देश के हर युवा से मेरी एक बात - आज इस देश में मेहनत का फल नहीं, सपने देखने की सज़ा मिलती है।
हर पेपर लीक, हर रद्द परीक्षा, हर अधूरी भर्ती - सिर्फ़ सिस्टम की विफलता नहीं, लाखों सपनों पर प्रहार है।
मैं जानता हूँ आप थक चुके हैं। ग़ुस्से में हैं। पर याद रखिए - जब सरकार सुनने को तैयार न हो, तब आवाज़ ऊँची करनी पड़ती है।
इसलिए मैं आप सबको बुला रहा हूँ - 17 जून, कोटा। छात्रों की गूंज।
आइए, मिलकर एक ऐसी हुंकार बनें जिसे अनसुना करना नामुमकिन हो। कोटा से शुरुआत - फिर देश के हर कोने तक।
ये आपके भविष्य की लड़ाई है। और मैं आपके साथ हूँ।
~ LoP श्री @RahulGandhi जी
🗓️ 17 जून | छात्रों की गूंज | कोटा महारैली
#ChhatronKiGoonj
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष आदरणीय श्री @RahulGandhi जी के कल कोटा पहुंचने से पहले ही भाजपा सरकार की बौखलाहट साफ दिखाई देने लगी है।
पहले कोचिंग संस्थानों, पीजी और गेस्ट हाउस संचालकों पर दबाव बनाया गया और अब घबराहट में राहुल गांधी जी की सभा के पोस्टर-बैनर तक उतरवाए जा रहे हैं। यह साफ दर्शाता है कि भाजपा सरकार युवाओं की आवाज़ और उनके आक्रोश से कितनी भयभीत है।
मुख्यमंत्री जी, यह केवल एक रैली नहीं है; यह भाजपा शासन में लगातार हुए पेपर लीक, रद्द हुई परीक्षाओं, बढ़ती बेरोज़गारी और युवाओं के भविष्य के साथ हुए विश्वासघात के खिलाफ करोड़ों युवाओं की हुंकार है। पोस्टर हटाकर, दबाव बनाकर और प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग करके आप युवाओं के गुस्से और उनके सवालों को नहीं दबा सकते।
आप पोस्टर हटा सकते हैं, लेकिन युवाओं के दिलों में उठ रहे सवाल नहीं हटा सकते। आप बैनर उतरवा सकते हैं, लेकिन छात्रों के भविष्य के लिए लड़ रहे राहुल गांधी जी के संकल्प को नहीं तोड़ सकते। जितनी कोशिश आवाज़ दबाने की होगी, उतनी ही ताकत से युवाओं की आवाज़ गूंजेगी।
मुख्यमंत्री जी, लोकतंत्र पाबंदियों से नहीं, संवाद से चलता है; कल कोटा से उठने वाली युवाओं की हुंकार सिर्फ राजस्थान ही नहीं, पूरे देश में गूंजेगी और आपकी छात्र-विरोधी नीतियों का जवाब बनेगी।
@kharge@INCIndia@priyankagandhi@kcvenugopalmp@Sukhjinder_INC@INCRajasthan
Join us and raise your voice for the students and their future.
🗓️ June 17, 2026
📍 Kota Mega Rally
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#ChhatronKiGoonj
सीकर में 22 वर्षीय नीट परीक्षार्थी उमेश माली की आत्महत्या का समाचार अत्यंत स्तब्ध करने वाला है। शोक संतप्त परिजनों के प्रति मेरी गहरी संवेदनाएं हैं।
नीट प्रश्नपत्र लीक के कारण इस वर्ष राजस्थान के प्रदीप मेघवाल सहित कई बच्चों ने आत्मघाती कदम उठाए हैं। यह आत्महत्या नहीं, बल्कि प्रश्नपत्र लीक तंत्र के आगे युवाओं की दम तोड़ रही हिम्मत है।
अत्यंत दुखद है कि केंद्र सरकार देश के युवाओं की इस पीड़ा से बेपरवाह है।
इंदिरा गांधी जैसी नेता आज होतीं तो RP एक्ट के तहत बीजेपी पर प्रतिबंध लगा देतीं, इस विषय पर मेरे स्पष्ट विचार:
"देखिए, विपक्ष के जितने भी लोग मेरे बयान पर आज बोल रहे हैं, वे खुद नहीं बोल रहे, बल्कि उनसे ऊपर से बुलवाया जा रहा है। आरएसएस वाले कहें या उनके बड़े नेता, वे बकायदा तय करते हैं कि आपको आज यह बयान देना है और आपको वह। कई बार तो जो लिखित बयान मीडिया में छपता है, उसकी भाषा और शब्दावली उन नेताओं की होती ही नहीं है। मैं उनमें से कई अच्छे लोगों को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ और उनकी वास्तविक भाषा से वाकिफ हूँ। जब उनकी बदली हुई भाषा सामने आती है, तो साफ समझ आ जाता है कि यह ऊपर से लिखकर आया है और वे केवल उसे दोहरा रहे हैं। यह तो हुई पहली बात।
दूसरी बात, मैंने जो कानूनी पहलू उठाया है, उस पर आज पूरे देश में चर्चा हो रही है और यह अच्छी बात है। लोकतंत्र (डेमोक्रेसी) में चर्चा होते रहनी चाहिए, क्योंकि उसी से एक 'नेशनल डिबेट' (राष्ट्रीय बहस) बनती है और मंथन से ही सही बातें निकलकर सामने आती हैं। मैं तो केवल यह पूछ रहा हूँ कि हमारा कानून और संविधान इस बारे में क्या कहता है? एक तरफ आप भी संविधान की दुहाई देते हैं, वहीं दूसरी तरफ जब राहुल गांधी जी कहते हैं कि संविधान की रक्षा करो, तो आप उसी संविधान की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं! आप खुद देख लीजिए। खैर, आप मीडिया वाले भी गजब हैं; एक बार दिल्ली में आपने कार में मेरी फोटो लेकर रील बना दी थी। आपकी दुनिया ही अलग है। लेकिन आप ही मुझे बताइए कि हमारा कानून वास्तव में क्या कहता है?
