अनवर इब्राहिम साहब को “दोस्त दोस्त ना रहा” गाते देख मुझे इंडोनेशिया में अपने शुरुआती दिन याद आ गए। 2008/09 के आसपास मैं जकार्ता के अलावा बहुत यात्रा करता था। शाहरुख खान तब तेजी से लोकप्रिय हो रहे थे, लेकिन राज कपूर, धर्मेंद्र और मिथुन चक्रवर्ती जैसे नाम उससे बहुत पहले यहाँ पहुँच चुके थे।
टैक्सी वाला हो, रास्ते में मिलने वाला कोई आदमी हो या घर में काम करने वाली पेमबन्तू, भारत का नाम आते ही किसी को बंबई याद आती थी, किसी को ताजमहल और किसी को कोई पुराना हिंदी गाना।
मुझे आज भी याद है, घर में यूएसबी से बेताब का “जब हम जवाँ होंगे, जाने कहाँ होंगे” बज रहा था और हमारी पेमबन्तू काम छोड़कर कुछ देर वहीं खड़ी हो गई और साथ गाने लगी। एक बार बांडुंग जाते हुए एक इंडोनेशियन सज्जन ने धर्मेंद्र का नाम लिया और फिर “दिल ने फिर याद किया” सुनाने लगे।
बाद में यहाँ रहते-रहते समझ में आया कि यह केवल हिंदी फिल्मों की लोकप्रियता की बात नहीं थी। इंडोनेशिया के पुराने मलय ऑर्केस्ट्रा, जिन्हें यहाँ ऑर्केस मेलायु कहा जाता था और जिनसे आगे चलकर डांगदुत निकला, उन पर पुराने हिंदी फिल्म संगीत का बाकायदा असर था।
एलिया खादम का बेहद प्रसिद्ध “बोनेका दारी इंडिया” सुनिए, उसकी धुन 1952 की आशियाना के “समय है बहार का” से आती है। उनका ही “तेरमेनुंग” 1957 की चंपाकली के लता मंगेशकर वाले “छुप गया कोई रे, दूर से पुकार के” की धुन पर है।
बाद में ए. रफीक का बहुत लोकप्रिय “पांडांगन पर्तामा” आया, जिसकी धुन असली नकली के “प्यार का साज़ भी है” से ली गई थी। ऐसे उदाहरण एक-दो नहीं हैं। हिंदी फिल्मों की धुनें यहाँ आईं, स्थानीय बोल मिले, ताल बदली, वाद्य बदले और धीरे-धीरे वे इंडोनेशियाई संगीत की अपनी स्मृति का हिस्सा बन गईं।
और यह कहानी केवल इंडोनेशिया की भी नहीं है। मलेशिया के महान पी. रामली के शुरुआती सिनेमा को देखिए। उस दौर के मलय सिनेमा में अनेक भारतीय निर्देशक काम कर रहे थे और “तक गुना”, “दुनिया हान्या पिंजामन”, “केजामन्या मनुसिया” से लेकर बाद के “तेमुकनलाह” तक कई गीतों में बाकायदा हिंदुस्तानी लय दर्ज मिलती है।
उस समय भारत, मलाया, सिंगापुर और इंडोनेशिया के बीच फिल्म और संगीत किसी सरकारी सांस्कृतिक कार्यक्रम के भरोसे यात्रा नहीं कर रहे थे; फिल्में पहुँच रही थीं, रिकॉर्ड पहुँच रहे थे और उनके साथ धुनें भी लोगों के घरों और स्मृतियों में जगह बना रही थीं।
इसलिए आज मलेशिया के प्रधानमंत्री को पियानो के पास खड़े होकर मुकेश का “दोस्त दोस्त ना रहा” पूरे मन से गाते देखना मुझे कोई अनोखी घटना नहीं लगता। यह उस रिश्ते की एक और झलक है जो इस इलाके और हिंदी सिनेमा के बीच हममें से बहुतों के यहाँ पहुँचने से भी कई दशक पहले बन चुका था।
They fight like enemies, laugh like best friends, and love like no one else. 🥹❤️
Because that’s what being siblings is all about.
