रांची के धुर्वा शालीमार बाज़ार में दातुन बेचने वाली महिला से भी 30 रुपये वसूले जाते हैं। ग़रीब महिलाएँ बमुश्किल सौ-डेढ़ सौ कमाती होंगी और उन्हें ज़मीन पर बैठने के सिर्फ़ 30-50 रुपये देने पड़ते हैं। ग्रामीण महिलाओं को छूट मिलनी चाहिए। नहीं तो धीरे-धीरे रांची के आसपास के सभी हाट-बाज़ार ख़त्म हो जाएंगे।
@DC_Ranchi@HemantSorenJMM
माननीय मुख्यमंत्री @HemantSorenJMM जी जे.एन .आर.सी रांची के संबंध में यह अफवाह उड़ रही है कि रजिस्ट्रेशन रिनिवल हेतु उन्होंने एक साइबर कैफे विशेष रूप से रखा हुआ है. आपको रिनिवल संबंधित सारा आवेदन उसी कैफे से करना है. ऐसा क्यों माननीय? आ���को इसपर विशेष संज्ञान लेना चाहिए.
हमारा देश कैंसर की राज���ानी बन रहा है और इस पूरे गंदे खेल के असली गॉडफादर हैं ,
भ्रष्ट नेता और बेशर्म अधिकारी, जो जनता की थाली में ज़हर डालने वालों के संरक्षण का ठेका उठाए बैठे हैं।
• Taller, Stronger, Sharper वाली चॉकलेट ड्रिंक में चीनी , एडिटिव्स , स्टेबलाइजर , बच्��ों को बीमार करो , कंपनी को मालामाल करो, और नेता–अफसर अपनी जेब भरें।
• केसर–इलायची वाले दानों का पूरा खेल सिंथेटिक फ्लेवर और फर्जी पैकेट का है—मिलावट माफिया कमाता है, और अफसर नजराना लेकर आंखें बंद कर लेते हैं।
• इंस्टेंट noodles की हेल्दी कहानी—असल में MSG, कलर्स, प्रिज़र्वेटिव का ज़हर। वॉर्निंग देने की जिम्मेदारी FSSAI की, पर वहाँ भी फाइलें पैसा देखकर ही चलती हैं।
• रेड चिली, हल्दी, मिक्स मसाला — सूडा�� डाई और इंडस्ट्रियल कलर्स; जनता खाए तो बीमारी, माफिया बेचे तो करोड़ों, और नेता–अफसर अपनी हिस्सेदारी में मुस्कुराएँ।
• Ready-to-eat snacks — ट्रांस-फैट से भरा जहर, पर कोई पूछने वाला नहीं, क्योंकि नियामक विभाग खुद सबसे बड़े दलाल की तरह काम करता है।
• Juices, biscuits, syrups — HFCS + केमिकल्स, पर जनता की जान से ज्यादा महत्वपूर्ण है नेताओं का फंडिंग मॉडल और अधिकारियों का महीने का कट।
• Paneer, ghee, sweets — डिटर्जेंट, यूरिया, सिंथेटिक फैट, और जिस FSSAI पर खाद्य सुरक्षा की जिम्मेदारी है, वो मिलावट माफिया की सुरक्षा कर रहा है।
ये कोई गलती नहीं >
ये पूरा सिस्टम बनाया ही इस तरह गया है कि जनता बीमार पड़े, अस्पताल कमाएँ, कंपनियाँ फूले–फले और राजनीति–ब्यूरोक्रेसी क�� पैसा मिलता रहे।
भारत का पूरा फूड चेन अब मौत का चेन बन चुका है।
हर फल–सब्ज़ी में मिलावट नहीं, सीधा ज़हर मिल रहा है।
लौकी में इंजेक्शन ठोंका जा रहा है ,
भिंडी पर जहरीले केमिकल उड़ेला जा रहा है ,
दूध–घी में यूरिया , डिटर्जेंट और सिंथेटिक फैट,
तेल में केमिकल ,
मिठाई में सड़े हुए घटक और रंग ,
पनीर पूरा नकली—बस दिखने में सफेद।
> टमाटर–सेब पर वैक्स ,
हरी सब्जियों पर पेस्टीसाइड की परतें,
हल्दी-मिर्च में ज़हरीला पाउडर ,
मसाले तक नकली।
आपका किचन अब ��सोई नहीं, केमिकल लैब बन चुका है।
> इस सबके बावजूद न कोई रेगुलेटर जाग रहा है, न कोई अधिकारी डर रहा है।
जांच एजेंसियाँ फाइलें दबाकर सोई हैं,
मिलावटखोर खुलेआम धंधा चला रहे हैं,
और आम जनता रोज़ धीमा ज़हर खा रही है।
> अब सवाल जनता का नहीं, सिस्टम का है👇
क्या खाएं?
किस पर भरोसा करें?
और शिकायत किससे करें, जब पूरे तंत्र ने मिलावटखोरों से हाथ मिला रखा है?
यह सिर्फ मिलावट नहीं—>
यह 1.4 अरब लोगों की सेहत , ब���्चों के भविष्य और पूरे देश की नसों में ज़हर भरने का संगठित अपराध है।
@dranuj_k गरीब मर ही रहे है . जब कैंसर रोगी को टार्गेट थेरेपी या इम्यूनोथेरेपी की जरूरत पड़ती है तब रोगी को कीमोथेरेपी देकर चंगा करने की कोशिश की जाती है.ताकि रोगी को लगते रहना चाहिए कि इलाज हो रहा है.