सूखे पत्ते में और मुर्दे में फर्क नहीं है, सूखा पत्ता हरे पत्ते की लाश है और मुर्दा हमारी लाश है। इसमें कोई बहुत फर्क नहीं है। हरा पत्ता जिंदा है और सूखा पत्ता मर गया है। वह भी लाश है हरे पत्ते की। हरा पत्ता लड़ता है हवाओं से।
नदी जिंदा को डुबा देती है और मुर्दे को उठा देती है! जिंदा को मार डालती है और मुर्दे को ऊपर तैरा देती है! आखिर मुर्दे में ऐसी कौन सी कला है कि वह ऊपर आ जाता है और जिंदा नीचे चला जाता है? मुर्दे के पास एक कला है जो ज़िंदा के पास नहीं है। मुर्दा तैर नहीं सकता वह तैरने में असमर्थ है।
अशांति में सफल होने के लिए बड़ी कुशलता चाहिए। लेकिन शांत होना क्रिया नहीं है। अगर हम अशांत होना बंद कर दें, तो बस शांत होना हो जाएगा। इसको ऐसा भी समझ सकते हैं कि अशांति और शांति में विरोध नहीं है। अशांति और शांति एक-दूसरे के उलटे नहीं हैं। अशांति का अभाव, एब्सेंस शांति है।
एक बात बहुत स्पष्ट रूप से मन के सामने प्रकट हो जानी चाहिए कि ध्यान हमारी कोई क्रिया नहीं है, ध्यान हमारा समर्पण है। लेकिन हमारी भाषा में बहुत बड़ी भूल हो जाती है, समर्पण भी एक क्रिया है। तो सरेंडर भी तो एक क्रिया है, समर्पण करना भी एक क्रिया है और ध्यान करना भी एक क्रिया है।
आदमी भी बहुत तरह के हैं, इसलिए बहुत तरह के भगवान हैं। चीनियों के भगवान के गाल की हड्डी निकली हुई होगी, नाक चपटी होगी। चीनी सोच ही नहीं सकते, भगवान की नाक और चपटी न हो। और नीग्रो के भगवान के ओंठ बड़े चौड़े होंगे और बाल घुंघराले होंगे और शक्ल काली होगी।
यह आदमी की ज्यादती है, अन्याय है कि अपने आकार में उसने भगवान की मूर्तियां बना रखी हैं। यह आदमी का अहंकार है कि उसने भगवान को भी अपनी शक्ल में बनाकर रख दिया है। यह आदमी का दंभ है कि वह सोचता है भगवान भी होगा तो उसे आदमी जैसा ही होना चाहिए।
प्रभु का कोई व्यक्तित्व नहीं हो सकता, कोई आकृति, कोई रूप, कोई आकार नहीं हो सकता। क्योंकि जिससे सब आकार निकलते हों उसका खुद का आकार नहीं हो सकता है। अगर उसका भी अपना आकार हो तो उससे फिर दूसरे आकार न निकल सकेंगे।
प्रभु मैं उसको कहूंगा, इन आने वाले दिनों में उसकी व्याख्या कर लेनी ठीक है, अन्यथा पता नहीं आप प्रभु से क्या सोचें। उसकी व्याख्या कर लेनी ठीक है। प्रभु मैं उसको कहूंगा, वह जो मूल आधार है, मूलस्रोत है। जहां से सब निकलता है और जहां सब खो जाता है। ऐसा प्रभु कहीं आकाश में बैठा हुआ नही
तूफान और आंधियां हवाओं में उठेंगी तो हवाओं में ही तो बिखर जाएंगी। और वृक्ष मिट्टी से पैदा होंगे, फूल खिलेंगे तो फिर बिखरेंगे कहां? खोएंगे कहां? वापस मिट्टी में गिरेंगे और सो जाएंगे।
परमात्मा का अर्थ, प्रभु का अर्थ--प्रभु का अर्थ है वह जिससे हम आते हैं और जिसमें हम चले जाते हैं। कोई नास्तिक भी ऐसे प्रभु को इनकार नहीं कर सकता, क्योंकि निश्र्चित ही हम कहीं से आते हैं और कहीं चले जाते हैं। सागर पर लहर उठती है, और फिर वापस सागर में खो जाती है।
तेरी आँखों की चमक में खो जाना अच्छा लगता है,
तुझसे मिलकर यूँ मुस्कुराना अच्छा लगता है।
दुनिया की भीड़ में खुद को भूल जाता हूँ,
बस तेरे पास थोड़ी देर ठहर जाना अच्छा लगता है।
जरूरत नहीं मुझे किसी और सहारे की अब,
तेरा हाथ थाम कर दूर तक जाना अच्छा लगता है।
बिर्सनुभयो कि सम्झनुहुन्छ, हरेक वर्षको बाढीका कारण काठमाडौँका नदीकिनारमा रहेका हजारौँ मानिस ज्यान मात्र जोगाएर आफ्ना सबै सामान छोड्दै भाग्नुपरेको अनि सरकारले उद्धार गर्नुपरेको दृश्य!
