अलीगंज अग्निकांड मामले में नया खुलासा: विद्युत सुरक्षा निदेशालय के अधिकारियों ने शासन को गुमराह कर अपने अधीनस्थ अधिकारियों को लगातार बचाते हुए नजर आ रहे हैं, उनके बयान देखें तो वह कभी कहते हैं कि उपभोक्ता की एनओसी से संबंधित संबंधित हमारे पास कोई अभिलेख नहीं है, कभी कहते हैं कि एनओसी ही फर्जी है, जबकि संबंधित उपभोक्ता द्वारा अपने 20 किलोवाट कमर्शियल संयोजन की विद्युत सुरक्षा से निरीक्षण कराने के लिए विद्युत सुरक्षा निदेशालय विभाग के मद में भारतीय स्टेट बैंक के चालान के रूप में ट्रेजरी में रुपए 1150 की धनराशि 23 जून 2016 को जमा कराई गई थी, उपरोक्त चालान की राशि जमा होने के उपरांत विद्युत सुरक्षा निदेशालय का दायित्व होता है कि वह परिसर का निरीक्षण कर एनओसी जारी करें अब अगर विद्युत सुरक्षा निदेशालय द्वारा अगले दिन 24 जून 2016 को निरीक्षण कर एनओसी जारी की गई है तो फिर NOC फर्जी कहां से हुई और अगर NOC फर्जी है तो फिर चालान जमा होने के बाद परिसर का निरीक्षण किस अधिकारी ने किया और उस निरीक्षण के बाद NOC निर्गत क्यों नहीं की गई, जबकि शासन का नियम है कि यदि चालान फीस जमा होने के 7 दिन के अंदर एनओसी प्राप्त नहीं होती है तो ऊर्जा निगम के अभियंता विद्युत संयोजन को ऊर्जीकृत कर सकते हैं।
यदि किसी परिसर में विद्युत सुरक्षा मानकों का अनुप��लन नहीं किया गया, विद्युत सुरक्षा ऑडिट नहीं हुआ, संबंधित विभाग द्वारा समय-समय पर निरीक्षण नहीं किया गया, तो इन गंभीर लापरवाही की जिम्मेदारी निर्धारित कर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए थी। लेकिन विद्युत सुरक्षा निदेशालय लगातार अपने लापरवाह अधिकारियों को बचा रहा है, पहले जून 2016 फिर उसके बाद हर 3 साल अर्थात सन 2019, 2022, 2026 में परिसर का विद्युत सुरक्षा निदेशालय के अधिकारी द्वारा विद्युत निरीक्षण करना चाहिए था लेकिन किसी ने निरीक्षण नहीं किया उनकी इस लापरवाही के कारण 15 निर्दोष बच्चों की जान चली गई, जो की अत्यंत दुखद एवं पीड़ादायक है इस दुखद घटना के बाद लगातार विद्युत सुरक्षा निदेशालय अपने 04 लापरवाह अधिकारियों को बचाने में लगा है और अभी तक किसी भी अधिकारी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
जबकि दूसरी ओर ऊर्जा निगम के अधिशासी अभियंता को आनन-फानन में बिना किसी जांच के रात 12:00 बजे एमडी कार्यालय खुलवाकर निलंबन आदेश जारी किया गया।
अधिशाषी अभियंता के निलंबन आदेश में यह आरोप लगाया गया है कि संबंधित परिसर में स्वीकृत भार (लोड) से अधिक विद्युत भार लगभग तीन माह से संचालित हो रहा था, जिस पर अधिशासी अभियंता द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई। यह आरोप बिल्कुल निराधार एवं तथ्यों से परे है क्यों कि उपभोक्ता के संयोजन की अधिकतम डिमांड माह अप्रैल 2026 में 24.30 किलोवाट, मई में 28.66 किलोवाट तथा अभी इसी माह जून 2026 में 34.18 किलोवाट आई है। नियमानुसार तीन माह अनुबंधित भार से अधिक भार प्रयोग करने की दशा में अगले माह जुलाई 2026 में उपभोक्ता को भार वृद्वि हेतु नोटिस दिया जाना न्यायसंगत था, क्योंकि जून की बढ़ी हुई डिमांड जुलाई के मास्टर डेटा में प्रदर्शित होती है। जुलाई माह में प्राप्त डेटा के अनुसार ही अधिशासी अभियंता द्वारा अपने स्तर से भार वृद्धि की कार्यवाही की जा सकती है। जुलाई माह से पूर्व बढ़ी हुई डिमांड के आ��ार पर अधिशाषी अभियंता को निलंबित करना सरासर गलत एवं अवैधानिक है।
अतः उपरोक्त बेहद गंभीर मामले में माननीय मुख्यमंत्री श्री @myogiadityanath जी से निवेदन है कि विद्युत सुरक्षा निदेशालय की लापरवाही को नजरअंदाज कर ऊर्जा निगम के निर्दोष अधिशाषी अभियंता का किया गया अन्यायपूर्ण निलंबन आदेश को निरस्त किया जाये तथा विद्युत सुरक्षा निदेशालय के लापरवाह अधिकारियों पर कठोर से कठोर कार्रवाई की जाए।
~इं• ज��तेंद्र सिंह गुर्जर
महासचिव उ• प्र• राज्य विद्युत परिषद अभियंता संघ