आइए, मैं आपको जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 की धाराएं समझाता हूँ:
धारा 123 (3), RPA 1951: इसके तहत किसी भी उम्मीदवार या उसके एजेंट द्वारा धर्म, जाति, समुदाय या धार्मिक प्रतीकों के आधार पर वोट माँगना पूरी तरह प्रतिबंधित है। कानून बिल्कुल साफ है, ऐसा करने पर चुनाव शून्य (Void) घोषित हो जाता है और दोषी पर 6 वर्ष तक चुनाव लड़ने की रोक लग सकती है। यह पहला नियम है।
धारा 123 (3A), RPA 1951: चुनाव के दौरान विभिन्न समुदायों के बीच धर्म या जाति के आधार पर नफरत, वैमनस्य या शत्रुता बढ़ाना 'भ्रष्ट आचरण' (Corrupt Practice) माना जाता है, जो किसी भी जीते हुए चुनाव को रद्द करने का सबसे ठोस कानूनी आधार है।
धारा 29A (5), RPA 1951: इसके अनुसार, किसी भी राजनीतिक दल के पंजीकरण (Registration) के समय दल द्वारा देश के संविधान और धर्मनिरपेक्षता (Secularism) की शपथ लेना अनिवार्य है। इसके बिना कोई भी नई पार्टी पंजीकृत नहीं हो सकती।
यह बात अलग है कि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) का यह दिशा-निर्देश वर्ष 2005 में आया था, इसलिए इसके पहले से अस्तित्व में आ चुकी पार्टियों को इसमें नहीं छुआ गया, जिसमें अकाली दल, एआईएमआईएम (AIMIM) और एआईएमएल (AIML) जैसी पार्टियाँ शामिल हैं, जो पहले धर्म या समुदाय के नाम पर बनी थीं। लेकिन आज के कानून के मुताबिक कोई नई पार्टी इस तरह नहीं बन सकती।
जब कानून यह कहता है, तो मैंने केवल उसी कानून की बात की है। आप देश की अदालतों के ऐतिहासिक फैसले उठाकर देख लीजिए:
वर्ष 1995 (शिवसेना मामला): चुनाव के दौरान एक उम्मीदवार के पक्ष में कथित तौर पर कट्टर धार्मिक भाषण देने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक सजा सुनाई थी। अदालत ने उस जीते हुए चुनाव को रद्द कर दिया था और संबंधित व्यक्ति पर 6 साल के लिए चुनाव लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया था।
वर्ष 1995 (डॉ. दासराव देशमुख मामला, नांदेड़): लोकसभा चुनाव के दौरान उम्मीदवार की सहमति से रैलियों और वाहनों पर धार्मिक नारे व सांप्रदायिक पोस्टर लगाने को बॉम्बे हाईकोर्ट ने 'भ्रष्ट आचरण' माना और जीता हुआ पार्लियामेंट का चुनाव रद्द कर दिया था। आप सोचिए, देश की अदालत ने संसद का चुनाव रद्द किया था!
