👥 10 करोड़ सब्सक्राइबर। फिर भी आचार्य प्रशांत इसे एक त्रासदी कहते हैं।
"सच के 10 करोड़ सब्सक्राइबर? नहीं। ये 10 करोड़ धोखे हैं।"
इस प्रभावशाली वक्तव्य में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि अधिकांश लोग सही बात को जानते हैं, उसकी प्रशंसा भी करते हैं, लेकिन जब अपने जीवन में उसे उतारने की बात आती है, तो पीछे हट जाते हैं।
आख़िर ऐसा क्यों होता है?
क्या सिर्फ़ सच को सुन लेना ही पर्याप्त है, या उसे जीना भी ज़रूरी है?
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ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में आचार्य प्रशांत: ऐतिहासिक परिसर की एक यादगार सैर
8 जून को ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों ने आचार्य प्रशांत को विश्वविद्यालय के प्राचीन और भव्य परिसर का भ्रमण कराया। इस दौरान उन्होंने न्यू कॉलेज, सोमरविल कॉलेज और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस सहित कई ऐतिहासिक स्थलों की सैर की तथा विद्यार्थियों और शोधार्थियों के साथ संवाद किया। इसके उपरांत ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में आचार्य प्रशांत ने ईशावास्य उपनिषद के दूसरे श्लोक पर एक विस्तृत सत्र लिया। लगभग 150 वर्ष पहले प्रोफेसर मैक्स मूलर ने इसी ऑक्सफोर्ड से ईशावास्य उपनिषद का पहला अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित कर पश्चिमी जगत तक पहुँचाया था। अब डेढ़ शताब्दी बाद, उसी विश्वविद्यालय में एक भारतीय दार्शनिक द्वारा वेदांत और उपनिषद का प्रत्यक्ष प्रस्तुतीकरण अपने आप में एक ऐतिहासिक क्षण बना।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के सामने मीडिया से बातचीत में आचार्य प्रशांत ने कहा कि मैक्स मूलर ने उपनिषदों को पश्चिम तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया, लेकिन शब्दों को जीवन देना आवश्यक है, और जीवन सदैव वर्तमान में होता है। उन्होंने कहा कि आज की दुनिया जिन संकटों- विशेषकर जलवायु संकट, मानसिक अशांति और सामाजिक विखंडन- का सामना कर रही है, उनके समाधान के लिए आत्मज्ञान और आत्म-परीक्षण पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं।
आचार्य प्रशांत का यह ब्रिटेन प्रवास भारतीय दर्शन और वेदांत को वैश्विक मंचों तक पहुँचाने की दृष्टि से ऐतिहासिक माना जा रहा है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, कैम्ब्रिज यूनियन और ब्रिटिश पार्लियामेंट में हुए उनके संवादों ने भारतीय दर्शन और ज्ञान की धाराओं का परचम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लहराया है। फिलहाल वे भारत में हैं, उनके बहुप्रतीक्षित ‘वीकेंड विद मास्टर’ शिविर के लिए, जो की 20 और 21 जून को दिल्ली-NCR में आयोजित होगा। इसके बाद वे पुनः ब्रिटेन जाकर लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (LSE) तथा यूरोप के सबसे बड़े स्वतंत्र जलवायु सम्मेलन, लंदन क्लाइमेट एक्शन वीक 2026, के विभिन्न सत्रों को संबोधित करेंगे।