छुट्टी का अर्थ क्या है?
विदेश यात्राएँ भी, मंदिर दर्शन भी, लक्षद्वीप के समुद्र तट भी देखे गए, समुद्र के भीतर की तस्वीरें भी आईं।
अगर विदेश यात्रा, धार्मिक यात्रा, समुद्र तट पर जाना, प्रकृति के बीच समय बिताना, अच्छा भोजन करना और आराम करना भी छुट्टी नहीं है,
तो फिर मुझे लगता है इस देश में कोई भी छुट्टी नहीं ले रहा।
हर आदमी काम ही कर रहा है - कोई मनाली में काम कर रहा है, कोई गोवा में, कोई परिवार के साथ, कोई दोस्तों के साथ।
2014 से 2026 के बीच प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च हुए। असली बहस यह है कि इन दौरों से भारत को कितना निवेश मिला, कितने रोजगार बने और व्यापार हितों को कितना लाभ हुआ?
देश का आम आदमी नहीं देखता कि नेता ने कितने घंटे काम किया, वह देखता है कि उसके जीवन में क्या बदला।
जिस युवा का पेपर लीक हो गया, जिस किसान को फसल का दाम नहीं मिला, जिस मरीज को अस्पताल में बेड नहीं मिला, जिस परिवार की नौकरी चली गई - उसे 18 घंटे और 20 घंटे के से क्या फर्क पड़ता है?
18 घंटे काम करने का काम का परिणाम क्या निकला? शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, न्याय और नागरिक सुरक्षा के मोर्चे पर देश कहाँ पहुँचा।
युवा पूछ रहा है कि डिग्री के बाद नौकरी कब मिलेगी?
आम आदमी भी अपनी नौकरी में भी 12-14 घंटे खटता है, मजदूर धूप में पूरा दिन काम करता है, किसान बिना रविवार के खेत में उतरता है।
सवाल यह नहीं कि किसने कितने घंटे काम किया। सवाल यह है कि उस काम का परिणाम क्या निकला।
अगर काम का पैमाना सिर्फ घंटे हैं, तो इस देश का सबसे बड़ा कर्मयोगी शायद वह मजदूर है जो रोज़ दो वक्त की रोटी के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देता है।
CJP कोई बड़ी चीज़ नहीं, पर आप तो हैं. क्या ये राजनीतिक, सिविल सोसाइटी, लिबरल कहे जाने वाले लोगों को शोभा देता है कि पल-पल छोटी-छोटी बात पर उनके ख़िलाफ़ पोस्ट लिखा जाये? इतने ही फ़ालतू हैं वे, तो आप इतना ध्यान दे ही क्यों रहे हैं? पूरे देश की आवाज़ का कोई एक प्रतिनिधि नहीं हो सकता है. कोई है ही नहीं.
आप सत्ता की तरह ही व्यवहार कर रहे हैं कि जो प्रोटेस्ट करे, उसके बारे में शक पैदा करो. उन्हें अलग-अलग लेबल दे दो. हर बात पर सवाल उठाओ. उनका मनोबल तोड़ो.
ये पार्टियां या उनके समर्थक क्या लड़ेंगे, अगर सत्ता में रहते हुए भी यही असुरक्षित हैं और विपक्ष में रहते हुए भी ये ही असुरक्षित हैं.
आप तथ्यात्मक तौर पर कुछ जानते नहीं हैं, बस अपना दिमाग़ चला रहे हैं कि ऐसा हो रहा है तो ऐसा है, वैसा हो रहा है तो वैसा है. किसी को नहीं पता कि अगले दस दिन में क्या हो जाए या अगले दस साल में.
बड़प्पन दिखाओ भाई थोड़ा. सीखने दो युवाओं को कि धूप कैसी लगती है, सड़क पर कैसा लगता है. पुलिस का डर क्या होता है. हौसला दो देश के युवाओं को कि अपनी आवाज़ उठाना कोई ग़लत बात नहीं है.
