Today, India takes a defining step in its civil nuclear journey, advancing the second stage of its nuclear programme.
The indigenously designed and built Prototype Fast Breeder Reactor at Kalpakkam has attained criticality.
This advanced reactor, capable of producing more fuel than it consumes, reflects the depth of our scientific capability and the strength of our engineering enterprise. It is a decisive step towards harnessing our vast thorium reserves in the third stage of the programme.
A proud moment for India. Congratulations to our scientists and engineers.
ये रहा
साल बदला है तो आपको हो साल मुबारक,
हाल बदला नहीं वैसे तो, बहरहाल मुबारक।
बीता जो साल आपको सालेगा सालों तक,
आया जो साल उसकी नई चाल मुबारक।
वाशिंगटन में ट्रंप फिर जो आ गए मियां,
दुनिया को हरेक दिन नया बवाल मुबारक
जेन ज़ी जो जूझने लगे, दरबार हिल गया,
जेन ज़ी तुम्हें अपना नया नेपाल मुबारक।
आरंभ है आसान और मुश्किल है रोकना
यूक्रेन रूस युद्ध का तीन साल मुबारक
पट्टी तक फराहम ना हुई गाज़ा के ज़ख़्म को
सीज़फ़ायर का नया ख़त ओ खाल मुबारक।
दिल्ली ने खींची रेखा तो भगवंत गए मान
पंजाब आपको अरविंद केजरीवाल मुबारक
हर साँस को ये आस कि आलूदगी कम हो
ए क्यूं आई, दिल्ली को ये सवाल मुबारक
दूध हो पनीर हो मिठाई हो या दवाई
मेहनत की कमाई को नकली माल मुबारक
पहले ही मिलावट का पेट्रोल था मसला
तिसपर भी २० फ़ीसद इथनॉल मुबारक
सत्ता के गलियारों में सफेदी की चमक है,
स्थाई तो नहीं है पर फिलहाल, मुबारक
स्वच्छ भारत मिशन ब्रॉट टू यू बाय विमल,
थूक ओ पीक से होगा सब लाल मुबारक
है भीड़ का ही नाम डेमोक्रेसी मेरे भइया
इस भीड़ को अंग्रेज़ी की भेड़चाल मुबारक
यां भीड़ को आज़ादी है थपड़ियाए या छोड़े
इक साल और बच गए ये गाल मुबारक
हौसले आए हिनहिनाए औ चुपचाप चल दिए,
जब गधों के हाथ लग गया घुड़साल, मुबारक
समानता उपलब्धता पर इस हद तक है निर्भर,
है घर की मुर्गियों को भी अब दाल मुबारक
रूपए और डॉलर में क्यों बनती नहीं कभी,
एक को लुढ़क, दूजे को है उछाल मुबारक।
जो सिंगल हैं उन्हें डबल का खयाल मुबारक
जो डबल हैं उन को शब-ए-विसाल मुबारक
जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे
मैं उनसे मिलने
उनके पास चला जाऊँगा।
एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर
नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊँगा
कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा
पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब
असंख्य पेड़, खेत
कभी नहीं आएँगे मेरे घर
खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने
गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा।
जो लगातार काम में लगे हैं
मैं फ़ुरसत से नहीं
उनसे एक ज़रूरी काम की तरह
मिलता रहूँगा—
इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह
सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।
~ विनोद कुमार शुक्ल
लड़के भी विदा होते हैं।
लड़कियाँ विदा होती हैं
तो ऐसे घर जाती हैं,
जिस का भविष्य उनकी कोख में जीतेगा,
एक माँ, एक पिता और एक पति,
आरती कर के उनका स्वागत करती है।
लौट कर घर आती हैं
तो मायका उनके लिए
पहले से अधिक अपना हो जाता है।
विदा लड़के भी होते हैं,
पिता उन्हें जाते हुए
छाती से नहीं लगाते,
उनके जाने पर
शहनाइयाँ नहीं बजती हैं,
माँ बाप का पाँव छू के
वे चुपचाप निकल आते हैं घर से,
कोई छोड़ने नहीं आता ,
ना साथ कोई विदा कराने
आता है।
ट्रेन की खिड़की पर
एक एक कर के गिरती बूँदों
को गिनते हुए वो निकल आते हैं,
और भर आयी आँखों
को सिगरेट के धुएँ के
आँसुओं में छिपा लेते हैं।
वो घर से निकल के इंसानों के
ऐसे जंगल में पहुँचते हैं,
जहाँ
और लड़कों के पसीनों
में गुँथ के वो नाईट ड्यूटी से
लौट के सो जाते हैं,
घर में
करेले की सब्ज़ी ना खाने वाले
लड़के,
कान में सीसे की तरह,
कहीं ‘अबे बिहारी’ तो कहीं ‘नार्थी’
सुन कर अनसुना कर देते हैं।
लड़के
बुजुर्ग हो जाते हैं
चंद ही महीनों में,
और घर में
पारे की तरह उफनने वाला खून,
ढीठ हो कर ठंडा हो जाता है,
धक्के खाते हुए,
हर महीने,
सौ पचास बचा लेते हैं लड़के
क्यों कि पिता जब पूछते है
‘तनख़्वाह आ गई’
तो यह जिज्ञासा नहीं
उत्तरदायित्व का अनकहा बोध होता है,
जिसके पीछे पिता की खाँसी
और माँ के सिलबट्टे पर लोढ़ा
घिसने की आवाज़ होती है,
बहन की डोली के कहारों
की नेपथ्य में गूंजते स्वर होते हैं,
और जब पीठ छिल के
लहुलुहान होती है,
आत्मा छिल के मृतप्राय
तब वो छत की और देख
अपने जीवन के वो सोलह वर्ष
याद करते हैं
जब वे राजा बेटा हुआ करते थे,
और
छुट्टियों में घर जा के
पिता को ‘पणाम’ कह के अलग
खड़े हो जाते हैं,
और माँ के हाथों में
पसीने से सने नोट देते हैं,
तो वो समझ जाते हैं,
उनके जीवन से
परिवार के प्रियों के
आलिंगन की आयु समाप्त हो चुकी है,
और इसके आगे
परिवार में उनका स्थान सिर्फ़
पर्वो, पैसों और अंत में
धार्मिक संस्कारों तक सीमित रह जाता है,
लड़कियाँ लड़कियाँ रहती हैं,
लड़का मर्द हो जाता है,
और रोने और हँसने दोनों का ही अधिकार त्याग देता है,
और एक दिन कपाल क्रिया में
लाठी मार कर
अपने सोलह साल की आयु में
छूट गये आलिंगनों की
आशाओं को भी राख में दाब कर
बाप बन के घर लौट आता है,
और अकेले में ही रो लेता है।
- साकेत
पूरा भरोसा है कि इन भयंकर धमाकों के बीच ही मेरे लोग हथाई ठोक रहें होंगे। कोई चढ़ती उमर का नौजवान हवा में मुक्के लहरा रहा होगा। बुकियों के बटके भर रहा होगा।
बाड़मेर तुम ऐसे ही रहना। मौत के मुँह पर ठट्ठे मार के हँसते हुए।
#Barmer
Indian Armed Forces launched #OperationSindoor, hitting terrorist infrastructure in Pakistan and Pakistan-occupied Jammu and Kashmir from where terrorist attacks against India have been planned and directed.
