जंतर-मंतर पर चल रहे विरोध प्रदर्शन के बीच राहुल गांधी पहुंचते हैं!
लेकिन एक सवाल पूछना चाहता हूं…
यह लोकतंत्र की लड़ाई है या राहुल गांधी की राजनीतिक इमेज चमकाने का एक और मौका?
किसी विरोध प्रदर्शन के बीच पहुंचकर कैमरों के सामने दिखाई देने भर से कोई लोकतंत्र का रक्षक बन जाता है क्या?
यहीं पर हमे�� कुछ जरूरी सवालों पर गंभीरता से सोचना होगा।
पहली बात…
क्या राहुल गांधी या नेहरू परिवार, मोदी का असली विकल्प हो सकता है?
क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ मोदी को हटाकर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की नहीं है। यह लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई है। सत्ता को किसी एक व्यक्ति या परिवार के हाथों में केंद्रित होने से रोकने की लड़ाई है।
दूसरी बात…
क्या विपक्ष का अंतिम लक्ष्य सिर्फ मोदी की जगह राहुल गां���ी को प्रधानमंत्री बनाना है?
अगर ऐसा है, तो चेहरा बदल जाएगा, पार्टी बदल जाएगी। लेकिन सत्ता के केंद्रीकरण की राजनीति बदल जाएगी, इसकी क्या गारंटी है?
तीसरी बात…
अगर मोदी को हटाना है, तो बीजेपी और कांग्रेस से बाहर की राजनीतिक ताकतों को एकजुट होकर एक मजबूत तीसरा मोर्चा बनाने के बारे में भी सोचना चाहिए।
वरना मोदी के वर्चस्व की जगह किसी दूसर�� राजनीतिक वर्चस्व को देखना पड़ेगा।
और अगर सिर्फ एक वर्चस्व को हटाकर दूसरा वर्चस्व ही स्थापित करना है, तो फिर बदलाव का मतलब क्या रह जाएगा?
चौथी बात इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है।
राहुल गांधी के नेतृत्व वाले राजनीतिक विकल्प के साथ मुस्लिम लीग जैसी पार्टियां भी हैं।
यहां सवाल उठता है…
क्या बीजेपी की बहुसंख्यकवादी राजनीति के विकल्प के रूप में धर्म की पहचान पर आधारित दूसरी राजनीति को आगे ���ढ़ाने से वास्तव में धर्मनिरपेक्ष राजनीति मजबूत होगी?
मुस्लिम लीग को बीजेपी का मुस्लिम संस्करण कहना एक राजनीतिक आलोचना है। लेकिन सिर्फ इस तुलना से दोनों पार्टियों की विचारधारा और कामकाज एक जैसे साबित नहीं हो जाते।
इसी तरह असदुद्दीन ओवैसी की राजनीति को भी इस व्यापक विपक्षी विकल्प में शामिल करने पर सवाल उठते हैं।
अगर धार्मिक आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण और बढ़ता है, तो इसका ��ायदा बीजेपी की बहुसंख्यकवादी राजनीति को भी मिल सकता है। इस आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
तो फिर असली विकल्प क्या है?
मोदी की जगह राहुल गांधी?
एक राजनीतिक परिवार की जगह दूसरा नेतृत्व?
या फिर ऐसा लोकतांत्रिक विकल्प, जो धर्म और जाति के ध्रुवीकरण से ऊपर उठकर लोगों को एकजुट करे?
मेरी बात साफ है…
सिर्फ मोदी को हटाना लक्ष्य नहीं होना चाहिए। ऐसा लोकतंत्र बनाना लक्ष्य होना चाहिए, जहां स��्ता में बैठा कोई भी व्यक्ति खुद को सवालों से ऊपर न समझे।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण यह नहीं है कि कुर्सी पर कौन बैठा है…
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उस कुर्सी पर बैठे व्यक्ति से सवाल पूछने की ताकत जनता के पास है या नहीं!
@RahulGandhi @narendramodi @pinarayivijayan @cpimspeak @SFist
#jantarmantar #delhiprotest
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