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विद्युत अभियंता संघ में 12 अप्रैल को लखनऊ में बुलाई केंद्रीय कार्यकारिणी की बैठक :मार्च 2023 के आंदोलन व निजीकरण के विरोध में जारी आंदोलन के फलस्वरुप की समस्त उत्पीड़नात्मक कार्यवाहियों के विरोध में होगा निर्णायक संघर्ष का ऐलान:
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निजीकरण के दस्तावेज को अनुमोदित कराने हेतु पॉवर कॉरपोरेशन प्रबन्धन पर गलत आंकड़ों के आधार पर पैरवी का आरोप : निजीकरण के विरोध में प्रान्त व्यापी वि���ोध प्रदर्शन जारी
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने आरोप लगाया है कि निजीकरण हेतु तैयार किए गए आरएफपी डॉक्यूमेंट को अनुमोदित कराने हेतु पावर कार्पोरेशन प्रबंधन गलत आंकड़ों के आधार पर पैरवी कर रहा है और दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। निजीकरण के विरोध में चल रहे आंदोलन के 304 वें दिन आज बिजली कर्मियों ने सभी जनपदो पर व्यापक विरोध प्रदर्शन जारी रखा।
विद्युत कर्मचा��ी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के केंद्रीय पदाधिकारियों ने आरोप लगाया है कि पावर कॉरपोरेशन के अध्यक्ष डॉक्टर आशीष गोयल पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम एवं दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण हेतु ट्रांजैक्शन कंसल्टेंट द्वारा तैयार किए गए आरएफपी डॉक्यूमेंट को अनुमोदित कराने के लिए नियामक आयोग से लेकर शासन के उच्च स्तर तक दौड़ लगा रहे हैं। पावर कारपोरेशन के अध्यक्ष मुख्य सचिव के पास जाकर गलत आंकड़ों के आधार पर घाटा दिखाकर पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम एवं दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण की पैरवी कर रहे हैं ।
संघर्ष समिति ने मुख्य सचिव से अपील की है कि वह निजी घरानों से मिली भगत में बनाए गए निजीकरण के आरएफपी डॉक्यूमेंट को किसी भी प्रकार मंजूरी न दें। संघर्ष समिति ने विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष को भी पत्र भेजकर मांग की है कि निजीकरण के आरएफपी डॉक्यूमेंट को कोई भी मंजूरी देने के पहले विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति का पक्ष विद्युत नियामक आयोग को सुनना चाहिए क्योंकि निजीकरण से बिजली उपभोक्ताओं के साथ सबसे अधिक प्रभाव बिजली कर्मचारियों के भविष्य पर पड़ने वाला है।
संघर्ष समिति ने कहा कि पावर कार्पोरेशन प्रबंधन की निजी घरानों के साथ मिली भगत है और उन्होंने सरकारी विभागों के बकाया और सब्सिडी की धनराशि को घाटे में जोड़कर पूर्���ांचल विद्युत वितरण निगम एवं दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के घाटे को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया है। संघर्ष समिति ने कहा कि इसके अतिरिक्त दोनों विद्युत वितरण निगमों की एक ए टी एंड सी हानियां बढ़ा चढ़ा कर दिखाइ गई हैं।
यह पता चला है कि ए टी एंड सी हानियों को बढ़ाकर दिखाने के लिये ग्रामीण क्षेत्रों में निजी नलकूपों की बिजली खपत कम करके आंकी जा रही है। उल्लेखनीय है कि निजी नलकूपों को उत्तर प्रदेश ���रकार की नीति के अनुसार मुफ्त बिजली मिलती है। ए टी एंड सी हानियों को बढ़ा कर दिखाने से गत वर्ष की तुलना में विद्युत वितरण निगमों की अधिक हानि दिखाई गई है। उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश सरकार लगातार इस बात का प्रचार करती रही है कि 2017 में 41% ए टी और सी हानियों को वर्तमान सरकार ने घटाकर 16% के नीचे कर दिया है। अब निजीकरण के लिए इसके विपरीत ए टी एंड सी हानियों को बढ़ाकर बताया जा रहा है जिससे चुनिंदा निज�� घरानों को लाभ दिया जा सके ।
संघर्ष समिति ने आरोप लगाया कि आगरा और कानपुर के निजीकरण के समय भी आगरा और कानपुर शहर की ए टी एंड सी हानियों को बढ़ाकर दिखाया गया था। आगरा के विषय में कैग की रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया गया है और निजी कम्पनी को बेजा लाभ देने का आरोप लगाया गया है । इसके बावजूद आगरा का फ्रेंचाइजी करार रद्द करने के लिए पॉवर कार्पोरेशन प्रबंधन ने आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