वर्ष 1995 (मनोहर जोशी मामला): इस मामले में भी कोर्ट ने उनका जीता हुआ चुनाव रद्द कर दिया था, हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट से उन्हें किसी तकनीकी बिंदु (Technical Point) पर राहत मिल गई थी, वह एक अलग कानूनी विषय है।
भैरों सिंह शेखावत जी का मामला (1995-96): जिसका जिक्र मैंने कल भी किया था। चुनाव रैलियों में राम मंदिर और लक्ष्मी जी के प्रतीकों का इस्तेमाल करने के आरोपों को लेकर उनके खिलाफ केस चला था। हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया था। लेकिन चूंकि वे 1993 का चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बन चुके थे, इसलिए हाईकोर्ट के स्तर पर वे इस मामले में काफी गंभीर रूप से घिर गए थे। हम सब जानते हैं कि जब कोई मुख्यमंत्री पद पर बैठा हो, तो साक्ष्यों (Evidence) का मिलना कितना कठिन हो जाता है। अंततः साक्ष्यों के अभाव के कारण वे बच गए, अन्यथा वे भी इसमें कानूनी रूप से फंस चुके थे।
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केंद्रीय मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत द्वारा दिए गए बयान पर पूछे गए सवाल का जवाब:
"देखिए, उनका यह बयान पूरी तरह से एक राजनीतिक जुमले जैसा है। सच तो यह है कि उन्हें खुद नहीं पता कि पानी कहाँ से आ रहा है, किस पॉइंट से आ रहा है और कैसे आया होगा। जब नहर (कैनाल) बन रही थी, तब जैसलमेर बॉर्डर से लेकर जोधपुर तक मैंने खुद वहाँ के कम से कम सौ चक्कर लगाए होंगे। अब उन्हें इस जमीनी हकीकत का क्या पता? ऐसे में, मैं उनके इस बयान पर क्या जवाब दूँ?
दरअसल, उनके जो 'आका' (बॉसेस) हैं, उन्होंने उनसे कहा होगा कि देश में राहुल गांधी जी के इस अभियान से जो माहौल बन रहा है, उसे काउंटर (बेअसर) करने के लिए आप सब चारों तरफ फैल जाओ और कांग्रेस पर झूठे-सच्चे आरोप लगाना शुरू कर दो। हमारे केंद्रीय मंत्री जी का यह ताजा बयान भी उसी सोची-समझी रणनीति का एक हिस्सा है। इनका मकसद साफ है, पूरे देश के अंदर एक साथ निकलो और ऐसी फिजा (माहौल) बना दो जिससे युवाओं का यह जो आंदोलन शुरू हो रहा है, वह कामयाब न हो सके। मेरा स्पष्ट मानना है कि वरना उनके कल अचानक बयान देने का कोई और कारण ही नहीं था। कल तो कोई ऐसा प्रोवोकेशन (उकसावा) भी नहीं था, लेकिन वे अचानक बोल पड़े और न जाने कैसे-कैसे शब्दों का प्रयोग करने लगे। मैं तो उनसे सीधे कहता हूँ कि वे अपने पिछले 12 सालों का कोई एक बड़ा काम गिना दें, जो उन्होंने विशेष रूप से क्षेत्र के लिए किया हो।
अगर जोधपुर में कोई एक बड़ा काम हो भी रहा है, तो वह एलिवेटेड रोड का काम है। उस काम के लिए भी मैंने खुद केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी जी से व्यक्तिगत रूप से अनुरोध (रिक्वेस्ट) किया था कि इस प्रोजेक्ट को राज्य सरकार अकेले नहीं बना पाएगी। हम राज्य सरकार के स्तर पर प्रयास तो कर रहे थे, लेकिन वह क्षेत्र ऐसा था कि काम आगे बढ़ नहीं पा रहा था; इसलिए मैंने गडकरी जी से आग्रह किया और उन्होंने मेरी बात को स्वीकार कर लिया। अब चूंकि शेखावत जी केंद्रीय मंत्री हैं, जोधपुर के सांसद हैं और वह रोड वहीं बन रही है, तो अगर वे इसका श्रेय लेना चाहते हैं तो मुझे इसमें कोई ऐतराज नहीं है। वे शौक से श्रेय लें, लेकिन कम से कम उस काम को जल्दी पूरा तो करवाएँ! पर इसके अलावा वे कोई एक काम तो बताएँ कि पिछले 12 वर्षों में उन्होंने जनता के लिए क्या किया? जब उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं होता, तो वे फिर मुझ पर इस तरह के व्यक्तिगत कटाक्ष करने लगते हैं।
मैं हमेशा सच्चाई की बात करता हूँ। मैं तो आज भी उन्हें चाय पर बुलाने के लिए या खुद उनके पास जाने के लिए तैयार हूँ, बशर्ते वे यह बताएँ कि 'संजीवनी क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी' घोटाले का क्या हुआ? उन गरीब पीड़ितों को उनका डूबा हुआ पैसा कब वापस मिलेगा? अब जब उन्हें ऐसी कड़वी और सच्ची बातों से तकलीफ होती है, तो वे अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए मेरे खिलाफ 'फाउल' (गलत राजनीति) खेलने लग जाते हैं। यही असली हकीकत है।"
दोबारा होने जा रहे नीट (NEET) एग्जाम तथा टेलीग्राम ऐप पर प्रतिबंध को लेकर मीडिया के प्रश्न का जवाब:
