पूरे बिहार की मुस्लिम आबादी 17.7 प्रतिशत है,
ओवैसी साहब के जितने वाले कैंडिडेट का वोट
1.9 प्रतिशत है,
अगर ओवैसी साहब चुनाव नही लड़ते तो पूर्ण बहुमत से राजद की सरकार बन जाती और भाजपा 20 से 30 सीट पर सिमट जाती।
सारा खेल ओवैसी साहब के आने से बिगड़ गया।
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मैं उन दिनों से आपको देख रहा हूँ शायद फ़ॉलो भी किया हूँ जब आपका ये ब्लू टिक भी नही था,
तो एक कहावत कह देता हूँ आपको
जब मर्द से बच्चा पैदा न हो तो औरत को बांझ कहना बहुत आसान है। कब तक सपा और कांग्रेस की नाकामियों का ठीकरा ओवैसी पर फोड़ते रहोगे।
बिहार में AIMIM ने RJD और कांग्रेस को काफी नुकसान पहुंचाया है.
बिहार की 31 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम आबादी 25% से अधिक है,
और 25 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम आबादी 20% से अधिक है. AIMIM का बिहार चुनाव में 5 सीटें जीतकर कर हौसला बुलंद हैं.
असदुद्दीन ओवैसी का अगला मिशन UP-2027 है, यहां भी वो चुनाव लड़कर BJP को फायदा पहुंचाना चाहते हैं.
UP में 73 विधानसभा पर मुस्लिम आबादी 30% से ज्यादा है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने इसका तोड़ निकालना होगा.
इस बात पर गहन चिंतन होना चाहिए मुस्लिम समाज को असदुद्दीन ओवैसी क्यों पसंद आ रहे हैं. BJP से नफरत और AIMIM से हमदर्दी एक साथ कैसे चल सकती है ?
दोगलई अनलिमिटेड!
बिहार चुनाव के टिकट बंटवारे के बाद जो शोर, चीख-पुकार और आरोपों का तूफ़ान उठा,
उसने यह साफ़ कर दिया कि बहुत से लोगों की तकलीफ़ असल में टिकट को लेकर नहीं,
बल्कि 'मजलिस' के उभार को लेकर है।
मौलाना सालिम चतुर्वेदी @imasqchaturvedi साहब और दो-तीन अन्य नामों को टिकट न मिलना एक राजनीतिक निर्णय था- पार्टी के अंदरूनी मापदंडों और रणनीति के तहत लिया गया। मगर, जैसे ही यह फ़ैसला सामने आया, कुछ तथाकथित मजलिस समर्थक, और उनसे भी ज़्यादा जुम्मन बिरादरी जैसे मौकापरस्त तबके, अचानक 'ईमानदार क्रांतिकारी' बन गए।
उन्होंने सोशल मीडिया से लेकर गलियों-मुहल्लों तक
एक नकारात्मक मुहिम शुरू कर दी- कि देखो! 'पार्टी ने अपने पुराने लोगों को नज़रअंदाज़ कर दिया',
'टिकट बिक गए', 'सौदे हो गए'.... और न जाने क्या-क्या। सीधे, जनाब @asadowaisi और जनाब @Akhtaruliman5 साहब का नाम लेकर हल्ला मचाया गया..
जनाब मौलाना चतुर्वेदी का नाम लेकर एक इज़्ज़तदार आलिम को राजनीतिक बहस का हथियार बना डाला। यह तक कह दिया गया कि 'नेतृत्व ने धोखा दिया'- जैसे पार्टी नहीं, किसी खानदानी जागीर का बंटवारा हो रहा हो!
और अजीब यह कि गवैय्या इमरान प्रतापगढ़ी तक मैदान में उतर आया! जो लोग पहले कभी मजलिस के साथ दिखे नहीं, वो भी मौलाना के नाम पर 'बिलबिलाने' का नाटक शुरू कर दिया!
ठीक है, मान लेते हैं-
अगर इसे हम 'नाटक' नहीं, बल्कि 'हक़ीक़ी मोहब्बत' मान लें- कि इन लोगों का दर्द वाकई मौलाना चतुर्वेदी के लिए था,
तो फिर सवाल उठता है:
क्या ये दर्द, यह आवाज़, यह बग़ावत सिर्फ मजलिस के लिए ही आरक्षित है?
महा-गठबंधन में भी तो कई ऐसे लोग हैं जो दशकों से पार्टी में थे, जिनका जनाधार था, जिन्होंने मेहनत की- मगर उन्हें भी टिकट नहीं मिला। कई सीटिंग यानी वर्तमान विधायक तक काट दिए गए। कई मुस्लिम बहुल इलाकों में
मुसलमान उम्मीदवारों को बारीकी से नज़रअंदाज़ किया गया, जबकि यादवों को उनकी आबादी से कई गुना ज़्यादा टिकट दिए गए।
क्या किसी 'जुम्मन बिरादरी' ने वहाँ आवाज़ उठाई? क्या किसी ने ट्वीट या बयान दिया?