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बिजली व्यवस्था में अप्रत्याशित सुधार के दृष्टिगत बिजली के निजीकरण निरस्त करने की मांग:बिजली के निजीकरण के विरोध में प्रदेश भर में ध्यानाकर्षण कार्यक्रम जारी:
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने आज यहां कहा कि कल दिल्ली में केंद्रीय ऊर्जा मंत्री जी की अध्यक्षता में आयोजित ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स की बैठक में उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था में हुए अप्रत्याशित सुधार की चर्चा की गई । मीटिंग में बिजली की तकनीकी और वाणिज्यिक हानि में निरंतर कमी की सराहना की गयी है जिसकी पुष्टि प्रदेश के ऊर्जा मंत्री मा अरविन्द कुमार शर्मा जी द्वारा सोशल मीडिया के माध्यम से स्वयं की गई है।
संघर्ष समिति ने प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से मांग की है कि जब सार्वजनिक क्षेत्र में रहते हुए एटीएंडसी हानियों में काफी गुणात्मक कमी हुई है और प्रदेश में पूर्व में हुए आगरा और ग्रेटर नोएडा का निजीकरण का प्रयोग विफल हो गया है तथा निजीकरण में हुए घोटाले व देश में अन्य जगहों पर निजीकरण के विफल प्रयोग को देखते हुए पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण की प्रक्रिया तत्काल निरस्त की जानी चाहिए।
संघर्ष समिति ने कहा कि पावर कॉरपोरेशन कथित घाटे का हवाला देते हुए पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण की दलील दे रहा है।
संघर्ष समिति ने कहा कि पावर कारपोरेशन क�� प्रबंधन घाटे को लेकर इतना संवेदनशील है तो उसे सबसे पहले आगरा का फ्रेंचाइजी करार तत्काल रद्द कर देना चाहिए,जिसके चलते पावर कारपोरेशन को प्रति वर्ष 1000 करोड रुपए का नुकसान हो रहा है । संघर्ष समिति ने कहा कि ए टी एंड डी हानियां के गलत आंकड़ों के कारण से टोरेंट पावर क�� बहुत सस्ती दरों पर पॉवर कॉरपोरेशन बिजली दे रहा जिससे विगत 14 वर्षों में 3432 करोड रुपए की हानि हो चुकी है।
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के केंद्रीय पदाधिकारियों ने बताया कि काम करने के बावजूद बिजली कर्मचारियों को लगातार तीन माह तक वेतन नहीं दिया जाना यह बहुत ही गंभीर उत्पीड़नात्मक कार्यवाही है और पूरी तरह अमानवीय है। संविदा कर्मियों को बड़े पैमाने पर हटाए जाने से ���िभिन्न जनपदों में प्रदेश की बिजली व्यवस्था पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।निजीकरण किये जाने हेतु बिजली कर्मचारियों पर बड़े पैमाने पर की गई उत्पीड़नात्मक कार्यवाहियों के वापस न लिये जाने से बिजली कर्मियों में भारी गुस्सा व्याप्त है।
पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण के विरोध में आज लगातार 293 वें दिन बिजली कर्मियों ने प्रदेश भर में समस्त जनपदों पर व्यापक विरोध प्रदर्शन किया और संकल्प व्यक्त किया कि जब तक निजीकरण का फैसला निरस्त नहीं किया जाता और समस्त उत्पीड़नात्मक कार्यवाहियां वापस नहीं ली जाती तब तक बिजली कर्मी लगातार आंदोलन जारी रखेंगे।
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निजीकरण की प्रक्रिया पर संघर्ष समिति ने उठाये सवाल : बिडिंग डॉक्यूमेंट के अनुसार निजीकरण के बाद सरकार निजी घरानों को आर्थिक सहयोग देती रहेगी तो जनता पर यह भार क्यों डाला जा रहा है:
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम एवं दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण की सारी प्रक्रिया पर सवाल उठाया है। संघर्ष समिति ने कहा है कि स्टैण्डर्ड बिडिंग डॉक्यूमेंट के अनुसार निजीकरण के बाद भी सरकार निजी घरानों को आर्थिक सहयोग देती रहेगी तो निजीकरण से क्या लाभ होने जा रहा है ?