"देखिए, सरकार ने सिर्फ टेलीग्राम को ही क्यों रोका? इंटरनेट और सोशल मीडिया पर ऐसे और भी कई प्लेटफॉर्म्स और चैनल्स हैं। अगर सरकार को कोई प्रतिबंधात्मक कार्रवाई करनी ही थी, तो वह किसी एक ऐप को टारगेट करने की बजाय सभी के लिए समान रूप से (कॉमन) लागू होनी चाहिए थी।
पर असल मुद्दा कुछ और है। अभी हाल ही में आपके ही मीडिया जगत के एक साथी मुझसे मिलने आए थे; जब हमारे बीच चर्चा हो रही थी, तब मैंने इस बात को बकायदा रेखांकित किया था कि देश में पेपर लीक का जो सिलसिला चल रहा है, वह किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। पेपर लीक राजस्थान में भी हुए, गुजरात में हुए, उत्तर प्रदेश में हुए और देश के अनेकों राज्यों में हुए हैं। मैंने तो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और भारत सरकार को समय रहते चेताया था कि पूरे देश के भीतर एक बहुत बड़ी अपराधी गैंग (Inter-State Gang) सक्रिय हो चुकी है, जो हर जगह युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हुए पेपर आउट करवा रही है। लेकिन केंद्र सरकार ने अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए, जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं वहाँ की बात करने की बजाय, जानबूझकर पूरा ध्यान केवल और केवल राजस्थान पर केंद्रित कर दिया।
ये लोग ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि धरातल पर तो ये कोई काम कर नहीं रहे हैं। ऊपर से लेकर नीचे तक भयंकर भ्रष्टाचार व्याप्त है। सुशासन (गवर्नेंस) नाम की कोई चीज़ बची नहीं है, चाहे पानी हो, बिजली हो, शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो या सड़कें, हर क्षेत्र बदहाल है। आज स्थिति यह है कि सरकार के किसी भी विभाग में पेमेंट नहीं हो पा रहे हैं; सारे सरकारी महकमे और ठेकेदार रो रहे हैं। बुजुर्गों और जरूरतमंदों को छह-छह महीने तक पेंशन नहीं मिल रही है, छात्रों को स्कॉलरशिप नहीं मिल पा रही है। आज राजस्थान ऐसे बदतर दौर से गुजर रहा है। ऐसे में जनता का ध्यान भटकाने के लिए इन लोगों ने केवल एक ही मुद्दा पकड़ रखा है। मैं तो कहता हूँ कि आपको किसने रोका है? जिसने भी गलती की है, जिसने भी अपराध किया है, आप उसे ढूंढिए और सख्त से सख्त सजा दीजिए। लेकिन आपके पास दूरदर्शिता नहीं है, इसलिए आप केवल पाँच साल तक इसी राजनीतिक द्वेष और आरोप-प्रत्यारोप में अपना समय बर्बाद कर देंगे।
इसके साथ ही, आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने राजस्थान की जनता के साथ एक बड़ी वादाखिलाफी की है। जब प्रदेश में चुनाव चल रहे थे, तब मैंने सार्वजनिक रूप से शंका जताई थी कि यदि राज्य में भाजपा की सरकार बनी, तो हमारी तमाम शानदार जनकल्याणकारी योजनाएं बंद कर दी जाएंगी। मेरी इस बात पर खुद प्रधानमंत्री जी ने मंच से प्रदेशवासियों को भरोसा दिलाते हुए वादा किया था कि 'अशोक गहलोत जो कह रहे हैं, मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि हमारी सरकार आने पर आपकी कोई भी जनहित की स्कीम बंद नहीं होगी।' लेकिन सरकार में आते ही इन्होंने हमारी तमाम कल्याणकारी योजनाएं बंद कर दीं।
आज जब हम प्रधानमंत्री जी को उनका वह वादा याद दिलाते हैं, जब हम उनसे कन्हैयालाल हत्याकांड के वास्तविक न्याय को लेकर सवाल करते हैं, या जब हम ईस्टर्न राजस्थान कैनाल प्रोजेक्ट (ERCP) की कड़वी सच्चाई और हमारी बंद की गई योजनाओं को लेकर जवाब मांगते हैं, तो न तो माननीय मोदी जी के पास इसका कोई जवाब होता है और न ही गृह मंत्री अमित शाह जी कुछ बोलते हैं। अब ऐसे में क्या किया जाए? सच तो यह है कि ये लोग देश और प्रदेश की सत्ता को जनता की सेवा के लिए नहीं, बल्कि पूरी तरह से अपने अहंकार और घमंड के बल पर चला रहे हैं। यही आज की सबसे बड़ी हकीकत है।"
कोटा में प्रशासन द्वारा लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्री @RahulGandhi के कार्यक्रम के होर्डिंग हटाए जा रहे हैं। भाजपा के कार्यक्रमों के जब होर्डिंग लगते हैं तब यह प्रशासन पूरा सहयोग देता है। कांग्रेस के कार्यक्रम के होर्डिंग हटाना घबराई हुई भाजपा का राजनीतिक षड्यंत्र है।
पहले कोचिंग संस्थानों को धमकियाँ, फिर छात्रों पर दबाव, और अब होर्डिंग हटाना, भाजपा इतनी भयभीत क्यों है?
