नित जीवन के संघर्षो से,
जब टूट चूका हो अंतर मन।
तब सुख के मिले समंदर का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
जब फसल सूख कर जल के बिन,
तिनका तिनका बन गिर जाये।
फिर होने वाली वर्षा का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
सम्बन्ध कोई भी हो लेकिन,
यदि दुःख में साथ न दे अपना।
फिर सुख के उन संबंधों का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
छोटी छोटी खुशियों के क्षण,
निकले जाते हैं रोज जहाँ।
फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
मन कटु वाणी से आहात हो,
भीतर तक छलनी हो जाये।
फिर बाद कहे प्रिय वचनो का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
सुख साधन चाहे जितने हों,
पर काया रोगों का घर हो।
फिर उन अगनित सुविधाओ का,
रह जाता कोई अर्थ नहीं।
- दिनकर
@mamidala90 एक तो आपसे आग्रह रहेगा सर, की यूजीसी-नेट के सवालों का हिन्दी अनुवाद किसी अच्छे अनुवादक से करायें और हिन्दी संस्करण के प्रश्नों की प्रूफ रीडिंग भी कराइए। अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद बेहद कमजोर और अर्थ का अनर्थ करने वाला है जिससे हिन्दी भाषी छात्रों को पेपर में पास होना मुश्किल है।