संघर्ष समिति ने एक बार पुनः प्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय योगी आदित्यनाथ जी से अपील की है कि तमाम घोटालों से भरे निजीकरण की सारी प्रक्रिया बहुत ही संदेहास्पद है। अतः वे प्रभावी हस्तक्षेप कर निजीकरण को निरस्त करने की कृपा करें।
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के केन्द्रीय पदाधिकारियों ने आज यहां बताया कि भारत सरकार के विद्युत मंत्रालय द्वारा सितंबर 2020 में जारी ड्राफ्ट स्टैंडर्ड बिडिंग डॉक्यूमेंट की धारा 2.2 (बी) में लिखा है कि जिस विद्युत वितरण निगम का निजीकरण किया जा रहा है अगर वहां औसत बिजली विक्रय मूल्य और औसत राजस्व वसूली में अधिक अन्तर है तो निजीकरण के बाद सरकार निजी विद्युत कम्पनी को सब्सिडाइज्ड रेट पर बिजली आपूर्ति तब तक सुनिश्चित करेगी जब तक निजी कम्पनी मुनाफे में नहीं आ जाती।
संघर्ष समिति ने कहा क�� बिडिंग डॉक्यूमेंट की उक्त धारा के अनुसार सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि निजी कम्पनी को सब्सिडाइज्ड रेट पर सरकार कितने वर्ष बिजली आपूर्ति कराएगी और इस हेतु सरकार को कितने अरब रुपए की धनराशि खर्च करनी पड़ेगी।
संघर्ष समिति ने कहा कि ��त्तर प्रदेश के सरकारी विद्युत वितरण निगमों के घाटे का सबसे बड़ा कारण बहुत महंगी दरों पर निजी विद्युत उत्पादन घरों से बिजली खरीद के करार है। ऐसे बिजली क्रय करार भी हैं जिनसे बिना बिजली खरीदे प्रति वर्ष 6761 करोड रुपए फिक्स चार्ज देना पड़ रहा है।
संघर्ष समिति ने कहा कि निजीकरण के ड्राफ्ट स्टैंडर्ड बिडिंग डॉक्यूमेंट के अनुसार सरकार निजीकरण के बाद निजी घरानों को महंगे पावर परचेज एग्रीमेंट के एवज में सब्सिडाइज्ड बल्क पावर सप्लाई करेगी और इसका खर्चा सरकार उठायेगी। संघर्ष समिति ने कहा कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि सब्सिडाइज्ड बल्क सप्लाई का प्रतिवर्ष कितना खर्चा आएगा और यह कितने वर्ष तक जारी रखा जाएगा ।
संघर्ष समिति ने कहा कि इसके अलावा स्टैंडर्ड बिडिंग डॉक्यूमेंट की धारा 1.1 (ई) के अनुसार निजी कंपनियों को क्लीन बैलेंस शीट दी जाएगी और घाटे तथा देनदारियों का सारा उत्त��दायित्व भी सरकार का होगा ।
संघर्ष समिति ने कहा कि बिडिंग डॉक्यूमेंट की धारा 1.1 (एफ) के अनुसार सरकार 05 से 07 वर्ष तक या और अधिक समय तक निजी घरानों को वित्तीय सहायता भी सरकार देगी और यह सहायता तब तक देती रहेगी जब तक निजी कंपनियां आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न हो जाए और मुनाफा न कमाने लगे।
संघर्ष समिति ने कहा कि बिडिंग डॉक्यूमेंट के अनुसार 42 जनपदों की सारी जमीन मात्र ₹1 प्रतिवर्ष की लीज पर दी जाएगी। वाराणसी, आगरा, गोरखपुर, प्रयागराज, कानपुर और अन्य स्थानों पर जिनका निजीकरण किया जा रहा है जमीन बेशक कीमती है उसे मात्र 01रुपए की लीज पर दिए दिया जाना कौन सा रिफॉर्म है ?