छात्रों की आवाज़ होर्डिंग हटाने से नहीं दबेगी। इस तानाशाही के कारण ही कल 17 जून को कोटा में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं इस कार्यक्रम में शामिल होंगे।
स्वास्थ्य मंत्री की बयानबाजी एवं गवर्नेंस (सुशासन) से जुड़े मुद्दे पर सवाल का जवाब:
"देखिए, जब मैं यह कहता हूँ कि राजस्थान के अंदर गवर्नेंस (सुशासन) नाम की कोई चीज़ नहीं बची है, तो यह परिस्थितियां खुद-ब-खुद सब बयां कर देती हैं। आपने तो अभी केवल दो उदाहरण दिए हैं; ऐसी अनेकों बातें और किस्से हैं जो इस सरकार के बारे में कहे जा सकते हैं। आज प्रदेश में जिस प्रकार के हालात हैंएक तरफ मंत्री जी खुद औचक निरीक्षण (छापेमारी) कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ उन्हीं के कथित 'एजेंट' भ्रष्टाचार के मामलों में रंगे हाथों पकड़े जा रहे हैं। और इस पर मंत्री जी का बयान आता है कि 'मैं इस्तीफा दे सकता हूँ।' वैसे, मंत्री जी ने इससे पहले भी एक बार इस्तीफा दिया था, है ना? और फिर बाद में अपना इस्तीफा वापस भी ले लिया था।
अब वे भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर दबाव बना रहे हैं कि 'अगर मेरी बात नहीं मानी गई, तो मैं पद छोड़ दूँगा।' सच तो यह है कि यह आदरणीय किरोड़ी लाल मीणा जी की फितरत का हिस्सा है। जब से उन्होंने राजनीति शुरू की है, तब से उनका सार्वजनिक दृष्टिकोण और बोलने का तरीका यही रहा है। यही उनकी 'यूएसपी' (पहचान) है। किरोड़ी मीणा जी की यूएसपी ही यही है कि वे अपनी ही सरकार और अपने ही मुख्यमंत्री पर खुलकर कटाक्ष करते हैं, और जनता से बड़े-बड़े वादे करते हैं कि 'मैं यह कदम उठा लूँगा, मैं वह कदम उठा दूँगा।' वे लगातार यही सब करते आए हैं, इसलिए उनकी इस बयानबाजी पर अब क्या ही बात की जाए!
और जब खुद कैबिनेट मंत्रियों का यह हाल है, तो आप बाकी मंत्रियों की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगा सकते हैं। आज सरकार में यह आलम है कि मंत्रियों के फोन तक उनके विभाग के सेक्रेटरी (सचिव) नहीं उठाते! आप यह सब बातें मेरे मुँह से क्यों कहलवाना चाहते हैं? हकीकत यह है कि यदि कोई कैबिनेट मंत्री या यहाँ तक कि डिप्टी सीएम (उपमुख्यमंत्री) स्तर के लोग भी अपने ही विभागों में फोन करते हैं, तो प्रशासनिक अधिकारी, चाहे वे सेक्रेटरी हों या विभाग के एचओडी (विभागाध्यक्ष), उनका फोन तक रिसीव नहीं करते। यह बात खुद वो मंत्री अपने कार्यकर्ताओं से ऑफ-रिकॉर्ड कहते हैं कि 'भाई, अधिकारी हमारा फोन ही नहीं उठाते, तो हम आपकी क्या मदद करें?' जब कोई आम कार्यकर्ता उनके पास जाकर गुहार लगाता है कि 'साहब, जरा अधिकारियों को एक फोन तो कर दीजिए,' तो मंत्रियों का जवाब होता है'जब वे मेरा फोन ही नहीं उठाते, तो मैं क्या फोन करूँ!' आज राजस्थान सरकार में प्रशासनिक समन्वय की यह बदतर स्थिति हो चुकी है। यही इस सरकार की असली तस्वीर है।"
आज 49, सिविल लाइन्स पर मीडिया के साथियों से बातचीत:
नेता प्रतिपक्ष श्री राहुल गाँधी के कोटा दौरे को लेकर मीडिया के सवाल का जवाब:
"देखिए, राहुल गांधी जी ने युवाओं के लिए जो देशव्यापी कार्यक्रम दिया है, उसका तमाम युवा साथियों ने बढ़-चढ़कर स्वागत किया है। आखिरकार कोई तो है जो देश के युवाओं की आवाज बुलंद कर रहा है। इसीलिए उन्होंने अपने इस अभियान की शुरुआत कोटा से की है, जो आईआईटी और तमाम प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग का एक बड़ा हब (केंद्र) बना हुआ है।
