Umr jalwo'n be basar ho, ye zuroori toh nahi
Har shab-e-gham ki sahar ho ye zuroori toh nahi
Neend to dard ke bistar pe bhi aa sakti hai
Teri aaghosh me sar ho ye zuroori toh nahi
मैं जो तनहा कभी चुपके से भी रोना चाहूँ
तो दिल के दरवाज़े की ज़ंजीर हिला देता है
उस की कुर्बत में है क्या बात न जाने “मोहसिन”
एक लम्हे के लिए सदियों को भुला देता है
ये ज़ुरूरी नहीं हर शख़्स मसीहा ही हो
प्यार के ज़ख़्म अमानत हैं दिखाया न करो
शहर-ए-एहसास में पथराव बहुत हैं 'मोहसिन'
दिल को शीशे के झरोखों में सजाया न करो