'तब भृगुवंशी रक्षक होगा!' सुनकर न केवल रोमांच हुआ, बल्कि शैवागम और तंत्र शास्त्र की गहराई भी उजागर हो गई! शैवागम में स्पष्ट रूप से वर्णित है कि जब अधर्म का अंधकार चारों ओर फैल जाए, तब भगवान शंकर स्वयं अपने परम भक्त भृगुवंशी को दिव्य परशु/विद्युदभि अमोघ अस्त्र प्रदान करते हैं जो अधर्म के वृक्षों को जड़ से उखाड़ फेंकता है। शैवागम की परम्परा कहती है कि शिव का आशीर्वाद ही विष्णु अवतार को रक्षक शक्ति प्रदान करता है। परशुराम कल्पसूत्र/परशुराम तंत्रम् /मेरुतंत्र में स्पष्ट सूत्र है, सम्पूर्ण कल्प में ये एक ही जमदग्निपुत्र, महाबलशाली, दुष्ट क्षत्रियरूप अन्धकार के विनाशक, रेणुका से समुत्पन्न, सूर्य-सदृश तेजः सम्पन्न राम हुए हैं! यह तंत्रवाक्य ठीक उसी भाव को दोहराता है जो भजन में है, तब भृगुवंशी रक्षक होगा!
तंत्र कहता है कि जब सत्त्व नष्ट हो, सरस्वती बंधित हो और आश्रमों पर आक्रमण हो, तब शिवशक्ति का संयोग भृगुकुल से ही रक्षक को जन्म देता है!
Ram Lekhan Kala is the art of creating beautiful pictures by repeatedly writing the sacred name "Ram. " We are conducting a free Ram Lekhan Kala workshop on 14th June (Sunday) at 5:00 pm to 6:30 pm. Please scan the QR code on the reel for more details & registration.
#IKS
तन्त्रोक्तं गुप्तविज्ञानं, लोके जाग्रति दैवतम्।
नमो तस्मै भूदेवाय, नमो देव्यै सनातनी॥
हमारी इस धरा पर ही कुछ ऐसे जाग्रत देव होते हैं, जो पलक झपकते ही फल देते हैं। इन्हें हमसे पहले हमारी माता, हमारे पिता और हमारे दादा दादी भी पूजते आए होंगे। इन्हें ठीक वही सब पसंद होता है, जो हमें प्रिय है, वही जो हमारे लोक व्यवहार और परम्पराओं में रचा बस�� है। ये बहुत जल्दी रीझ जाते हैं, बहुत जल्दी तुष्ट हो जाते हैं और जीवन में बड़े बड़े चमत्कारिक फल दे देते हैं।
पहले मैं भी अपने कुत्सित विचारों और आधुनिक तार्किकता के प्रभाव में आकर ��न्हें नहीं मानती थी, कई बार तो अनजाने में इनका मज़ाक भी उड़ा देती थी। लेकिन जैसे जैसे मैंने जीवन को गहराई से समझा, वैसे वैसे इन लोक शक्तियों के मर्म को भी समझा! अफ़सोस होता है कि जीवन के कई अनमोल वर्ष मैंने इस समझने और परखने की व्यर्थता में गंवा दिए। काश! कि मैं सीधे ही अपने माता पिता के कहने पर, बिना किसी तर्क के, पूरे श्रद्धाभाव से इनकी अर्चना करती रहती।
लेकिन हम आधुनिक और इंटेलेक्चुअल स्त्रियां तभी मानती हैं, जब स्वयं उस शक्ति का अनुभव न कर लें। विडंबना देखिए, गरज हमारी होती है, संकट में हम होते हैं, फिर भी हमारा एटीट्यूड ऐसा रहता है जैसे हम कह रही हों "ए देवता! पहले खुद को साबित करके दिखाओ!" दैवीय शक्तियां इस तरह के अहंकार से वश में नहीं आतीं। वे तो केवल शुद्ध भाव की भूखी हैं। उन्हें चाहिए पूर्ण समर्पण, एक निश्छल और अबोध विसर्जन।