यो वर्षौँदेखिको समस्या हो र हरेक वर्ष दोहोरिने नियति पनि। यो समस्यालाई अब आउने वर्षका लागि थाती नराखी उहाँहरूलाई सुरक्षित रूपमा बसोबासको व्यवस्था मिलाउनुपर्छ भनेर मैले बारम्बार लेख्दै र भन्दै आएको छु।
सोच्नुहोस् त, अब पनि कुनै ठुलो दुर्घटना कुन दिन आउँछ भनेर कुर्दै बस्ने हो र हामी? उहाँहरूको जीवनसँग खेलबाड गर्दै त्यही हालमा छोडेर अधिकार र भोटको राजनीति यसरी नै सधैँ गरिरहने? उहाँहरूलाई उचित ठाउँमा व्यवस्थापन गर्नु उपयुक्त हुन्छ कि जसरी वर्षौँदेखि झुलाइयो, त्यसै गरी अबका वर्षहरूमा पनि झुलाइराख्नु? नागरिकका रूपमा उहाँहरूले पाउने अधिकार त्यही अव्यवस्थित र डुबानको जोखिम भएको ठाउँमा बसिरहनु हो कि त्योभन्दा सुरक्षित ठाउँमा जानु हो? पक्कै पनि जोखिमरहित व्यवस्थापन उहाँहरूको अधिकार हो।
त्यस्तै, नदी र खोला किनारमा रहेका यस्ता बस्तीहरूका कारण ढल निकास प्रणाली निर्माणमा अवरोध पुग्दा उपत्यका नै फोहोर र नदीखोलाहरू दुर्गन्धित भइरहेका छन्। यो स्थानान्तरणले काठमाडौँको ढल निकास प्रणालीलाई सहज बनाउनेछ। यी विविध कारणले नै थापाथली, गैरीगाउँ अनि मनोहरा लगायत काठमाडौँका खोला किनारमा जोखिमपूर्ण अवस्थामा रहेका उहाँहरूलाई बल प्रयोग नगरी, मानवीयतालाई ख्याल गर्दै सुरक्षित रूपमा स्थानान्तरण गर्न लागिएको हो।
मैले उम्मेदवारका रूपमा झापामा गरेको वाचा, वरिष्ठ नेताका रूपमा राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टीको वाचापत्रमा लेखिएको प्रतिबद्धता अनि प्रधानमन्त्रीका रूपमा छानिएका ‘सरकारका १०० वटा गर्नै पर्ने काम’ (सुकुम्बासी व्यवस्थापन बुँदा ९१ र सरकारी जग्गा अतिक्रमण तथा कब्जा रोक्ने बुँदा ९२) हामीले बिर्सिएका छैनौँ। ती वाचा पूरा गर्न हामी आन्तरिक रूपमा तयारी गरिरहेका छौँ।
काठमाडौँका खोला किनार बाहेक अरू हजारौँ परिवार छन्, जो वास्तवमै पीडित छन्। अनि देशभर लाखौँ सुकुम्बासी छन्। त्यहाँको र यहाँको समस्या बिल्कुलै फरक हो। हामी सरकारमा छौँ; अतिक्रमणकारी र सुकुम्बासी छुट्याउने नै छौँ। देशभरका वास्तविक सुकुम्बासीका लागि प्रक्रिया पूर्याएर यथाशक्य चाँडो जग्गा वितरण गर्नेछौँ। वर्षौँ पुरानो यो समस्याको स्थायी समाधान यो सरकारले गर्नेछ।
ढुक्क हुनुहोस्।