संघर्ष समिति ने कहा कि यदि यही सब करना है तो सरकारी क्षेत्र के विद्युत वितरण निगमों को लगातार सुधार के बाद कौड़ियों के मोल बेचने की जरूरत क्या है ?
बिजली के निजीकरण के विरोध में चल रहे आंदोलन के 272 दिन पूरे हो जाने पर आज भ�� समस्त जनपदों और परियोजनाओं पर बिजली कर्मियों ने जोरदार विरोध प्रदर्शन जारी रखा।
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निजीकरण से 76500 बिजली कर्मियों की नौकरी खतरे में: निजीकरण के विरोध में निर्णायक संघर्ष की तैयारी : सेवा करेंगे और हक भी लेंगे - संघर्ष समिति
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने कहा है कि यदि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम का निजीकरण किया गया तो लगभग 76500 सरकारी कर्मचारियों की नौकरी पर खतरा मंडराने लगेगा। आज निजीकरण के विरोध में चल रहे आंदोलन के 267 वें दिन बिजली कर्मियों ने निजीकरण रोकने के लिये निर्णायक संघर्ष का संकल्प लिया।
संघर्ष समिति ने कहा कि बिजली की बढ़ी हुई मांग को देखते हुए बिजली कर्मी आंदोलन के साथ-साथ उपभोक्ताओं की समस्याओं को भी सर्वोच्च प्राथमिकता पर अटेंड कर रहे हैं । संघर्ष समिति ने कहा कि उनका नारा है - सेवा करेंगे और हक ���ी लेंगे।
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के केंद्रीय पदाधिकारियों ने बताया कि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम में लगभग 17500 और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम में लगभग 10500 नियमित कर्मचारी कार्य कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त इन दोनों विद्युत वितरण निगमों में लगभग 50 हजार संविदा कर्मी काम कर रहे हैं।
संघर्ष समिति ने कहा कि पावर कारपोरेशन के अध्यक्ष द्वारा निजीकरण के बाद बि��ली कर्मियों को तीन विकल्प दिए गए हैं। पहला विकल्प यह है कि वे निजी कंपनी की नौकरी स्वीकार कर लें। दूसरा विकल्प यह है कि वे अन्य विद्युत वितरण निगम���ं में वापस आ जाए और तीसरा विकल्प यह है कि वे स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति लेकर घर चले जाएं। संघर्ष समिति ने कहा कि ऐसे बिजली कर्मी बहुत बड़ी संख्या में हैं जो निजी कंपनियों की नौकरी छोड़कर पावर कारपोरेशन में सरकारी नौकरी करने आए थे। अब कई कई साल की नौकरी के बाद उनसे यह कहना कि वे फिर निजी कंपनी में चल जाए यह पूरी तरह अन्यायपूर्ण है और बिजली कर्मचारियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
दूसरे विकल्प ���े रूप में यदि बिजली कर्मी अन्य विद्युत वितरण निगमों में वापस आते हैं तो वे सरप्लस हो जाएंगे और उनकी छटनी की नौबत आ जाएगी। इतना ही नहीं तो पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम से अन्य विद्युत वितरण निगमों में आने वाली बिजली कर्मी नियमानुसार वरिष्ठता क्रम में 2025 बैच के नीचे अर्थात सबसे नीचे रखे जाएंगे। स्वाभाविक है कि सरप्लस होने पर सबसे पहले इन बिजली कर्मियों की ही छटनी होगी।
संघर्ष समिति ने दिल्ली का उदाहरण देते हुए बताया कि वर्ष 2002 में निजीकरण के बाद दिल्ली के विद्युत वितरण निगमों में कुल 18097 बिजली कर्मी कार्यरत थे। निजीकरण के एक वर्ष के अंदर-अंदर निजी घरानों के उत्पीड़न से तंग आकर 8190 बिजली कर्मियों ने सेवानिवृत्ति ले ली। इस प्रकार दिल्ली में निजीकरण के एक साल के अंदर ही अंदर-अंदर 45% बिजली कर्मी सेवानिवृत्ति लेकर घर चले गए। तब बिजली कर्मचारियों को पेंशन मिलती थी। अब ���ूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम में कार्यरत 90% बिजली कर्मचारियों को पेंशन नहीं मिलती वे सेवा निवृत्ति लेकर कहां जाएंगे ?
