्य वक्ता: डॉ मोहन भागवत जी
🏛 आयोजक: प्रताप गौरव केन्द्र
#HaldighatiVijay450
मां #पन्नाधाय में अपने पुत्र चंदन को उदय सिंह के स्थान पर रखकर अपने पुत्र का बलिदान दिया। अगर उदय सिंह नहीं बचते तो ना ही मेवाड़ होता ना ही महाराणा प्रताप। #HaldighatiVijay450
आशाशाह देवपुरा ने बालक उदयसिंह को प्रश्रय देकर अपना राणा माना। महाराणा उदय सिंह का विवाह कुंभलगढ़ में ही अखेराज सोनीगरा की लड़की जयवनता बाई से हुई। जयवंता बाई की कोख से यह पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम प्रताप रखा गया।
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प्रताप ने भील जाति के लोगों को भी साथ में लिया और उनका विश्वास जीता। भीलों ने भी अपने प्रताप को कीका कहकर संबोधित करना प्रारंभ किया। प्रताप ने वीर योद्धाओं को अपनी सेना में सम्मिलित कर दिया। #HaldighatiVijay450#HaldighatiVijay450
रावत कृष्ण दास चुंडावत और जयमल राठौड़ ने प्रताप को शस्त्र विद्या सिखाई। मेवाड़ मुगल संघर्ष में महाराणा प्रताप के साथ साथ जनजाति समाज भी बलिदान देने में कहीं पीछे नहीं रहा।
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मुगलों की हार का सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रमाण!
हल्दीघाटी युद्ध के बाद मुगल सेना इतनी भयभीत थी कि महाराणा प्रताप की भील छापामार सेना के डर से अरावली के पहाड़ों में घुसने का साहस तक नहीं कर सकी।
यही था "मेवाड़ के शेर का Maharana Pratap 🚩 ⚔️🔥
#MaharanaPratap
अरावली की घाटियों में भील धनुर्धारियों के तीर शत्रु के लिए आतंक का कारण बन गए थे। उन्होंने प्रताप की सेना को स्थानीय भौगोलिक गुरिल्ला युद्धकला का अमूल्य सहयोग दिया।#HaldighatiVijay450
#HaldighatiVijay450
हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप को बंदी बनाने या मारने, मेवाड़ पर पूर्ण अधिकार करने में अकबर पूरी तरह विफल रहा था जो उनके हल्दीघाटी युद्ध में हार को दर्शाता है।