कई बार लिखना चाहा…रुक गई. आज नहीं रुकूंगी.
UPSC का result आया है. हर तरफ बधाइयाँ हैं, toppers के interviews हैं, success stories हैं. ये सब होना चाहिए…जिन्होंने सालों की मेहनत के बाद ये मुकाम पाया है, उन्हें सच में दिल से मुबारक..
लेकिन आज मुझे कुछ और भी कहना है.
कुछ जो मैंने कई बार लिखना चाहा. हर बार रुक गई. सोचा लोग offend हो जाएंगे, लोग कहेंगे ये UPSC के खिलाफ है. इसे खुद निकालना नहीं आया तो आलोचना कर रही है.
लेकिन ये post UPSC के खिलाफ नहीं है. ये उस सोच के बारे में है जो हमने UPSC के इर्द-गिर्द बना ली है।
हमने UPSC को हौसला नहीं, हौवा बना दिया है.कब हुआ यह? किसने तय किया पता नहीं लेकिन धीरे-धीरे हमारे घरों में, हमारे समाज में, हमारी conversations में ये बात settle हो गई कि
सफलता मतलब UPSC.
पढ़ाई मतलब UPSC.
ज़िंदगी का मतलब UPSC
जिस घर में कोई IAS या IPS निकलता है, उस घर की इज़्ज़त पूरे मोहल्ले में बढ़ जाती है. ये गर्व स्वाभाविक है लेकिन इसी के साथ एक और message जाता है कि जो नहीं निकला, वो कम है.
और यही वो message है जो लाखों बच्चों को तोड़ रहा है।
आज एक 18-19 साल के बच्चे से पूछो UPSC क्यों करना है? बहुत कम जवाब होंगे जो governance, policy, या public service से जुड़े होंगे। ज़्यादातर जवाब होंगे
वो uniform देखी थी. वो respect देखी थी. एक video देखी थी जिसमें IPS officer कितनी confidently बोल रहे थे.
IAS, IPS बनने का सपना अब Reels से आता है. एक viral video, एक शानदार uniform, एक "collector sahab" वाला shot और एक 20 साल का बच्चा तय कर लेता है कि बस यही करना है. ये dream नहीं है, ये aesthetic है.
और उस image के पीछे की असली ज़िम्मेदारी रात 2 बजे किसी flood-affected ज़िले में काम करना, system की bureaucracy से लड़ना, political pressure झेलना वो Reels में नहीं आती.
UPSC के results में Hindi Medium का representation हर साल गिरता जा रहा है. पर इस पर कोई बात नहीं करेगा.
वो बच्चे जो सबसे ज़्यादा मेहनत करते हैं. जिनके लिए English पहली बाधा है, content दूसरी, और coaching fees तीसरी. जो Patna, Allahabad, Rewa के किसी कमरे में बैठकर दिन-रात पढ़ते हैं.
और irony ये है कि IAS, IPS का काम आम जनता से होता है. वो जनता जो Hindi में सोचती है, Bhojpuri में बोलती है, Maithili में रोती है. Public servant की भाषा और public की भाषा के बीच ये खाई system की देन है, मेधा की नहीं.
जिस अधिकारी को उनकी भाषा समझनी है, उनकी ज़िंदगी समझनी है उसे चुनने की process में उसी भाषा को कमज़ोर माना जा रहा है.
हम में से कितने लोगों ने किसी Software Engineer के बारे में लिखा जो इस वक्त AI पर काम कर रहा है? जो देश का digital infrastructure बना रहा है? जो किसी startup में बैठकर किसानों के लिए, मरीज़ों के लिए, छोटे दुकानदारों के लिए कुछ बना रहा है?
शायद किसी ने नहीं.
क्योंकि उसके पास वो uniform नहीं है। वो "sahab" नहीं कहलाता.
लेकिन देश उससे भी चलता है. उससे भी बनता है. और आने वाले वक्त में शायद उनसे ज़्यादा बनेगा.
हर काम की अपनी गरिमा है. हर योगदान की अपनी value है. एक exam उस value का एकमात्र पैमाना नहीं हो सकता.
और वो aspirants जो 5, 6, 7 साल दे चुके हैं.
जिनकी उम्र जा रही है. Savings जा रहे हैं. रिश्ते जा रहे हैं. जो अब depression में हैं सिर्फ इसलिए क्योंकि हमने, इस समाज ने, उन्हें यकीन दिला दिया कि यही एकमात्र रास्ता है। यही एकमात्र पहचान है.