अब देखिए, कल ही राजस्थान के नवलगढ़ में एक और छात्र ने आत्महत्या कर ली। मेरी जानकारी के अनुसार, पिछले कुछ ही दिनों में यह दूसरी या तीसरी दुखद घटना है। पूरे देश के भीतर न जाने कितने युवा अवसाद में आकर आत्महत्या कर रहे हैं, लेकिन सरकार इसका कोई वास्तविक आंकड़ा देश के सामने नहीं रखती। आज देश में बेहद गंभीर स्थिति बन गई है। चाहे एसएससी (SSC) की परीक्षा हो या नीट (NEET) की, जिस प्रकार एक के बाद एक पेपर लीक हुए हैं, उससे व्यवस्था पर से युवाओं का विश्वास पूरी तरह समाप्त हो गया है। आप खुद सोच सकते हैं कि यह कितना बड़ा देशव्यापी मुद्दा बन चुका है।
इसी गंभीर संदेश को केंद्र सरकार तक पहुँचाने के लिए और युवाओं की आवाज उठाने के लिए राहुल जी सड़कों पर हैं। विपक्ष ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा माँगा, लेकिन सरकार उन्हें हटाने को तैयार नहीं है। लोकतंत्र (डेमोक्रेसी) का तो पहला नियम यह होता है कि अगर जनभावना और जनता की पुरजोर माँग हो, तो सरकार उस पर तुरंत सख्त कार्रवाई करे; लेकिन यह सरकार पूरी तरह संवेदनहीन बनी हुई है, जो इस देश का बड़ा दुर्भाग्य है।
इस एनडीए (NDA) सरकार और विशेष रूप से भाजपा के कारनामों का नतीजा यह है कि आज चुनाव आयोग (इलेक्शन कमीशन) से लेकर न्यायपालिका (जुडिशियरी) तक, और सीबीआई, ईडी या इनकम टैक्स जैसी तमाम केंद्रीय एजेंसियां दबाव में हैं। चुनाव आयोग की भूमिका तो एक एजेंट जैसी दिखाई देने लगी है; हमने खुद देखा कि बिहार और बंगाल के चुनावों में क्या हुआ। देश के भीतर जो यह वर्तमान परिस्थितियां बनी हैं, वे धीरे-धीरे लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक होती जा रही हैं। अगर यही हाल रहा, तो देश में लोकतंत्र बचेगा कहाँ?
ये लोग 'कांग्रेस मुक्त भारत' की बात करते हैं और विपक्षी पार्टियों को समाप्त करने की वकालत करते हैं। लेकिन इन्हें समझना चाहिए कि बिना मजबूत प्रतिपक्ष के, सत्ता पक्ष का क्या वजूद रह जाएगा? ये लोग सब कुछ समझते हुए भी जानबूझकर ऐसी स्थिति पैदा करना चाहते हैं जिससे देश में सिर्फ एक पार्टी का राज कायम हो जाए और लोकतंत्र केवल नाम मात्र का रह जाए, ठीक वैसे ही, जैसे चीन में कोई वास्तविक लोकतंत्र नहीं है और वहाँ विपक्ष नाम मात्र का है। अगर हमारा चुनाव आयोग भी वैसा ही हो जाएगा, तो देश का भविष्य क्या होगा? यह स्थिति इस देश में कभी नहीं बननी चाहिए। इसीलिए मैं बार-बार युवाओं और छात्रों से कहता हूँ कि आप आगे आइए, राजनीति में कदम रखिए और लोकतांत्रिक विचारधारा को समझिए। यह देश के लिए बहुत संकट की घड़ी है।
आज देश और प्रदेश का माहौल ऐसा बना दिया गया है कि कोई बुनियादी समस्याओं पर विरोध प्रदर्शन भी नहीं कर सकता। अभी हाल ही में जोधपुर में, जो हमारे कानून मंत्री जी का गृह क्षेत्र है, वहाँ जनता ने पानी के संकट को लेकर प्रदर्शन किया, तो उनके खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज कर दी गई। हालात इतने बिगड़ गए कि जोधपुर शहर में केवल इसलिए धारा 144 लगा दी गई ताकि जनता का यह आक्रोश बड़े आंदोलन का रूप न ले ले। बीकानेर में तो खुद भाजपा के लोग बिजली संकट को लेकर माँग करने गए थे, तो वहाँ के एडिशनल एसपी ने उन्हें ही धमका दिया। वहाँ तीखी बहस हो गई और उन्हें धरने पर बैठना पड़ा। जिस प्रदेश में ऐसी स्थिति हो कि 'अक्रॉस द पार्टी लाइन' (दलगत राजनीति से ऊपर उठकर) खुद सत्ताधारी दल के लोग भी सड़कों पर आने को मजबूर हो रहे हों, तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आम जनता पर क्या बीत रही होगी!