हाल ही में 1 फरवरी 2025 को चंडीगढ़ विद्युत विभाग का निजीकरण किया गया। निजीकरण जिस दिन किया गया उसी दिन लगभग 40% बिजली कर्मी सेवा निवृत्ति लेकर घर चले। चंडीगढ़ में बिजली कर्मचारियों की यूनियन और सरकार के बीच 1 फरवरी की रात जो समझौता हुआ था आज तक उसे लिखकर नहीं दिया गया है। और निजी कंपनी यह कह रही है कि यह समझौता सरकार ने किया था हमें इससे कोई मतलब नहीं है। निजीकरण की यही भयावह कहानी अब उत्तर प्रदेश में दोहराई जा रही है जिसे बिजली कर्मी कदापि स्वीकार नहीं करेंगे।
निजीकरण के विरोध में चल रहे आंदोलन के 267 वें दिन आज बिजली कर्मचारियों ने प्रदेश के समस्त जनपदों और परियोजनाओं पर व्यापक विरोध प्रदर्शन कर निजीकरण के विरोध में निर्णायक संघर्ष का संकल्प लिया। बिजली कर्मियों ने कहा कि निजीकरण बिजली कर्मचारियों और उनके परिवार के लिए अंधेरे का संदेश लेकर आ रहा है। बिजली कर्मियों ने कहा कि वे किसी कीमत पर निजीकरण स्वीकार नहीं करेंगे और यह संघर्ष तब तक चलता रहेगा जब तक निजीकरण का फैसला वापस नहीं लिया जाता।
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निजीकरण का टेण्डर होने पर अनिश्चितकालीन कार्य बहिष्कार और सामूहिक जेल भरो आंदोलन का संघर्ष समिति ने जारी किया एलर्�� : निजीकरण के आर.एफ.पी. डाक्यूमेंट पर कोई निर्णय लेने के पहले संघर्ष समिति से बात की जाए- विद्युत नियामक आयोग को पत्र भेजकर संघर्ष समिति ने की मांग।
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उ.प्र. ने विद्युत नियामक आयोग के चेयरमैन को पत्र भेजकर मांग की है कि पॉवर कार्पोरेशन प्रबंधन द्वारा तैयार किये गए निजीकरण के आर.एफ.पी. डाक्यूमेंट को विद्युत नियामक आयोग कोई मंजूरी न दे और इस मामले में सं���र्ष समिति को अपना पक्ष रख���े हेतु विद्युत नियामक आयोग वार्ता हेतु समय दें। संघर्ष समिति ने निजीकरण की गतिविधियां तेज होते देख बिजली कर्मचारियों को सचेत करते हुए एलर्ट जारी किया है कि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण का टेण्डर होने के बाद अनिश्चितकालीन कार्य बहिष्कार और सामूहिक जेल भरो आंदोलन की तैयारी रखी जाय।
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उ.प्र. के केंद्रीय पदाधिकारियों ने बताया कि निजीकरण होने के बाद बिजली कर्मचारियों का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा अतः निजीकरण के आर.एफ.पी. डाक्यूमेंट पर कोई भी अभिमत देने के पहले विद्युत नियामक आयोग को संघर्ष समिति से वार्ता करनी चाहिए। संघर्ष समिति ने इस बावत नियामक आयोग के चेयरमैन को पत्र भेजकर वार्ता का समय मांगा है। संघर्ष समिति का कहना है कि निजीकरण के बाद लगभग 50 हजार संविदा कर्मियों की छटनी हो जायेगी और लगभग 16 हजार 500 नियमित कर्मचारियों की नौकरी खतरे में पड़ जायेगी। कॉमन केडर के अभियंताओं और जूनियर इंजीनियरों पर नौकरी जाने और पदावनति का खतरा उत्पन्न होगा। ऐसी स्थिति में निजीकरण से सबसे अधिक दुष्प्रभाव बिजली कर्मियों पर पड़ने जा रहा है अतः बिना बिजली कर्मियों का पक्ष सुने नियामक आयोग को कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए अपितु सीधे सीघे पॉवर कार्पोरेशन द्वारा भेजे गये आर.एफ.पी. डाक्यूमेंट को निरस्�� कर देना चाहिए।