आज जिस तरह सेंटर से CUET एग्जाम में अव्यवस्था की खबरें आ रही है इसने इस बात को साबित कर दिया है कि अब सरकार इन अब चीज़ों को एकदम गंभीरता से नहीं लेती है और कहीं न कहीं सुरजीत भल्ला जी की बात सही लगने लगी है कि सरकार की प्राथमिकता और पैमाना बस चुनाव जीतना भर रह गया है।
और सरकार के बड़े समर्थक वर्ग को इन सब चीजों पर सवाल करना भी सही नहीं लगता है।
अभी तो सब चंगा सी वाला हिसाब चल रहा पर आज से बीस पच्चीस साल बाद ये वाली मोदी सरकार अजूबे के रूप में याद की जायेगी जहां
सड़क मंत्री पेट्रोलियम और इथेनॉल की बात करता है,
पेट्रोलियम मंत्री विदेश सेवा की बातों में ज़्यादा रुचि लेता है।
वित्त मंत्री को प्रधानमंत्री के बताने के बाद पता चलता है कि देश पर कोई वित्तीय संकट है।
जिस मंत्री के सरंक्षण में नीट परीक्षा लीक घोटाले हुए हों, वही फिर से अपनी देख रेख में परीक्षा करवाने का सुपात्र पाया जाता हो।
और उस शिक्षा मंत्री को सीबीएसई की दसवीं बारहवीं की पुनर्परीक्षा में हो रही कमियों का पता ही न हो।
टेक्सटाइल मंत्री को अपने विभाग के काम से ज्यादा औवैसी को हिंदू बनाने में रुचि हो
और देशवासियों से ईंधन बचाने की अपील के अगले ही दिन प्रधानमंत्री सौ से अधिक गाड़ियों के साथ रोड शो कर रहे हों।
वाकई इतिहास में ये एक यादगार सरकार के तौर पर लिखी जायेगी।
“महंगाई बढ़ गई, हमारी आमदनी घट गई, मोदी सरकार बेकार है”
“मैं झोपड़ी तक नहीं खरीद सकता था, लेकिन कांग्रेस ने मुझे रहने के लिए घर दिया”
“मोदी जी को तो मैं बस बाय बाय कहना चाहता हूँ” 👋🏼👋🏼
सुनिए ऑटो वाले भैया के मन की बात👇
पहले दो मिनट इनको सुन लो… ‘आज तक’ पर बोल रहे हैं। ऊपर फ़ॉरवर्ड कर देना। विशेषज्ञों को ऐसे बोलने दिया गया तो @narendramodi सरकार के प्रति लोगों के मन में इज़्ज़त कम हो जाएगी…
"मुझे ब्लैकमेल कर मेरे साथ संबन्ध बनाए"
लड़की का इंतजाम करो या पत्नी को बुलाओ...
आत्महत्या से पहले युवक ने 8 पेज का लिखा सुसाइड नोट
गुरुग्राम के एक छोटे से कमरे में 17 मई की दोपहर जो हुआ, उसने सिर्फ एक परिवार नहीं तोड़ा, बल्कि कई ऐसे सवाल छोड़ दिए जिनका जवाब शायद सिस्टम के पास भी नहीं है। बिहार के बेगूसराय के रहने वाले 31 वर्षीय रामपुकार यादव ने फांसी लगाने से पहले 8 पेज का सुसाइड नोट लिखा। नोट के आखिर में उसने सिर्फ इतना लिखा — “सॉरी ऑल ऑफ यू…”
इन तीन शब्दों के पीछे वो दर्द छिपा था, जिसे वह करीब साढ़े तीन साल तक अंदर ही अंदर सहता रहा।
#रामपुकार गुरुग्राम की एक कंपनी में काम करता था। पत्नी और इकलौता बेटा गांव में रहते थे। वह यहां नौकरी करके परिवार का घर चला रहा था और गांव में नया मकान भी बनवा रहा था। परिवार को उम्मीद थी कि मेहनत करने वाला रामपुकार एक दिन सब कुछ ठीक कर देगा, लेकिन किसी को नहीं पता था कि वह रोज अंदर से टूट रहा है।