और यह जो बड़े बड़े देवताओं और भव्य मंदिरों के उपासक हैं न, कई बार वे भी एक बहुत बड़ी चूक कर जाते हैं। काशी में बाबा विश्वनाथ तो अधिपति हैं ही, लेकिन वहां की आम जनता अपनी झोली भैरव बाबा के सामने ही फैलाती है। जैसलमेर के किले में लक्ष्मीनाथ जी का भव्य मंदिर विराजमान है, लेकिन किसी भी संकट या बीमारी में वहां के लोग आज भी महारावल गिरध���सिंह जी को ही याद करते हैं।
आपके आस पास भी निश्चित ही ऐसे देवस्थान होंगे, जो बिलकुल अपने से, सहज और भोले लगते होंगे। कभी फुर्सत निकाल कर वहां जाइये, अपनी अंतरात्मा की व्यथा उन्हें सुना कर देखिये, और परम्परा के अनुसार श्रद्धा से एक पान सुपारी ही चढ़ा आइये। यह भारत भूमि है, यहां पता नहीं किस धूल के कण में कौन स�� महाशक्ति छिपी बैठी हो!
॥तन्त्रोक्त उपसंहार॥
बिन गुरु ज्ञान नहीं चाहे पढ़े चारो वेद ...
ज्ञान अर्थात हीं समझ व्यष्टि, समष्टि की....
ज्ञानेऽप्यज्ञा नराः सन्ति, बोधेऽपि भ्रान्तचेतसः।
धर्मेऽप्यधार्मिका लोके, सत्स्वपि पाखण्डिनः॥
ज्ञान होने पर भी अज्ञानी लोग होते हैं, बोध होने पर भी भ्रमित लोग मिलते हैं।
धर्म के ��हते भी अधार्मिक लोग संसार में रहते हैं, और सज्जनों के होते हुए भी पाखंडी मिलते हैं।
कारण बिना गुरु के..... निगुरे...
ग्रंथियों और प्रजनन मार्गों में असामान्य ऊतकों के संचय को दूर करने के लिए कांचनार गुग्गुलु, स्त्री जनन तंत्र के पोषण और हार्मोन संतुलन के लिए मुख्य रसायन शतावरी, तथा आम की शुद्धि और चयापचय मार्गों को अवरोध-मुक्त रखने के लिए रात्रि में त्रिफला का सेवन अनुशंसित है।
तन्त्रोक्त दृष्टिकोण के अनुसार, पीसीओएस केवल एक शारीरिक या हार्मोनल विफलता नहीं है, बल्कि तंत्र शरीर को ऊर्जा का एक संघात मानता है जहाँ स्त्री शरीर में सृजन, विसर्जन और चक्रों का नियंत्रण शक्ति के प्रवाह से होता है। ��गम शास्त्र के अनुसार पीसीओएस वास्तव में स्त्रीत्व की मूल सृजनात्मक ऊर्जा का अवरोध है। इसके समाधान हेतु भैरवयामल तन्त्र और विज्ञान भैरव तन्त्र जैसे आगम ग्रंथों के स्रोत्र और सूत्रों का आश्रय लिया जाता है। आगम का परम सूत्र कहता है कि "यत्र शक्तिः प्रलीयेत तत्र व्याधिः प्रजायते" अर्थात् जहाँ शक्ति का प्रवाह रुककर विलीन होने लगता है, वहीं व्याधि का जन्म होता है। जब एक स्त्री निरंतर मानसिक आघात, असुरक्षा, या पुरुष-प्रधान ऊर्जा के अति-दबाव में जीती है, तो उसका स्वाधिष्ठान चक्र और अपान वायु पूरी तरह स्तंभित हो जाते हैं। जब एक स्त्री अपनी भावनाओं जैसे क्रोध, दुःख या आघात का दमन करती है, तब मानसिक आम उत्पन्न होता है। ऊर्जा स्तर पर जब शरीर मुक्त करना या छोड़ना बंद कर देता है, तो भौतिक स्तर पर वह रुके हुए मासिक चक्र और डिम्बग्रंथि में फंसी हुई पुटिकाओं के रूप में प्रकट होता है। इस ऊर्जाव��न गतिरोध को तोड़ने के लिए आगम ग्र��्थ वर्णित सिद्ध कल्पवल्ली स्तोत्र या त्रिपुरसुन्दरी अष्टकम् के उन विशिष्ट श्लोकों का संपुट के साथ पाठ किया जाता है जो गर्भाशय की चेतना