जिन आंखों को
पर्वत कठोर नज़र आते हैं
उन आंखों ने शायद ही कभी
किसी रोते हुए पुरूष को देखा होगा
क्योंकि इस सृष्टि में
ऐसा कोई कंधा नहीं
जो पुरुष के आंसुओं का बोझ उठा सके
फिर...
पर्वत अपनी पीड़ा कहे भी तो किससे कहे...?
वह है तो एक पुरूष ही
जिसकी भाषा मौन है।
-नेहा राज
@NehaaRaJ