किसी को भी अपना बनाना नहीं है,
दिलों का ये पर्दा उठाना नहीं है।
उसी ने दिया है मुझे दर्द सारा,
जिसे हाल अपना बताना नहीं है।
अँधेरे में खुद को जलाते रहेंगे,
चरागों को लेकिन बुझाना नहीं है।
सफ़र में अकेले ह�� चलते रहेंगे,
किसी को भी रस्ता दिखाना नहीं है।
-Aditya Sharma 'anhad'
कलेजा भी हमारा अब जलाया है ग़मों ने ही,
लहू भी इन निगाहों का बहाया है ग़मों ने ही।
दवा कोई नहीं मिलती हमारे ज़ख़्म की अब तो,
हलाकत का नया रस्ता दिखाया है ग़मों ने ही।
Aditya Sharma 'anhad'
#shayari#poetry
बहुत झूठा यहाँ देखो, फरेबी ये ज़माना है,
हमारा इस गली में अब, नहीं कोई ठिकाना है।
तुम्हें जाना अगर है तो, चले जाओ ख़ुशी से तुम,
बनाया है नया तुमने, यहाँ झूठा बहाना है।
कभी हम भी तुम्हारे थे, कभी तुम भी हमारे थे,
भला कैसे कहें हम अब, पुराना वो फ़साना है।
Aditya Sharma 'anhad'
ज़मीं के इन हसीं झूठे, सजे ऊंचे मकानों से,
परिंदों को मुहब्बत है, गगन की इन उड़ानों से।
ज़माने की हक़ीक़त को, ज़रा तुम भी समझ लो अब,
सबक़ मिलता हमें अक्सर, मिटे ऐसे निशानों से।
कहे अनहद ख़ुदा मिलता, नहीं ऐसे दिखावे से,
उसे पाना अगर हो तो, बचो झूठे गुमानों से।
आदित्य शर्मा 'अनहद'
मैं आसान दिखता हूं, आसान नहीं ���ूं,
मैं इंसान सही हूं भगवान नहीं हूं,
पर मुझको पता है जमाने की हकीकत ये
पूजेगा ज़माना भी अगर मैं बेइमान नहीं हूं।
Aditya Sharma 'anhad'
#poetry #hindipoetry
अँधेरी शाम के साए ���ें अब भी ख़्वाब बाक़ी हैं,
हमारी आँख में ठहरा हुआ यह आब बाक़ी हैं,
कहे यह जग कि हम तो हिम्मत अपनी हार बैठे हैं,
मगर दिल में हमारे हौसले बे-ताब बाक़ी हैं।
Aditya Sharma 'anhad'
#urdu #urduPoetry
शाम के साए में अब भी ख्वाब बाकी हैं,
आँख में ठहरा हुआ ये आब बाकी हैं।
लोग कहते हैं कि हम तो हार बैठे हैं,
पर अभी भी हौसले बे-ताब बाकी हैं।
Aditya Sharma 'anhad'
#hindi#hindipoetry
माँ अगर जो मुस्कुरा��, ज़िंदगानी है यहाँ,
चाहतों की पाक सी इक, ये कहानी है यहाँ,
दर्द में भी हौसला वो, बख़्शती है हर घड़ी,
उस ख़ुदा की रहमतों की, मेहरबानी है यहाँ।
Aditya Sharma 'anhad'
#shayari #motheday
#poetry
मुसाफिर हूँ मैं तो डगर मांगता हूँ
, अंधेरों में अपना शहर मांगता हूँ,
तमाशा बना है ये जीवन अनहद
मैं खामोश रहकर असर मांगता हूँ।
Aditya Sharma 'anhad'
#poetry#hindi#hindipoetry#shayari#shayar
कलम की नोक पे पहरा बिठाया जाता है,
जो सच कहे, उसे विद्रोही बताया जाता है।
अजीब दौर है ये मुन्सिफ़ों की बस्ती का,
कि बेगुनाह को ही मुजरिम बनाया जाता है।
आदित्य शर्मा 'अनहद'
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यज्ञ-वेदी के हवि-कण सारे, स्वयं पुरोहित चाट गए,
देवत्वों की ओट लेकर, ये दानवता को बांट गए।
सत्य ठिठुरता रहा द्वार पर, निर्वसन और मौन हो,
मिथ्या के सौदागर देखो, मूल्यों का सर काट गए।।
Aditya Sharma 'anhad'
कविता की कुछ पंक्तियां
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