को जाग्रत करते हैं। इस स्तोत्र साधना के साथ जब ह्रीं और वं बीज मन्त्रों का गर्भाशय केंद्र पर ध्यान करते हुए जप किया जाता है, तो वर्षों से जमी हुई भावनात्मक जड़ता और मानसिक आम पिघलने लगते हैं। इसके व्यावहारिक अभ्यासों में प्रतिदिन १५-२० मिनट योनि मुद्रा और अपान मुद्रा का अभ्यास किया जाता है जो प्राण शक्ति को सीधे गर्भाशय की ओर मोड़कर दमित भावनाओं को मुक्त करता है। स्वाधिष्ठान चक्र पर ध्यान केंद्रित करते हुए वं बीज मंत्र का गहरा उच्चारण रूपी नाद अनुसंधान अवरुद्ध स्रोतों को सूक्ष्म स्तर पर झंकृत करके खोलता है। इसके अतिरिक्त तान्त्रिक भू-स्पर्श के माध्यम से नंगे पैर मिट्टी पर चलकर या मलासन में बैठकर गर्भाशय के तनाव और संचित भय को पृथ्वी माता ��ें समाहित करने की भावना की जाती है। ��ंततः भावनात्मक रेचन द्वारा शरीर को सुरक्षा का अहसास कराकर दमित भय और नियंत्रण की अति-प्रवृत्ति को ध्यान या नृत्य के माध्यम से बाहर निकलने दिया जाता है, जिससे शरीर सुरक्षित अनुभव करता है और दमित पुटिकाएँ विसर्जित होने के लिए स्वतंत्र हो जाती हैं।
इस समग्र चिकित्सा का सबसे महत्वपूर्ण आयाम भविष्य में माता-पिता बनने वाले दंपत्तियों के लिए गर्भ संसाधन/गर्भ संस्कार की अनिवार्यता से जुड़ता है। वर्तमान युग में PCOS से पीड़ित स्त्रियाँ केवल किसी प्रकार गर्भधारण करने को ही अपनी अंतिम विजय मान लेती हैं, जो कि एक अत्यंत संकुचित दृष्टिकोण है। आगम और आयुर्वेद दोनों घोषणा करते हैं कि अशुद्ध आर्तव और असंतुलित बीज दोष के साथ यदि गर्भधारण हो भी जाए, तो आने वाली संतान में वही शारीरिक और मानसिक व्याधियाँ स्थानांतरित हो जाती हैं। इसलिए दंपत्तियों के लिए गर्भाधान से पूर्व गर्भ संसाधन अर्थात् गर्भाशय, शुक्र और आर्तव का पूर्ण शुद्धिकरण अत्यंत आवश्यक है। यह केवल एक शारीरिक डिटॉक्स नहीं है, बल्कि यह ��क दिव्य अनुष्ठान है जिसमें पति और पत्नी दोनों अपने संचित कर्मों, मानसिक विकारों और शारीरिक दोषों का शोधन करते हैं। आगम के अनुसार गर्भाशय केवल मांस का पिंड नहीं है, वह एक ब्रह्मांडीय वेदी है जहाँ एक नई आत्मा का अवतरण होना है। यदि वह वेदी PCOS के कफ, मेद और अवरुद्ध अपान से दूषित है, तो वहाँ आने वाली चेतना भी रुग्ण होगी। गर्भ संसाधन के अंतर्गत दंपत्ति पंचकर्म के माध्यम से शरीर को शुद्ध करते हैं और आ��म स्तोत्रों के स्पंदन से अपनी आनुवंशिक कोडिंग को पुनर्गठित करते हैं। जब होने वाले माता-पिता इस साधना से अपनी ऊर्जा को उर्ध्वगामी कर लेते हैं, तब जो जीव गर्भ में आता है वह ओजस्वी, तेजस्वी और पूर्णतः स्वस्थ होता है। अतः PCOS से मुक्ति केवल एक व्यक्तिगत आरोग्य नहीं है, बल्कि यह गर्भ संसाधन के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के कल्याण और एक प्रबुद्ध समाज के निर्माण का महत अनुष्ठान है। यह लेख चरक संहिता और तन्त्र विज्ञान के गूढ़ सिद्धांतों पर आधारित है!
