A constable who got his job on compensatory grounds after demise of his father, was seen beating students and girls in plain clothes. दिल्ली पुलिस । शांति सेवा न्याय ।
#amitkilhor#kilhor#delhipolice
देश के नौजवान इस बात को लेकर के आगे बढ़ें। ये समय की मांग है। ये जुल्म के सामने जंग ही एक रास्ता है दोस्तों। जुल्म के सामने झुकना ये इस देश की मिट्टी में नहीं है दोस्तों। इस देश की मिट्टी जुल्म के सामने झुकने का रास्ता कभी दिखाती नहीं है। इस देश की मिट्टी जुल्म के सामने जंग करने का रास्ता दिखाती है। भाइयों और बहनों ये आवाज थमने वाली नहीं, ये आवाज रुकने वाली नहीं है। ये आंदोलन चलता रहना चाहिए।
मोदी सरकार को शर्म आनी चाहिए ! अब 'विपक्ष' नहीं देश के 'बच्चे' सवाल पूछ रहे हैं
कौन किसको बचा रहा है ? मोदी 'शिक्षामंत्री' को बचा रहे हैं या शिक्षामंत्री को मोदी : प्रकाश राज, एक्टर
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
हो गई है पीर पर्वत-सी, पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
#संसद_मार्च#जंतर_मंत्र
मैंने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लड़ते हुए नहीं देखा, लेकिन कल दिल्ली की सड़कों पर इस देश के भविष्य के लिए लड़ते हुए युवाओं को जरूर देखा। उनकी आँखों में उम्मीद थी, दिल में जुनून था और आवाज़ में बदलाव की गूंज थी। यही युवा भारत के भविष्य की सबसे बड़ी ताकत हैं। 🇮🇳
अब चलाओ इन किसानों पर भी लाठियां . दागो आंसू गैस के गोले . यही कर सकते हो न आप लोग ? करो . ये दुनिया देख रही है . इतिहास में सब दर्ज हो रहा है . याद रखना .
1942 का भारत छोड़ो आंदोलन, आजादी के इतिहास का सबसे खूनी, हिंसक आंदोलन था।
टोन्थेम रिपोर्ट कहती है-
आंदोलन में 550 से अधिक थानों पर हमले हुए। उनपर कब्जा कर लिया गया, या जला दिये गए। 332 रेलवे स्टेशन में तोड़फोड़ हुई। 109 स्थानों पर रेल की पटरी उखाड़ी।
309 सरकारी इमारतें आगजनी से क्षतिग्रस्त हुई। 11,285 टेलीग्राफ/टेलीफोन लाइनें डिस्टर्ब हुए, सैकड़ों मील लाइनें काटी गईं। देश में 664 बम विस्फोट हुए।
49 पुलिसकर्मी मरे,1,363 घायल हुए। बलिया, तामलुक, मिदनापुर, सतारा में तो प्रशासन आंदोलनकारियो को सत्ता सौपकर चलता बना। वहां महीनों समानांतर सरकारे चली।
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दमन के लिए सरकार को एड़ी चोटी लगानी पड़ी। 91,836 गिरफ्तारीयां हुई। जिसमे अनाधिकृत डिटेन शामिल नही। 538 बार फायरिंग हुई। 3000 से अधिक लोग मरे।
गंभीर रूप से घायल दसियों हजार थे। सेना की 57 बटालियन तैनात करनी पड़ी। समूचे गाँवों पर जुर्माना करके 90 लाख वसूले गए। कई गांवों को जलाया या नष्ट किया गया।
पटना भागलपुर मुंगेर तालचेर नदिया में तो एयरफ़ोर्स की मदद से मशीनगनिंग की गयी। वाइसराय लिनलिथगो में इसे1857 के बाद का सबसे भीषण विद्रोह कहा।
सवाल यह कि गांधी के आंदोलन में, गांधी के जीतेजी इतनी हिंसा औऱ प्रतिहिंसा- भला सम्भव कैसे हुई???
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8 अगस्त को गांधी ने आंदोलन की शुरुआत की। करो या मरो का नारा दिया। अगली सुबह वे गिरफ्तार हो गए।
साथ मे पूरी कांग्रेस, उसके लीडर, देश मे, प्रदेश में, शहरों और गांवों में गिरफ्तार किये गए। सरकार ने सोचा- नेताओ को गिरफ्तार कर लो, जनता ठंडी।
और आंदोलन खत्म.