संघर्ष समिति के केंद्रीय पदाधिकारियों की आज लखनऊ में हुई बैठक में पॉवर कार्पोरेशन प्रबंधन द्वारा जोर जबरदस्ती से निजीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ाये जाने के घटनाक्रमों पर गंभीर चिंता व्यक्त की गयी। संघर्ष समिति ने प्रदेश के सभी बिजली कर्मियों, संविदा कर्मियों, जूनियर इंजीनियरों और अभियंताओं को एलर्ट जारी करते हुए आह्वान किया है कि यदि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण का टेण्डर किया जाता है तो बिजली कर्मी अनिश्चितकालीन कार्य बहिष्कार और सामूहिक जेल भरो आंदोलन के लिये तैयार रहें।
संघर्ष समिति ने क���ा कि पूर्व निदेशक वित्त श्री निधि नारंग द्वारा अवैध ढंग से नियुक्त किये गए ट्रांजैक्शन कंसल्टेन्ट ग्रांट थार्टन के साथ मिलीभगत कर आ.एफ.पी. डाक्यूमेंट कुछ निजी घरानों की मदद करने के लिए बनाया गया था। उ.प्र. शासन ने संभवतः इन्ही बातों को देखते हुए श्री निधि नारंग को सेवा विस्तार देने से मना कर दिया और अब नए निदेशक वित्त श्री संजय मेहरोत्रा बन गये हैं। अतः श्री निधि नारंग द्वारा तैयार किये गए निजीकरण के दस्तावेज को वैसे ही निरस्त कर देना चाहिए।
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*विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश*
प्रेस विज्ञप्ति 13 अगस्त 2015
*विकसित उत्तर प्रदेश के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में पावर सेक्टर बनाये रखना जरूरी : योगी सरकार में लगातार सुधार के बावजूद निजीकरण क्यों ?: निजीकरण का निर्णय रद्द करने की मांग को लेकर 14 अगस्त को तिरंगा रैली*
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने कहा है कि जब उत्तर प्रदेश की विधानसभा में विकसित भारत और विकसित उत्तर प्रदेश के विजन 2047 पर 24 घंटे की ऐतिहासिक चर्चा हो रही है तब यह बताना जरूरी है कि विकसित उत्तर प्रदेश के विजन के लिये पॉवर सेक्टर को सार्वजनिक क्षेत्र में बनाये रखना जरूरी है। संघर्ष समिति ने कहा कि योगी सरकार के विगत 08 साल के कार्यकाल के दौरान प्रदेश की बिजली व्यवस्था में लगातार सुधार हो रह��� है ऐसे में निजीकरण का प्रस्ताव लाकर बिजली व्यवस्था पटरी से उतारने की कोशिश पर तुरन्त विराम लगना चाहिये ।
संघर्ष समिति ने कहा कि निजीकरण के विरोध में 08 अगस्त से 15 अगस्त तक तिरंगा लेकर अभियान चलाने के संघर्ष समिति के कार्यक्रम के क्रम में 14 अगस्त को सभी जनपदों और परियोजनाओं पर बिजली कर्मी तिरंगा रैली निकालेंगे और तिरंगा लेकर निजीकरण के विरोध में सभा करेंगे।
विद्युत कर्मचारी संयुक्त ��ंघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के केंद्रीय पदाधिकारियों ने कहा कि प्रदेश के ऊर्जा मंत्री माननीय श्री अरविंद कुमार शर्मा ने विधान सभा में कहा कि बिजली व्यवस्था में लगातार सुधार हो रहा है और हम 24 घंटे गुणवत्ता परक विद्युत आपूर्ति करने की स्थिति में आ गये हैं। यह सही भी है। योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के समय बिजली की ए टी एंड सी हानियां 42 प्रतिशत थीं जो आज राष्ट्रीय मानक 15% पर आ गई है। उप्र ने देश में सर्वाधिक विद्युत आपूर्ति का नया कीर्तिमान मई 2025 में बनाया है। पहले सर्वाधिक विद्युत आपूर्ति का कीर्तिमान महाराष्ट्र के पास रहता था। उत्तर प्रदेश में बिजली के 03 करोड़ 63 लाख उपभोक्ता है जो देश में किसी भी एक प्रदेश में सर्वाधिक हैं।