प्रत्येक व्यक्ति की अपनी एक विशिष्ट प्रकृति और ऊर्जा संरचना होती है, अतः किसी भी बड़े आहार, औषधि या साधना संबंधी परिवर्तन को करने से पूर्व सुयोग्य दीर्घ अनुभवी आयुर्वेदिक-योग-तन्त्र विशेषज्ञ से परामर्श लें!
जागतिक प्रसारित PCOS पूर्णतः ठीक इसलिए नहीं हो रहा क्योंकि आधुनिक जगत में इस व्याधि को मात्र एक शारीरिक या अंतःस्रावी अंतर्विरोध म��न लिया गया है। सनातन आयुर्वेद और आगम तन्त्र के अनुसार यह समस्या कहीं अधिक गहरे ऊर्जावान और आध्यात्मिक धरातल पर अवस्थित है। प्रतिवर्ष, लाखों महिलाएँ एक ही निदान से गुज़रती हैं—पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम। अनियमित मासिक चक्र, हार्मोनल असंतुलन, ऐसा भार जो घटने का नाम नहीं लेता, उन स्थानों पर अनचाहे बाल जहाँ उन्हें नहीं होना चाहिए, और सिर के उन बालों का झड़ना जिन्हें बने रहना चाहिए। इसके बा��� की रूढ़ि��ादी चिकित्सा भी निश्चित है—गर्भनिरोधक गोलियाँ, मेटफॉर्मिन और यह निर्देश कि तीन महीने बाद पुनः जाँच कराएं। इस स्थूल दृष्टिकोण में इस बात का कोई स्पष्टीकरण या बोध नहीं दिया जाता कि शरीर इस विद्रूपता या स्थिति तक पहुँचा कैसे। हार्मोनल आँकड़ों के पीछे वास्तव में क्या घटित हो रहा है, इसका कोई मौलिक ढाँचा नहीं बताया जाता। इसके विपरीत, सनातन आयुर्वेद के पास इसका एक सुस्पष्ट ढाँचा था। यद्यपि उस��ें पीसीओएस शब्द का प्रयोग नहीं था—किंतु जिस व्याधि का वहाँ वर्णन है, जिस कार्यप्रणाली की पहचान की गई है, और जिस चिकित्सा पद्धति की अनुशंसा की गई है, वह आधुनिक पीसीओएस से इतनी अचूकता से मेल खाती है कि उसे अनदेखा करना असंभव है।
शास्त्रों में वर्णित सत्य के अनुसार, आयुर्वेद के प्रामाणिक ग्रंथों जैसे चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदयम में स्त्री जनन तंत्र का संचालन आर्तव धातु और अपान ��ायु नामक एक क्रियात्मक शक्ति द्वारा होता है। अपान वायु वह अधोग���मी ऊर्जा है जो शरीर से मलोत्सर्ग और प्रजनन क्रियाओं को नियंत्रित करती है। चरक संहिता में स्त्री जनन अंगों के विकारों को योनिव्यापद कहा गया है। सुश्रुत संहिता में आर्तव क्षय, अर्थात् मासिक स्राव की कमी या अवरोध का सविस्तार वर्णन है, जिसकी उत्पत्ति कफ और वात दोष की अधिकता तथा मेद धातु के संचय से होती है। यही दोष-संयोग आधुनिक विज्ञान के पीसीओएस का हूबहू शास्त्रीय विवरण है। आयुर्वेद के अनुसा�� इसकी कार्यप्रणाली