ये हमारी सबसे बड़ी गलती है।
उन सबके लिए जो इस बार नहीं निकले.
तुम्हारी मेहनत झूठी नहीं थी.
वो रातें झूठी नहीं थीं.
वो संघर्ष झूठा नहीं था.
तुम्हारी intelligence किसी merit list से कम नहीं है.
तुम्हारी worth किसी exam के result से तय नहीं होती.
तुम्हारा भविष्य अभी खत्म नहीं हुआ.
जिस देश को तुम serve करना चाहते थे उस देश को तुम्हारी ज़रूरत है.
एक exam का result तुम्हारी पूरी ज़िंदगी की परिभाषा नहीं है.
तुम उससे कहीं बहुत कहीं ज़्यादा हो ❣️
(ऋचा शर्मा जी की फेसबुक वॉल पर यह पोस्ट पढ़ी। आप भी पढ़िए और कुछ लोगों को पढ़ाइए। शायद किसी का भला हो जाए)
ऐसी गिरी हुई मानसिकता वाले अधिकारियों को छांट छांट कर रेलवे बोर्ड द्वारा भी बेहद कड़े मानक स्तरों पर मानवीयता, संवेदनशीलता और कार्य के दौरान व्यवहारिक स्तर पर डिसीजन लेने का प्रशिक्षण उन्हीं अधिकारियों के खर्चे से दिया जाना चाहिए, जिन्होंने ऐसा अमानवीय व्यवहार करने की चेष्टा की!
ऐसी गिरी हुई मानसिकता वाले अधिकारियों को छांट छांट कर रेलवे बोर्ड द्वारा भी बेहद कड़े मानक स्तरों पर मानवीयता, संवेदनशीलता और कार्य के दौरान व्यवहारिक स्तर पर डिसीजन लेने का प्रशिक्षण उन्हीं अधिकारियों के खर्चे से दिया जाना चाहिए, जिन्होंने ऐसा अमानवीय व्यवहार करने की चेष्टा की!
ऐसा सिर्फ भारत में ही संभव है...
लखनऊ डिवीजन का एक लोको पायलट बवासीर सर्जरी के बाद घाव नहीं भरने पर कुछ और दिन की छुट्टी मांगने अपने अधिकारी के पास गया।
अधिकारी को उसकी बात पर यकीन नहीं हुआ, इसलिए उसने अधिकारी को विश्वास दिलाने के लिए अपनी पैंट उतार दी ताकि वे घाव देख सकें। लेकिन अधिकारी महोदय ने देखना भी उचित नहीं समझा। और इसके बावजूद छुट्टी भी नहीं बढ़ाई।
आप मुश्किल वक्त में अपने कर्मचारी का साथ नहीं देते हैं और उससे काम भी निष्ठापूर्वक चाहते हैं। गजब है।
ये हमारे चूरू के मनोज लाम्बा हैं
पुलिस लाइन में हेड कांस्टेबल हैं। सूर्य और जल की साक्षी में संकल्प ले रहे हैं कि वह अपने बेटे की शादी में एक रुपए का भी दान दहेज नहीं लेंगे और विवाह के अवसर पर अपनी पैतृक जमीन में से 11 बीघा भूमि गौशाला के लिए दान करेंगे।
समाज में ऐसे संकल्प ही बदलाव लाते हैं।
मुझे गर्व कम और गुस्सा ज्यादा आ रहा है...
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन कहते हैं-
1. अल्फाबेट के सीईओ भारतीय हैं।
2.माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ भारतीय हैं।
3. आईबीएम के सीईओ भारतीय हैं।
4. एडोब के सीईओ भारतीय हैं।
5. पालो अल्टो नेटवर्क्स के सीईओ भारतीय हैं।
6. चैनल के सीईओ भारतीय हैं।
सुनकर अच्छा लग सकता है और गर्व भी हो सकता है लेकिन मैं मेरी बात कहूं तो मुझे इस बात पर गुस्सा ज्यादा आता है। अगर दुनिया की लीडिंग और बेहतरीन कंपनियों को भारतीय चला रहे हैं तो भारत में ऐसी कंपनियां क्यों नहीं हैं? हमारी सरकारों ने ऐसा माहौल देश के अंदर क्यों नहीं बनाया कि हमारी प्रतिभाएं भारत में ही ऐसी कंपनियां खड़ी कर पातीं? हमारे लोगों में प्रतिभा है तभी तो उनके हाथों में दुनिया की सबसे बड़ी और प्रतिष्ठित कंपनियों की बागडोर है, तो फिर हमारे देश में क्या कमी रह गई थी?