जो उल्टा पड़ गया।
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गांधी, इसके पहले असहयोग औऱ सविनय अवज्ञा के दो राष्ट्रव्यापी आंदोलन कर चुके थे। चौरी चौरा हिंसा होते ही पहला आंदोलन वापस ले लिया।
दूसरे आंदोलन में भी हिंसा की छिटपुट घटनाएं हुई, मगर ज्यादातर उनके मूवमेंट अनुशासित थे। लीडर तब भी गिरफ्तार हुए, छूटे, फिर पकड़े गए। सरकार ने डेमोक्रेटिक चैनल खुले रखे। गांधी को गद्दार न कहा।
बकिंघम पैलेस में चाय पिलाई।
कांग्रेस के सांगठनिक ढांचे ने आंदोलन को नियंत्रित रखा। और यह नियंत्रण इसलिए कि उन्हें भी आजाद भारत चाहिए था..
लेकिन अराजक औऱ हिंसक भारत नही।
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लीडर जब आंदोलन शुरू करता है, तो इतिहास उसके सिर पर, एक जिम्मेदारी भी रख देता है। यह कि आने वाली पीढियां-उसकी सफलता ही नही, उसके तरीको की भी स्क्रूटनी करेंगी।
लोगो को अराजकता की राह दिखाकर, हिंसा और लाशो को सीढ़ी बनाकर हासिल गयी सफलता, तो राम का नाम भी दागदार बना देती है। ऐसे में गांधी को हिंदुस्तान की आजादी पवित्र रखनी थी।
तो उसे त्याग, तपस्या औऱ अनुशासन से हासिल करना था।
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लेकिन जब गांधी ही जेल में डाल दिया गया, तो अराजकता को रोकने वाला कोई नही था। अपनी लगाई आग में ब्रिटिश सत्ता जल गई। उसके संसाधन उलझ गए।
खूनी दमन चक्र भी जनसैलाब रोक न सका। लंदन में अगली सरकार ने आते ही, भारत की सत्ता सम्हालने से हाथ खींच लिए। गलती सिर्फ एक-
जनता को लीडर लेस बनाना,
और क्राउन ज्वेल इंडिया
सर का बोझ बन गया।
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लीडरशिप वेक्यूम बनाने को सिर्फ जेल नही, और भी तऱीके हैं। आप डराकर चुप करा दें, खरीदकर मिला लें, या मॉर्निंग वॉक पर गोली मरवा दें।
यह न मुश्किल हो, तो पप्पू, टोंटीचोर, गद्दार या चरित्रहीन साबित कर सकते हैं। मगर उसके बाद, याद रहे, जब आक्रोश का लावा फूटेगा- उसे नियंत्रण में रखने वाला कोई न होगा।
लीडरलेस आंदोलन- किसी भी सरकार के लिए 1942 की तरह हजार मुंह का राक्षस बन जायेगा। और जो दिल्ली मे हुआ, ऐसी ही लीडरलेस भीड़ का नतीजा था।
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शुक्र है, हमारे युवाओं की डेमोक्रेटिक ट्रेनिंग इतनी मजबूत है, कि कोई बदसूरत अराजकता निर्मित न हुई। लेकिन भाजपा, आरएसएस और उनके जडमूर्ख अहंकारी समर्थकों के लिए खतरे की घण्टी बज गयी है।
वे समझ नही पाते, कि कोई सरकार या प्रशासक, अनंत काल तक लोकप्रिय नही रह सकता। 5-10 या बीस साल बाद, गिनाई जा सकने वाली तमाम उपलब्धियो के बावजूद जनता में ऊब, और विकल्प की छटपटाहट बढ़ती है।
गलतियां भी जमा होती जाती है। जो एक समय फटकर निकलती है। डेमोक्रेसी में यह गुस्सा, चुनाव के रास्ते निकलता है। सबको फ्रेश शुरुआत का अवसर देता है।
तो मेच्योर नेता और राजनीतिक दल समझते हैं कि समय समय पर चुनाव हारना- "एक ब्लेसिंग है"
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लेकिन आजन्म सत्ता चाहने वाले नही। वे नशे में विरोध की जगह, विरोधी ही खत्म करने लगते हैं। तब भीड़ के निरंकुश होने का रास्ता भी खोलते हैं।
तब देर सवेर इस पॉवर हंगरी, आत्मविश्वासहीन, तानाशाह की सत्ता का यही हश्र होना है। जो अपने दल/विचारधारा के प्रति गहरी नफरत की खाई खोदने के बाद, अब वह बेतहाशा निरंकुश भीड़ की तरफ दौड़ रही है।
कभी नही लौटने के लिए।