को समझाते हुए महर्षि वाग्भट वर्णन करते हैं कि आर्तव का निर्माण सप्तधातु पोषण शृंखला का अंतिम उत्पाद है, जो पित्त के प्रभाव में रक्त धातु के उपधातु के रूप में बनता है। जब इस शृंखला में ऊपर ही—मंदाग्नि, आम के संचय, कफ द्वारा स्रोतों के अवरोध, या असंतुलित वात के कारण विघ्न पड़ता है, तो सबसे पहली क्षति आर्तव निर्माण को होती है। मासिक धर्म की अनियमितता स्वयं में समस्या नहीं है; ��ह तो केवल चयापचय विफलता का एक प्रत्यक्ष लक्षण है। वाग्भट ने स्पष्ट उल्लेख किया है कि जब कफ और मेद आर्तववह स्रोतों में जमा हो जाते हैं, तो वे आर्तव के मार्ग को भौतिक रूप से अवरुद्ध कर देते हैं। अल्ट्रासाउंड में दिखने वाली सिस्ट वास्तव में इसी शारीरिक अवरोध का दृश्य रूप हैं।
ग्रंथों के अनुसार इसके लक्षण और संकेत अत्यंत सुस्पष्ट हैं, जिनमें अनियमित, विलंबित या लुप्त मासिक चक्र, अतिरोमन अर्थात् अप्राकृतिक स्थानों पर अत्यधिक और असामान्य बालों का उगना, कठिन प्रयासों के बाद भी वज़न का न बढ़ना, चयापचय में भारीपन व सुस्ती, त्वचा में तैलीयपन या मुंहासे और गर्भधार�� में कठिनाई शामिल हैं। यह सब संपूर्ण तंत्र में कफ गुणों की प्रधानता—शीतलता, भारीपन, मंदता और गीलेपन को दर्शाता है। इसके मूल कारणों का ढाँचा भी पूर्णतः सुसंगत है, जिसमें कफ-प्रकोपक आहार जैसे भारी, मीठे, ठंडे और प्रसंस्कृत भोजन का दीर्घकालिक सेवन मुख्य है। इसके साथ ही शारीरिक निष्क्रियता और दिवास्वप्न, जिसे महर्षि चरक कफ और मेद की वृद्धि का अचूक कारण मानते हैं, तथा प्राकृतिक वेगों का अवरोध, व��शेषकर मानसिक तनाव, भावनात्मक दमन या शरीर की प्राकृतिक लय की उपेक्षा करके अपान वायु के प्रवाह को रोकना इसके बड़े कारण हैं। इसके अतिरिक्त बीज दोष, जिसे आनुवंशिक या वंशानुगत संवेदनशीलता कहते हैं, भी महत्वपूर्ण है। आधुनिक अंतःस्रावी विज्ञान भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचा है जिसे वह इंसुलिन प्रतिरोध, क्रोनिक लो-ग्रेड इन्फ्लेमेशन और हाइपोथैलेमिक-पिट्यूटरी व्यवधान कहता है; भाषा भिन्न है, किंतु सत्य वही है। शास्त्रीय आयुर्वेदिक उपचार इस पर एक साथ कार्य करता है, ���िसमें कफ को शांत करने और वाहिकाओं से मेद को हटाने के लिए रुक्ष एवं लघु आहार जैसे हल्का, सूखा और सुपाच्य भोजन दिया जाता है। चयापचय को गति देने के लिए प्रतिदिन नियमित व्यायाम को सर्वोपरि रखा गया है। इसके साथ ही