मैं किसी एक सरकार या किसी एक पार्टी को इसके लिए जिम्मेदार ठहराऊं, यह गलत होगा। हमारी जड़ में ही कुछ ना कुछ बड़ी कमी रही है जिसके कारण आज हमें यह देखना पड़ रहा है कि हमारी पाली-पोसी हुई प्रतिभाएं दुनिया में डंका तो बज रही है लेकिन हमारे लिए नहीं बज रही हैं। जब तक इस कमी को दूर नहीं किया जाएगा, तब तक हम गर्व भले ही करते रहें लेकिन उसमें एक अधूरापन हमेशा रहेगा।
खेजड़ी बचाने के लिए जिसके पास जो भी माध्यम है, वह उसी से अपनी आवाज उठाए।
चुप बैठना गुनाह है।
सैंड आर्टिस्ट अजय सिंह रावत ने अपनी मिट्टी कला के माध्यम से खेजड़ी बचाओ आंदोलन को समर्थन दिया है। धन्यवाद
#खेजड़ी_बचाओ_महापड़ाव#खेजड़ी_बचाओ
एक-एक शब्द सच और दिल से निकला हुआ
प्राइवेट अस्पतालों में मरीज को जिस तरह नोंचा जाता है, उस पर कोई लगाम नहीं है। परिवार एक ही बार में यहां से गरीब बनकर लौटता है
यह नज़ारा ऐतिहासिक है
बीकानेर में इतिहास लिखा जा रहा है। भरी सर्दी में दिन और रात के नज़ारे एक जैसे हैं। खेजड़ी बचाने के लिए 363 संत गण आमरण अनशन पर हैं। हमने मां अमृता देवी का दौर तो नहीं देखा है, लेकिन उनका जस आज तक सुनते आए हैं। आज की इस रात का जस हमारी आने वाली पीढ़ियां सुनती रहेंगी।
एक वक्त था। खेजड़ियों पर संकट आया था और लोग उन्हें बचाने के लिए इस ताकत से आगे आए थे। इस धर्मयुद्ध में व्यक्ति गौण हो गए थे।
#खेजड़ी_बचाओ_महापड़ाव #खेजड़ी_बचाओ
मैं जब परीक्षा लिख कर वापस लौट रहा था
पेपर लीक की ख़बरें उड़ने लगी थीं
लगा रहा था जब नंबरों का हिसाब
पेपर रद्द हो चुका था
भर्तियां टाली जा चुकी थीं
मैं अब गाँव की बस का इंतज़ार कर रहा हूॅं
जांच के लिए कोई कमेटी बना दी गई है।
@aakashgauti की यह कविता राजस्थान की हकीक़त है।
OMR SHEET को परीक्षा के बाद तुरंत हर भर्ती एजेंसी को साइट पर डालना चाहिए।
या OMR SEET का परिणाम जारी तक का Full Track Video पब्लिक या रिकोर्ड करना चाहिए।
ठंड पड़ै हैं ठाकरां
काठा पहरो कोट
दूध गटकाओ रात नै
अर रंज र जीमो रोट...
राजस्थानी के जाने-माने कवि दिवंगत ओम पुरोहित "कागद" के इन दोहों में सर्दी की एक मीठी गरमाहट सी है। आदरणीय ओम जी अत्यंत सरल और विनोदीय स्वभाव के जिंदादिल इंसान थे। साहित्य जगत में उनका नाम अत्यंत आधार से लिया जाता है।
श्रीगंगानगर में पोस्टिंग के दौरान मुझे उनका सान्निध्य भी प्राप्त हुआ था। उन्हीं दिनों एक झटके में नियति ने उन्हें हमसे छीन लिया था। उस दिन श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़, दोनों जिलों में हर कोई रोया था।
कवि-लेखक-साहित्यकार कभी मरते नहीं हैं। अपनी रचनाओं के माध्यम से वे लोक में हमेशा जीवित रहते हैं।
तो, आनंद लीजिए ओम जी के दोहों का
एक पेड़ माँ के नाम लगाकर फोटो शूट करवाओ
ओर फिर एक साल तक सैकड़ों कटते पेड़ों पर आंख पर पट्टी ओर मुंह पर लगाम लगाओ।।
ऐसा कौनसा पर्यावरण प्रेम।।
कारोबार की या पर्यावरण की चिंता