कहीं कोई रोष नहीं, कोई नारा नहीं- बस खामोशी और रज़ामंदी।
मुकेश सहनी, जिनकी आबादी बिहार में मुश्किल से २% है —
उन्हें १८ टिकट दिए गए, और उनमें एक भी मुसलमान उम्मीदवार नहीं! यह तब, जब उन सीटों में कई इलाक़े मुस्लिम बहुल हैं।
क्या किसी मजलिस विरोधी ने इस अन्याय पर आवाज़ उठाई?
क्या किसी को यह 'सौदा' नज़र नहीं आया?
नहीं- क्योंकि वहाँ बोलने से 'मालिक' नाराज़ हो जाते हैं,
और मजलिस पर बोलने से 'तालियाँ' मिलती हैं।
सबसे बड़ी बात ये कि चार मजलिस विधायक जो बाद में राजद में शामिल हो गए-
उन्हें मजलिस के समर्थकों ने 'ग़द्दार' कहा था, और ठीक कहा था, क्योंकि उन्होंने जनता के वोट को धोखा दिया था।
मगर आज उन्हीं में से तीन का टिकट काट दिया गया और मजलिस विरोधी बिरादरी पूरी तरह खामोश है। न कोई ट्वीट, न कोई नारा, न कोई सवाल!
ये विधायक मजलिस के लिए तो 'ग़द्दार' हैं लेकिन राजद के लिए तो 'वफ़ादार' से बड़े वफ़ादार थे? और जुम्मन बिरादरी के लिए भी ये लोग 'बड़े अच्छे' ही थे कि इन्होंने एक भाजपा की 'बी-टीम' पार्टी को छोड़कर महान सेक्यूलर नेता लालू प्रसाद यादव की पार्टी का दामन थामा था...! लेकिन, चार में से तीन का टिकट कटने पर भी जुम्मन बिरादरी और उनके मांगी इम्मू भैय्या जैसे लोग ख़ामोश हैं।
यही असली दोगलापन (दोगलई) है। इनकी नफ़रत मजलिस से है। ये वही तबका है जो मजलिस के हर कदम पर उंगली उठाएगा, मगर 'महा-ठग-बंधन' के हर अन्याय पर खामोश रहेगा, सिर झुकाएगा...!
असल बात ये है-
@aimim_national- All India Majlis-E-Ittehadul Muslimeen का विरोध विचारधारा पर नहीं, बल्कि 'पहचान' पर है। जो मुसलमान मजलिस से जुड़ता है, वो 'अवाम की आवाज़' बन जाता है- और यही बात दोगलों और सेक्यूलर दलों को खटकती है। क्योंकि उन्हें चाहिए ऐसा मुसलमान जो वोट दे, सवाल न करे, सपोर्ट करे, मगर नेतृत्व न मांगे!
ऐसे दोगलों, बदमाशों से सावधान रहो...!!
मुस्लिम समाज के हित के लिए ये मोली साहेब त्रिपुरारी तिवारी उर्फ मनीष कश्यप के साथ मिलकर बिहार के वंचित मुस्लिमों का उद्धार करेंगे इनको ओवैसी की पार्टी बिहार में काम करने से रोक रही थी
अब जनसुराज में जाकर भला करेंगे।
14 नवंबर के दिन बिहार को नया मुख्यमंत्री मिलने जा रहा हैं और ये जोड़ी बिहार में इतिहास रचने जा रही हैं!
बिहार की जातीय समीकरण के हिसाब से :
यादव और मुस्लिम :- 32+ प्रतिशत
सामान्य वर्ग :- 15 प्रतिशत
EBC :- 36+ प्रतिशत
अगर तेजस्वी और राहुल गांधी M+Y फैक्टर को सॉल्व कर लेते हैं तो सत्ता में वापसी हो सकती हैं , क्योंकि EBC की भी बहुत सी जातियां नीतीश और BJP से खुश नहीं हैं!
सामान्य वर्ग के वोटों में प्रशांत किशोर सेंध लगाने वाले हैं , इसलिए वहां वोटों का बिखराव होगा जिसका फायदा RJD+ Congres को मिल सकता हैं!
बस थोड़ी बहुत दिक्कत ओवैसी से हो सकती हैं कुछ क्षेत्रों में !
23 मई को हमारा जन्मदिन था।
अकाउंट #Withheld था तो आपसे रूबरू नहीं हो पाये।
बधाईयां आज स्वीकार की जा रही है।
तानाशाह को यही कहेंगे...
तुम्हारी सोच के सांचे में ढल नहीं सकता
जबान कlट लो लहज़ा बदल नहीं सकता
मुझे भी मोम का पुतला समझ रहे हो क्या
तुम्हारी लौ से ये लोहा पिघल नहीं सकता