Happy Raksha Bandhan! 🪢✨
#HappyRakshaBandhan
लड़के ! हमेशा खड़े रहे
खड़े रहना उनकी मजबूरी नहीं रही
बस उन्हें कहा गया हर बार
चलो तुम तो लड़के हो
खड़े हो जाओ
छोटी-छोटी बातों पर वे खड़े रहे
कक्षा के बाहर.. स्कूल विदाई पर
जब ली गई ग्रुप फोटो,
लड़कियाँ हमेशा आगे बैठीं,
और लड़के बगल में हाथ दिए पीछे खड़े रहे
वे तस्वीरों में आज तक खड़े हैं..
कॉलेज के बाहर खड़े होकर,
करते रहे किसी लड़की का इंतज़ार,
या किसी घर के बाहर घंटों खड़े रहे,
एक झलक, एक हाँ के लिए
अपने आपको आधा छोड़ वे आज भी
वहीं रह गए हैं...
बहन-बेटी की शादी में खड़े रहे,
मंडप के बाहर बारात का स्वागत करने के लिए
खड़े रहे रात भर हलवाई के पास,
कभी भाजी में कोई कमी ना रहे
खड़े रहे खाने की स्टाल के साथ,
कोई स्वाद कहीं खत्म न हो जाए
खड़े रहे विदाई तक
दरवाजे के सहारे और टैंट के
अंतिम पाईप के उखड़ जाने तक
बेटियाँ-बहनें जब तक वापिस लौटेंगी
वे खड़े ही मिलेंगे...
वे खड़े रहे पत्नी को सीट पर बैठाकर,
बस या ट्रेन की खिड़की थाम कर वे खड़े रहे
बहन के साथ घर के काम में,
कोई भारी सामान थामकर
वे खड़े रहे
माँ के ऑपरेशन के समय
ओ. टी.के बाहर घंटों. वे खड़े रहे
पिता की मौत पर
अंतिम लकड़ी के जल जाने तक
वे खड़े रहे ,
अस्थियाँ बहाते हुए गंगा के बर्फ से पानी में
लड़कों ! रीढ़ तो तुम्हारी पीठ में भी है,
क्या यह अकड़ती नहीं.....?
- सुनीता करोथवाल 🪷🤍
#प्रेम का प्रारम्भ मानो जीवन में एक नई #ऋतु के आगमन जैसा होता है।
जहाँ साधारण क्षण भी असाधारण लगने लगते हैं।
किसी की #उपस्थिति दिनभर के शोर में भी सहज #सुकून 🍁 भर देती है।
मन अनजाने ही उसकी #मुस्कान में अपना सबसे #प्रिय ठिकाना खोजने लगता है।
पिछले तीस साल में प्रकाशित हिन्दी के पांच उपन्यास उल्लिखित करें, जिन्हें आप साहित्य की एक उपलब्धि समझते हों। मेरे पास एक सूची है लेकिन मैं उसे बाद में रखूंगा। अभी आपकी सूची का आकलन और परीक्षण हो जाए।
बताइए।
जब कोई पुरुष भीतर से टूटकर या ठानकर मौन हो जाता है, तो वह उन चीज़ों से भी दूरी बना लेता है जो कभी उसके लिए सबसे प्रिय हुआ करती थीं। यह उदासीनता हमेशा घमंड नहीं होती, कई बार यह थकान, आत्मसम्मान या अनकहे घावों का परिणाम होती है। तब वह चाहकर भी पहले जैसा नहीं रह पाता। ❤️🩹
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"महसूस करो"✨
ज़िन्दगी की सबसे बड़ी हकीकत बस ये 'पल' है। न बीता हुआ कल वापस आएगा, न आने वाले कल की कोई गारंटी है। जो है, जैसा है, उसे पूरी शिद्दत से जी लो। क्योंकि कभी-कभी हम बेहतर 'कल' की तलाश में 'आज' को जीना भूल जाते हैं। ✨
ज़रा ठहरो और जी लो! ⏳✨
अजीब कशमकश है इस ज़िंदगी की...
हम बेहतर 'कल' के लिए अपना 'आज' खर्च कर रहे हैं।
जबकि सच तो ये है कि कल सिर्फ एक ख्याल है, और आज एक हकीकत।
अगर आपको अपनी ज़िंदगी की किताब का कोई एक दिन दोबारा जीने का मौका मिले, तो वो कौन सा दिन होगा और क्यों? कमेंट्स में अपनी यादें साझा करें। 👇❤️"