Altogether, nine (9) sites have been targeted.
There will be a detailed briefing on ‘OPERATION SINDOOR’, later today.
Read more: https://t.co/jVL5zo4F33
India will identify, track and punish every terrorist, their handlers and their backers.
We will pursue them to the ends of the earth.
India’s spirit will never be broken by terrorism.
आज मुझे भोपाल से दिल्ली आना था, पूसा में किसान मेले का उद्घाटन, कुरुक्षेत्र में प्राकृतिक खेती मिशन की बैठक और चंडीगढ़ में किसान संगठन के माननीय प्रतिनिधियों से चर्चा करनी है।
मैंने एयर इंडिया की फ्लाइट क्रमांक AI436 में टिकिट करवाया था, मुझे सीट क्रमांक 8C आवंटित हुई। मैं जाकर सीट पर बैठा, सीट टूटी और अंदर धंसी हुई थी। बैठना तकलीफदायक था।
जब मैंने विमानकर्मियों से पूछा कि खराब सीट थी तो आवंटित क्यों की? उन्होंने बताया कि प्रबंधन को पहले सूचित कर दिया था कि ये सीट ठीक नहीं है, इसका टिकट नहीं बेचना चाहिए। ऐसी एक नहीं और भी सीटें हैं।
सहयात्रियों ने मुझे बहुत आग्रह किया कि मैं उनसे सीट बदल कर अच्छी सीट पर बैठ जाऊं लेकिन मैं अपने लिए किसी और मित्र को तकलीफ क्यों दूं, मैंने फैसला किया कि मैं इसी सीट पर बैठकर अपनी यात्रा पूरी करूंगा।
मेरी धारणा थी कि टाटा प्रबंधन के हाथ में लेने के बाद एयर इंडिया की सेवा बेहतर हुई होगी, लेकिन ये मेरा भ्रम निकला।
मुझे बैठने में कष्ट की चिंता नहीं है लेकिन यात्रियों से पूरा पैसा वसूलने के बाद उन्हें खराब और कष्टदायक सीट पर बैठाना अनैतिक है। क्या ये यात्रियों के साथ धोखा नहीं है?
क्या आगे किसी यात्री को ऐसा कष्ट न हो, इसके लिए एयर इंडिया प्रबंधन कदम उठाएगा या यात्रियों की जल्दी पहुंचने की मजबूरी का फायदा उठाता रहेगा।
@airindia
पूरा गांव आज कलेक्टर साहब के सामने खड़ा गिड़गिड़ा रहा है।प्लीज हमें बचा लीजिए हम मर रहे है रासायनिक बदबू से।किसी को हमारी कराहने की वेदना समझ आये तो हमें बचा लीजिए पूरा गांव मर जायेगा इस गैस चैम्बर में।पीले चावल देकर हमारे गांव आने का न्योता दिया कलेक्टर साहब पधारिये हम आपकी खूब सेवा करेंगे।एक आखिरी उम्मीद लेकर आये थे साहब पता नही कब तक ज़िंदा रहेंगे मौत का भयानक मंजर देख रहे है आंखो के सामने।@JodhpurDm हाथ जोड़कर निवेदन है एक बार हमारे गांव पधारे रात में।साहब प्लीज हमारे जीवन का सवाल है आप महसूस करेंगे हम कैसे जी रहे हैं।@JogarampatelMLA@narendramodi@ashokgehlot51@gssjodhpur
यह "देव-तुल्य" जनता है, जिसे लोकतंत्र में "जनता जनार्दन" भी कहा गया है। लोकतंत्र में इनमें से हर व्यक्ति उतना ही अहम है जितना कि कोई क़ानून मानने वाला, टैक्स भरने वाला, या देश की प्रगति के बारे में सोचने वाला। लेकिन चूंकि इनकी संख्या अधिक है, लोकतंत्र में राज भी इनका ही चलता है।
Historic and exemplary!
Congratulations to Gukesh D on his remarkable accomplishment. This is the result of his unparalleled talent, hard work and unwavering determination.
His triumph has not only etched his name in the annals of chess history but has also inspired millions of young minds to dream big and pursue excellence.
My best wishes for his future endeavours. @DGukesh