संघर्ष समिति ने कहा कि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम एवं दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के 42 जनपदों में प्रदेश की सबसे गरीब जनता रहती है। पूर्वांचल में गरीबी है ही तो बुंदेलखंड में पीने का पानी जमीन की सतह के बहुत नीचे है जिसे ऊपर लाने के लिए बिजली की आवश्यकता होती है। जब विकसित भारत और विकसित उत्तर प्रदेश 2047 के विजन की चर्चा हो रही है तो पूर्वांचल और दक्षिणांचल की गरीब जनता पर बिजली क�� निजीकरण थोपने का क्या औचित्य है ? विकसित उत्तर प्रदेश 2047 के लिए सस्ती बिजली सबसे अधिक जरूरी है जो सार्वजनिक क्षेत्र में ही सम्भव है ।
संघर्ष समिति ने कहा कि निजीकरण के पीछे मेगा स्कैम है। पॉवर कारपोरेशन के अध्यक्ष और निदेशक वित्त निधि नारंग की निजी घरानों के साथ मिलीभगत है। पावर कॉरपोरेशन के अध्यक्ष आशीष गोयल ने नवंबर 2024 में लखनऊ में हुई एक मीटिंग में ऑल इंडिया डिस्कॉम एसोशिएशन बना लिय�� और उसके महामंत्री बन गए हैं। आल इंडिया डिस्कॉम एसोशिएशन में देश के सभी बड़े कारपोरेट घराने शामिल है और इसका मुख्य उद्देश्य बिजली का निजीकरण है। उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन के अध्यक्ष विगत आठ महीने से डिस्कॉम एसोशिएशन के महामंत्री के रूप में काम कर रहे हैं। अब जब निदेशक वित्त निधि नारंग का कार्यकाल बढ़ाने का प्रस्ताव उप्र सरकार ने अस्वीकृत कर दिया है तब विकसित उत्तर प्रदेश विजन 2047 के लिए ��रूरी है कि इन लोगों के द्वारा तैयार किया गया निजीकरण का दस्तावेज तत्काल रद्द किया जाय ।
संघर्ष समिति के आह्वान पर आज लगातार 259 वें दिन प्रदेश भर में बिजली कर्मियों ने निजीकरण के विरोध में सभा और प्रदर्शन जारी रखा। 14 अगस्त को सभी जनपदों और परियोजनाओं पर निजीकरण के विरोध में तिरंगा रैली और सभा की जाएगी।
राजधानी लखनऊ में 14 अगस्त को सायं 04 बजे हाइडिल फील्ड हॉस्टल पर सभा होगी। लखनऊ के समस्त क��र्यायलयों के बिजली कर्मी अपने-अपने कार्यालय से तिरंगा यात्रा लेकर फील्ड हॉस्टल पहुंचेंगे।
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आज पहली बार शिकायत के स्थान पर बिजली विभाग के कर्मचारियों की सरा���ना कर पाना ख़ुद में मुझे गर्वान्वित कर रहा है । दोनों अधिकारियो व इनकी टीम को धन्यवाद द्वारा सेक्टर 130 के निवासियों की तरफ़ से । @mduppcl @UPPCLLKO @pvvnlgbnagar @MdPvvnl @CMOfficeUP @EMofficeUP
23 मई 2025 को पावर कॉरपोरेशन प्रबन्धन व उ.प्र.पावर कॉरपोरेशन निविदा/संविदा कर्मचारी संघ लखनऊ के बीच हुए समझौते का पालन न करने के कारण बिजली आउटसोर्स कर्मचारियों द्वारा अधीक्षण अभियन्ता सीतापुर कार्यालय पर सत्याग्रह शुरू किया गया।
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