मेरे पास रोज लोग मिलने आते हैं और बिजली-पानी के संकट की ऐसी-ऐसी कहानियां सुनाते हैं कि रूह काँप जाए। पूरे प्रदेश में पानी और बिजली को लेकर त्राहि-त्राहि मची हुई है, लेकिन सरकार चैन की नींद सो रही है। इन्हें इस बात का अहसास तक नहीं है कि धरातल पर वास्तव में क्या समस्या है; और ऐसा इसलिए है क्योंकि इस सरकार में अनुभव की भारी कमी है।
मैं बार-बार कहता हूँ कि 'अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता।' अनुभवहीनता के कारण ही ये लोग जनता की परवाह नहीं कर रहे हैं, बल्कि उल्टा दावा करते हैं कि प्रदेश में कोई समस्या ही नहीं है। अरे, आप कम से कम यह स्वीकार तो करो कि समस्या है और हम इसे ठीक करने का प्रयास कर रहे हैं; तब जाकर जनता को भी लगेगा कि सरकार कोशिश कर रही है। लेकिन इनकी अप्रोच (दृष्टिकोण) पूरी तरह नकारात्मक और संवेदनहीन है।
इनका काम करने का तरीका यही बन चुका है। अत्याचार और तानाशाही का स्तर देखिए कि मंदसौर में मीनाक्षी नटराजन जी का नामांकन (परचा) ही खारिज कर दिया गया! आखिर हमारा मुल्क किस दिशा में आगे बढ़ रहा है?
अब देश के माननीय लोकसभा स्पीकर साहब के संसदीय क्षेत्र (कोटा) में देश के नेता प्रतिपक्ष श्री राहुल गांधी जी आ रहे हैं। कायदे से तो उनका स्वागत होना चाहिए, क्योंकि जिस सदन के वो स्पीकर हैं, उसी सदन के नेता प्रतिपक्ष वहाँ आ रहे हैं। लेकिन स्वागत करने की बजाय वहाँ ऐसा माहौल बना दिया गया जैसे खुद ओम बिरला जी इस दौरे के खिलाफ हैं और कोई भी उनके कार्यक्रम में न जाए। स्पीकर साहब को इस पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए कि ऐसी नौबत क्यों आई और यह सब किसके इशारे पर हो रहा है?
देश के युवाओं के न्याय के लिए राहुल गांधी जी के इस बड़े अभियान की शुरुआत कोटा, राजस्थान से हो रही है और वे ट्रेन से आ रहे हैं। लेकिन यहाँ की कोचिंग संस्थाओं को डराया जा रहा है, उन्हें धमकियाँ दी जा रही हैं कि 'आपके संस्थानों में कई कमियाँ हैं, नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहो।' अगर माननीय स्पीकर के खुद के लोकसभा क्षेत्र में विपक्ष के दौरे को लेकर ऐसी डरावनी स्थिति बनती है, तो पूरे मुल्क में क्या संदेश जाएगा? क्या इसे लोकतंत्र कहेंगे? इस विषय पर कल मैंने 'एक्स' (ट्विटर) पर ट्वीट भी किया था कि माननीय स्पीकर को इस प्रकार की परिस्थितियां पैदा करना शोभा नहीं देता, जिससे शिक्षण संस्थाओं और आम लोगों के दिमाग में भय बैठ जाए।
यहाँ तो ऐसी सैकड़ों बातें हैं; सड़कों के गड्ढों को लेकर भी कोई आंदोलन कर दे, तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी जाती है और उसे राष्ट्रद्रोही या राज्यद्रोही करार दे दिया जाता है। अपने राजनीतिक जीवन में मैं पहली बार देश के भीतर ऐसी नाजुक और अजीब स्थिति देख रहा हूँ। देश किस दिशा में जा रहा है, कोई नहीं जानता।
ऐसे बदतर हालातों के बीच आज सोशल मीडिया ही एकमात्र गवाह बचा है। मैं देखता हूँ कि देश के नामचीन पत्रकार, साहित्यकार, लेखक और बुद्धिजीवी जब सोशल मीडिया पर आपस में चर्चा करते हैं, तो पूरा देश उन्हें बेहद गंभीरता से सुनता और समझता है, क्योंकि उनकी बातों में दम है। लेकिन दुर्भाग्य से हमारा मेनस्ट्रीम मीडिया (मुख्यधारा का मीडिया) पूरी तरह सत्ता के दबाव में है, जिसके कारण जनता से जुड़े ये असली मुद्दे टीवी चैनलों पर मुख्य बहस का हिस्सा नहीं बन पाते। मैं यह सीधा आरोप लगा रहा हूँ, चाहे किसी को बुरा लगे या भला, पर देश की कड़वी सच्चाई यही है। मीडिया जगत ने जो दबाव पिछले 12 वर्षों से सहन किया है, अब उससे बाहर निकलने का समय आ गया है। आपको इस भय और दबाव से मुक्त होना होगा, वरना इतिहास आपको भी कभी माफ़ नहीं करेगा।"
मेरे युवा और Gen Z साथियों,
एक बात मेरे मन में साफ़ है और आप भी इसे दिल में बैठा लीजिए: भारत के हर युवा का भविष्य सुरक्षित करना सरकार की ज़िम्मेदारी है।
पर ज़िम्मेदारी और ईमानदारी - दोनों मोदी सरकार की सोच से परे हैं।
पेपर लीक, परीक्षा कुप्रबंधन, रद्द होती भर्तियाँ, आसमान छूती फीस, निजीकरण, घोटाले - इन्हीं औज़ारों से वो हर दिन करोड़ों सपने तोड़ रही है।
याद रखिए, युवा का भविष्य ही देश का भविष्य तय करेगा। यही सब आपसे विस्तार से कहना है। इसलिए मैं आपको बुला रहा हूँ - देश की हर गली, हर कस्बे, हर शहर से उठती ‘छात्रों की गूंज’ को, आइए कोटा में हुंकार बनाएँ।
🗓️ 17 जून | छात्रों की गूंज | कोटा महारैली
#ChhatronKiGoonj
स्पीकर लोगों को कह रहे कि कोई राहुल गांधी के कार्यक्रम में न जाए?
