सदा न संग सहेलियाँ, सदा न राजा देश।
सदा न जुग में जीवणा, सदा न काला केश।
सदा न फूलै केतकी, सदा न सावन होय।
सदा न विपदा रह सके, सदा न सुख भी होय।
सदा न मौज बसन्त री, सदा न ग्रीष्म भाण।
सदा न जोवन थिर रहे, सदा न संपत माण।
सदा न काहू की रही, गल प्रीतम की बांह।
ढ़लते ढ़लते ढ़ल गई, तरवर की सी छाँह।
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तप्त हृदय को सरस स्नेह से जो सहला दे
मित्र वही है
रूखे मन को सराबोर कर जो नहला दे
मित्र वही है
प्रिय वियोग संतप्त चित्त को जो बहला दे
मित्र वही है
अश्रु बूँद की एक झलक से जो दहला दे
मित्र वही है..
~मैथिलीशरण गुप्त
आप सभी को मित्रता दिवस की शुभकामनायें 🫂
#छोटा_दरवाज़ा