कभी कभी उन रातों को
फर्श पर लेटी पथराई आंखों को
सुख चुके आंसू को
हर आधे घण्टे में उठ कर दर्द से कराहती आवाज को याद करता हूं तब लगता है..!
इश्वर भी किसी रोज ऐसे ही मरा होगा।
ज़िन्दा रहना बस सांस लेना नहीं होता।
बोल चाल मे सहज होना
आसमान देखना
ढलती शाम में उदास होना
साफ आसमान देख खुश हो जाना
प्रेम मे होना
प्रेम करना तुम्हे जिंदा रखती है
खुद से
प्रकृति से
या अपनी माशूका से!
यह एहसाह कि कुछ तो अस्थिर है
क्या पता नही
वरना
तुम कुछ भी हो
ज़िन्दा तो नही हो
एक दिन तुम पूरी दुनिया जीत लोगे पर..!
हजारों कहानियां होंगी अपने दिल अज़ीज़ को बताने को।
पर यकीन मानो
उस जीती दुनिया की कहानी ही सुन ने वाला नहीं होगा न.!
तो
लवड़े का अचीवमेंट है वो.
हार गए हो।
इस बर्बाद होती दुनिया में
तुम्हारा बस होना ही सभ्य है
मेरा होना एक त्रासदी
तुम्हारी मौजूदगी सबकुछ आबाद करती है
मेरा होना ही विद्रोह है
तुम्हारा निश्चल खूबसूरत सा रूप
सब कुछ में रंग भर देता है
मेरी उपस्थिति ही मनहूस और असभ्य है
यक़ीनन तुम्हे प्रेम करते रहना ही
मुझे सभ्य कर सकता है
कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन मुअ'य्यन है
नींद क्यूँ रात भर नहीं आती
आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती
हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती
मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती
/ ग़ालिब
अगर पोस्टकार्ड का जमाना होता तो
इस देश के तमाम जगहों की पोस्ट कार्ड खरीद उसके शहर भेजता और बताता
कि देखो ..!
तुम्हारा न होना
हर मौसम को नीरस
और हर खूबसूरती को कुरुप बना देता है।