स्पीकर साहब के एरिया में राहुल गांधी जी आ रहे हैं। उन्हें उनका वेलकम करना चाहिए, क्योंकि जिस हाउस के वे स्पीकर हैं उसी हाउस के नेता प्रतिपक्ष खुद वहाँ आ रहे हैं। स्वागत करने की बात तो दूर, वहाँ ऐसा संदेश दे दिया गया है जैसे ओम बिरला जी इसके खिलाफ हैं और कोई भी वहाँ न जाए। इस पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए कि आखिर यह नौबत क्यों आई? यह सब किसके इशारे पर हुआ?
देश में राहुल गांधी जी के इस अभियान की शुरुआत राजस्थान के कोटा से ही हो रही है, वे ट्रेन से आ रहे हैं। और आप वहाँ के कोचिंग संस्थानों को धमकियाँ दे रहे हैं कि आपके इंस्टीट्यूशंस में कई कमियाँ हैं, नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहो। अगर खुद स्पीकर के लोकसभा क्षेत्र में ऐसी स्थिति बनती है, तो पूरे मुल्क में क्या संदेश जाएगा? क्या यहाँ डेमोक्रेसी है?
इस मामले पर कल मैंने 'एक्स' पर पोस्ट भी किया था। स्पीकर को यह शोभा नहीं देता कि आप ऐसी स्थिति पैदा करें जिससे लोगों के दिमाग में यह भय बैठ जाए कि पता नहीं हमारे संस्थानों का क्या होगा। यह अच्छी बात नहीं है।
Why is a message being sent in the Speaker's constituency that no one should attend Rahul Gandhi's event?
Rahul Gandhi is coming to the Speaker's own constituency. He should be welcomed, because the Leader of the Opposition of the very House over which the Speaker presides is visiting the area. Far from extending a welcome, a message has been conveyed as if Om Birla Ji is opposed to the visit and that no one should attend. He should clarify his position on why such a situation has arisen. At whose behest did all this happen?
Rahul Gandhi's campaign in the country is beginning from Kota, Rajasthan. He is arriving by train. At the same time, coaching institutes are being threatened that their institutions have several shortcomings and that they should be prepared to face the consequences. If such a situation is created in the Speaker's own Lok Sabha constituency, what message will it send across the country? Can this really be called a democracy?
I had also posted about this issue yesterday on X. It does not befit the Speaker to create a situation that instills fear in people's minds about what might happen to their institutions. This is not a good thing.
बदलाव की शुरुआत, युवाओं के साथ!
छात्रों की गूंज को जन-अभियान बनाने के लिए पूरा हिंदुस्तान एकजुट हो रहा है।
आप भी नेता विपक्ष श्री @RahulGandhi के साथ युवाओं की इस न्यायपूर्ण और निर्णायक लड़ाई से जुड़िए।
🗓️ 17 जून | 📍 कोटा
#ChhatronKiGoonj
कोटा में 17 जून को NEET पेपर लीक के विरोध में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्री @RahulGandhi विद्यार्थियों से संवाद करने आ रहे हैं। इस कार्यक्रम को लेकर विद्यार्थियों और कार्यकर्ताओं में बड़ा जोश है एवं बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स इस कार्यक्रम में शामिल होना चाहते हैं।
इस कार्यक्रम को लेकर युवाओं के उत्साह को देखकर भाजपा पूरी तरह बौखला गई है और कोटा सांसद एवं लोकसभा स्पीकर के कार्यालय से फोन कर कोचिंग, पीजी और गेस्ट हाउस संचालकों को धमकाया जा रहा है कि उनके यहाँ से कोई विद्यार्थी इस कार्यक्रम में न जाए। स्पीकर जैसे गरिमामयी पद पर विराजमान व्यक्ति को ऐसी सोच नहीं रखनी चाहिए। विद्यार्थियों के साथ नेता प्रतिपक्ष, लोकसभा के संवाद की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को रोकने का ऐसा प्रयास निंदनीय है।