समाज की बातें सामाजिक हो जाती हैं
जब कुछ अपने ही लोग छोटे से तालाब को नदी बना देते हैं
दूर देश मे रहने वाले परिंदे भी जब एक पिंजरे मे कैद हो जाते हैं तब उनकी भी कीमत दुगनी हो जाती है
समाज सामाजिक होने से खुद को नहीं रोकता क्युकी समाज की रूढ़ि नीति को सहारा हम खुद देते है..
चाँद हर लहजे मे खूबसूरत लगता हैं
झूठी सी दुनिया मे अपने भी पराये से लगते हैं
कुछ लब्जों मे ठेहर जाते हैं तो कई दिलों को खेद जाते है
जन्मों के नाते को लोग मौत के सहारे पल भर मे छोड़ जाते हैं
रूह की बातें तो अब सिर्फ कलियों मे मिलती है मोहब्बत को तो कबका फूलोंके बाजार में बचे दिये
उनकी आँखे जैसी नशीले धुयें की तरहां....
वो कहते हैं ऐसे जैसे ख़ुदा की तरहां...
है कुछ आग उनमे ऐसी जिसमे मरते हम शम्मा की तरह...
है जलती लौह दिल तूफ़ान की तरहां...
वो हमे फिर भी अनदेखा करते जैसे हम एक गुजरी हुई रात की तरहां... 😌❤🩹