बलिया की रसड़ा विधानसभा से बसपा के विधायक श्री उमाशंकर सिंह जी का निधन, अत्यंत दुखद !
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।
शोक संतप्त परिजनों के प्रति गहरी संवेदनाएं।
भावभीनी श्रद्धांजलि !
भारत में मेरिट की अवधारणा:
भारत में “मेरिट” को अक्सर परीक्षा में प्राप्त अंकों, अंग्रेज़ी पर पकड़, प्रतिष्ठित संस्थानों की डिग्री और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में सफलता तक सीमित कर दिया जाता है। लेकिन क्या यही वास्तविक मेरिट है? यह प्रश्न केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और संवैधानिक महत्व का भी है।
परीक्षा के अंक किसी व्यक्ति की क्षमता का एक सीमित संकेत हो सकते हैं, लेकिन वे उसकी संपूर्ण योग्यता का मापदंड नहीं हैं। दो छात्रों में यदि एक को बचपन से अच्छे विद्यालय, प्रशिक्षित शिक्षक, निजी ट्यूशन, पढ़ाई के लिए शांत वातावरण, शिक्षित माता-पिता का मार्गदर्शन, डिजिटल संसाधन और सामाजिक नेटवर्क उपलब्ध हों, जबकि दूसरे छात्र को इन सुविधाओं के बिना संघर्ष करना पड़े, तो दोनों के प्राप्तांक की सीधी तुलना करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।
यही कारण है कि आधुनिक समाज विज्ञान “मेरिट” को केवल व्यक्तिगत प्रतिभा का परिणाम नहीं मानता, बल्कि अवसर (opportunity), सामाजिक पूंजी (social capital), सांस्कृतिक पूंजी (cultural capital) और आर्थिक संसाधनों के संयुक्त प्रभाव के रूप में देखता है। समाजशास्त्री पियरे बोरदियो (Pierre Bourdieu) ने दिखाया कि परिवार और समाज से मिलने वाली सांस्कृतिक एवं सामाजिक पूंजी भी सफलता तय करती है। इसलिए मेरिट केवल व्यक्तिगत मेहनत का परिणाम नहीं होती; वह सामाजिक परिस्थितियों से भी निर्मित होती है।
भारत में जाति व्यवस्था ने सदियों तक शिक्षा, संपत्ति, प्रशासन और ज्ञान पर कुछ समुदायों का विशेषाधिकार बनाए रखा। दूसरी ओर, दलितों, आदिवासियों और अनेक पिछड़े समुदायों को शिक्षा और सार्वजनिक संस्थानों से व्यवस्थित रूप से दूर रखा गया। ऐसे में यदि आज भी मेरिट को केवल परीक्षा के अंकों से परिभाषित किया जाए, तो यह ऐतिहासिक असमानताओं की अनदेखी होगी।
ब्रिटिश शासन के दौरान स्थापित परीक्षा-केंद्रित शिक्षा प्रणाली ने भी मेरिट की इसी संकीर्ण अवधारणा को मजबूत किया। इस व्यवस्था का उद्देश्य रचनात्मक, स्वतंत्र चिंतक तैयार करना नहीं, बल्कि औपनिवेशिक प्रशासन के लिए प्रशिक्षित कर्मचारी तैयार करना था। स्वतंत्र भारत ने बड़े पैमाने पर इसी मॉडल को जारी रखा, जिसमें रटकर सीखना, लिखित परीक्षा और अंक प्रमुख मानदंड बने रहे। परिणामस्वरूप रचनात्मकता, नेतृत्व क्षमता, ईमानदारी, संवेदनशीलता, समस्या-समाधान की योग्यता, सामाजिक समझ और कठिन परिस्थितियों में काम करने की क्षमता जैसे गुणों का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं हो पाया।
विडंबना यह है कि जिन लोगों को पीढ़ियों से बेहतर अवसर मिले, उनकी सफलता को “मेरिट” कहा गया; जबकि जिन लोगों ने विपरीत परिस्थितियों में सीमित संसाधनों के बावजूद उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल कीं, उनकी मेहनत और संघर्ष को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया गया। वास्तव में, समान अवसरों के बिना प्राप्तांक की तुलना करना निष्पक्ष प्रतियोगिता नहीं बल्कि विशेषाधिकारों की तुलना है।
इसी संदर्भ में आरक्षण (Affirmative Action) को समझना आवश्यक है। आरक्षण का उद्देश्य किसी अयोग्य व्यक्ति को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और संरचनात्मक असमानताओं के कारण अवसरों से वंचित लोगों को समान प्रतिस्पर्धा का अवसर देना है। अनेक शोध यह दर्शाते हैं कि आरक्षण से संस्थानों की कार्यक्षमता या उत्पादकता में गिरावट का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला। इसके विपरीत, विविधता से निर्णय-प्रक्रिया और संस्थागत गुणवत्ता में सुधार के संकेत मिले हैं।
आज दुनिया भर में प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय और कंपनियाँ भी मानने लगी हैं कि केवल परीक्षा के अंक या एक बार की परीक्षा किसी व्यक्ति की संपूर्ण क्षमता का सही आकलन नहीं कर सकती। नेतृत्व, नवाचार, टीमवर्क, रचनात्मकता, दृढ़ता और सामाजिक संवेदनशीलता भी उतने ही महत्वपूर्ण गुण हैं।
इसलिए भारत में मेरिट की अवधारणा पर पुनर्विचार आवश्यक है। वास्तविक मेरिट केवल यह नहीं कि कोई व्यक्ति कितने अंक लेकर आया, बल्कि यह भी कि उसने किन परिस्थितियों में वे अंक प्राप्त किए, उसने उपलब्ध अवसरों का कितना प्रभावी उपयोग किया और समाज के प्रति उसका योगदान कितना सार्थक है।
मेरिट का सही अर्थ विशेषाधिकार का पुरस्कार नहीं, बल्कि क्षमता, परिश्रम और अवसरों की निष्पक्ष पहचान होना चाहिए। तभी हम एक ऐसे समाज की कल्पना कर सकते हैं जहाँ सफलता जन्म से नहीं, बल्कि प्रतिभा और समान अवसरों से तय हो।