रामपुकार ने आत्महत्या से पहले 8 पेजों का सुसाइड नोट लिखा था रामपुकार ने अपने सुपरवाइजर #देवेंद्र कुमार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उसने लिखा कि पहले उसे शराब पिलाकर उसके साथ गलत संबंध बनाए गए, फिर लंबे समय तक ब्लैकमेल किया गया। उसने आरोप लगाया कि उससे पैसे मांगे गए, धमकियां दी गईं और मानसिक रूप से लगातार प्रताड़ित किया गया।
लेकिन सिर्फ ब्लैकमेलिंग ही नहीं रामपुकार को उसकी पहचान और गरीबी को लेकर भी अपमानित किया गया। सुसाइड नोट में उसने लिखा कि उसे “बिहारी” कहकर जलील किया जाता था। यहां तक कहा गया कि “हरियाणा में भैंस 1 लाख 30 हजार की मिलती है और बिहारन 80 हजार में बिकती हैं।”
रामपुकार ने अपने नोट में लिखा कि जब उसने विरोध किया तो उससे कहा गया कि “लड़की की व्यवस्था करो, नहीं तो गांव से अपनी पत्नी को बुला लो।” यही बात उसे अंदर से तोड़ गई। उसने अपने मैनेजर, एडमिन और HR तक से मदद मांगी, लेकिन हर जगह उसे सिर्फ समझौता करने की सलाह मिली।
घटना के बाद भी परिवार को इंसाफ की उम्मीद थी, लेकिन परिजनों का आरोप है कि 30 घंटे तक FIR तक दर्ज नहीं हुई। परिवार बार-बार पुलिस से कार्रवाई की मांग करता रहा, लेकिन उन्हें सिर्फ प्रक्रिया और इंतजार का जवाब मिलता रहा। आखिरकार मजबूरी में परिवार शव लेकर गांव लौट आया।
बुधवार को जब रामपुकार का शव बेगूसराय पहुंचा, तो गांव में मातम पसरा हुआ था। मां बेसुध थी, पत्नी बार-बार सिर्फ यही पूछ रही थी — “अगर उसने इतना कुछ लिखा था, तो किसी ने उसे बचाया क्यों नहीं?
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हिंदुओं का दावा है कि जातिवाद नस्लवाद क्षेत्रवाद है ही नहीं ख़त्म हो चुका है फिर ये क्या है
नासिक टीसीएस पर छाती पीटने वाले यहां चुप हैं
कांग्रेस और मुसलमानों के नाम पर रोज चूड़ियां तोड़ने वाले भी चुप है
मैं इसीलिए कहता हूं दोष जाति का नहीं है दोष है तो सिर्फ गरीबी का
पूरा परिवार उजड़ गया, पुलिस पैसे खाकर मस्त हो गई किसी को कोई फर्क नहीं
कड़वा सच-
अगर विश्व में जारी सबसे कठिन ग्लोबल आर्थिक संकट के बीच अगर दो बड़े देश के हेड मिलते हैं और खबर चॉक्लेट का आदान प्रदान तक ही सबसे बड़ी खबर बन कर रह जाए तो मीडिया के लिए आत्ममंथन का समय है!
NEETएग्जाम को लेकर एक बड़ी कार्रवाई तक नहीं हुई है अब तक ! एक दो छोटी मोटी छापेमारी गिरफ़्तारी टाइप होगी! वह भी तब तक जब तक मामला गरम! जो अरेस्ट होंगे वे सारे आगे साल होने वाले एग्जाम तक रिहा होंगे! और ताकतवर होकर निकलेंगे! सब कुछ इसी तरह से होता रहेगा!
और ऐसा होना हैरानी भरा नहीं है! उससे बड़ी हैरानी की बात है की ऐसी घटनाओं को डिफेंड भी किया जाता है! अगर-मगर-किन्तु-परन्तु कर!
उत्तरप्रदेश- उन्नाव के एक सरकारी स्कूल में टीचर नाजिया सुल्ताना (40) ने जहर खा लिया.
जहर खाने से पहले स्कूल में एक वीडियो बनाया और बताया- "शिक्षामित्र पुष्कर वाजपेई ने 8 महीने से मेरी जिंदगी दुश्वार कर रखी है. हम थक गये है पुष्कर वाजपेई से. यह खुदकशी नही मर्डर है. पुष्कर वाजपेई मेरा मर्डर कर रहे है."
नाजिया फिलहाल अस्पताल में भर्ती है.
आज महंगाई के आंकड़े डराने वाले हैं! एक महीने में जो अंदाज में बढ़ा! वह भी तब जब ऐसे आंकड़े पूरी तरह सही सूरत नहीं दिखते हैं!
इकॉनमी बहुत गंभीर स्टेज में जा चुकी है!
और हमारी गंभीरता देखें! 4 मई तक सब ठीक था! कहीं कोई स्थिति की गंभीरता को लेकर हलचल नहीं! और अचानक ऐसा पैनिक जिससे आमलोग और डर जाए!
लेकिन यहाँ भी मसला बस टालने का है! कुछ दिन पूर्व एक लोकप्रिय गायक ने कहा ही था-देश की जनता को देशभक्ति का दो लाइन सुनाकर आसानी से बहकाया जा सकता है!--
नाम नहीं लूंगा, आप लोग गूगल कर लेना।
ज्यादा पुरानी बात नहीं है-एक युवा राज्यसभा सांसद आम लोगों के मुद्दे उठाने के लिए जाने जाते थे। एयरपोर्ट पर समोसे की कीमत तक को लेकर फिक्रमंद रहते थे।
Gen Z जनता उनसे इंस्टाग्राम पर खूब जुड़ी हुई है।
लेकिन अभी NEET पेपर लीक, जो Gen Z का इतना बड़ा मुद्दा है, उस पर न जाने क्यों चुप हैं। पता नहीं क्या वजह है। उन्हें पता तो होगा ही कि पेपर लीक हो गया है।
इस बार NEET की परीक्षा के लिए केंद्रीय बलों के 2.4 लाख जवानों को तैनात करना चाहिए। सभी DG को परीक्षा केंद्र का प्रभारी बना देना चाहिए। चुनाव आयोग को निगरानी का काम दे देना चाहिए। शर्मनाक है कि एक परीक्षा नहीं करा सकते। मालूम नहीं चोरी से कितने लोग डॉक्टर बन कर अस्पतालों में काम कर रहे हैं और राष्ट्रवादी राजनीति के पीछे छुपे हुए हैं।
देश में धर्म और राष्ट्रवाद की राजनीति का तूफ़ान भी चल रहा है और लोग चोरी से डॉक्टर भी बन रहे हैं । यह कैसे हो सकता है।
मोदी जी ने कल जनता से त्याग मांगे - सोना मत ख़रीदो, विदेश मत जाओ, पेट्रोल कम जलाओ, खाद और खाने का तेल कम करो, मेट्रो में चलो, घर से काम करो।
ये उपदेश नहीं - ये नाकामी के सबूत हैं।
12 साल में देश को इस मुक़ाम पर ला दिया है कि जनता को बताना पड़ रहा है - क्या ख़रीदे, क्या न ख़रीदे, कहां जाए, कहां न जाए। हर बार ज़िम्मेदारी जनता पर डाल देते हैं ताकि ख़ुद जवाबदेही से बच निकलें।
देश चलाना अब Compromised PM के बस की बात नहीं।
पूर्व IAS अभिषेक सिंह ने बताया जब वो कानपुर देहात में पोस्टेड थे, तब उन्होंने बिना दुध के आर्टिफिसियल खोया बनाने वाले को जैसे ही गिरफ्तार किया तो वहां के मिनिस्टर का फोन आ गया।
उन्होंने कहा अभिषेक जी क्यों गरीब आदमी को परेशान कर रहे हो, यही तो मौका है त्यौहार के समय कमाने का, त्यौहार के समय ही तो ये बेचारे कुछ कमा पाते हैं..!