जो अत्यंत सन्निकटहै, प्रायः वही हमारी दृष्टि से ओझल रह जाता है। यह चैतन्य सत्ता न तो कोलाहल करती है और न ही स्वयं की प्रमाणिकता हेतु कोई बाह्य यत्न; यह तो प्��त्येक श्वा�� की गति, हृदय के स्पंदन और उस अनंत शून्य अंतराल में व्याप्त है जिसे हम रिक्त समझते हैं। हमारी विडंबना यह है कि हम उस अगम/ इंद्रियों से परे को किसी विशिष्ट स्वरूप, चमत्कार या अलौकिक घटना में अन्वेषित करते हैं, जबकि वह तो प्राकृत में ही अप्राकृत होकर विराजमान है, नूतन सूर्य की प्रथम किरण में, किसी अपरिचित की निश्छल मुस्कान में और अंतर्मन में उमड़ती उस नैसर्गिक शांति में। वह परम तत्व इतना पावन है कि हमारी संकुचित शर्तों में नहीं बंधता और इतना भव्य है कि मानवीय परिभाषाओं में नहीं समाता। जब वह सत्ता सखा रूप धारण करती है, तो जीव को उसके ही पूर्णत्व से साक्षात् करा देती है। वास्तव में, जीवन का माधुर्य तभी प्रस्फुटित होता है जब हम अन्वेषण त्यागकर अनुभूति का आश्रय लेते हैं और ग्रहणाधिकार छोड़कर सरिता के समान प्रवाहित होने लगते हैं। अगम स्तोत्र के भावों के अनुरूप, उस परमात्मा को अनुभव करन�� हेतु किसी कर्मकांड की नहीं, अपितु केवल किंचित विश्राम और मानसिक स्थिरता की आवश्यकता है। जब हम ठहर जाते हैं, तो प्रत्येक आती जाती श्वास प्रेम के रस से आप्लावित जान पड़ती है।
हे अनंत! मेरी अल्प बुद्धि आपके इस विराट अस्तित्व को शब्दों में बांधने में अक्षम है, क्योंकि आप तो अगणित रूपों, भावों और क्रियाओं में आदि अंत से रहित केवल आप ही हैं। ऐसे सर्वव्यापी चैतन्य पर संशय का कोई स्थान ही कहाँ शेष रहता है?
वे समस्त परंपराएँ, गुरु और शिक्षक जो यह सिखाते हैं कि आत्म-साक्षात्कार या व्यक्तिगत मुक्ति प्राप्य है, वे अज्ञानी हैं और अनजाने में जिज्ञासुओं को पथभ्रष्ट कर रहे हैं!
क्योंकि कोई ��्यक्तिगत आत्म (स्व) है ही नहीं जो मुक्त हो सके। यहाँ केवल एक शरीर, मस्तिष्क और चित्त का अस्तित्व है, किंतु कोई पृथक व्यक्तिगत मैं नहीं है।
यह व्यक्तिगत आत्म, जिसे हम मैं के रूप में अनुभव करते हैं और जिसके मूल में मैं हूँ का भाव है, वह मात्र मस्तिष्क द्वारा निर्मित एक मतिभ्रम है। यह भ्रम जैव-वैज्ञानिक उत्तरजीविता, वंश-वृद्धि और आधिपत्य की प्रवृत्तियों को सुदृढ़ करने के लिए ही विकसित हुआ है।
प्��त्येक रात्रि, प्रगाढ़ सुषुप्ति/स्वप्नहीन निद्रा में मस्तिष्क इस मैं के भ्रम को निर्मित करना बंद कर देता है, और पुनः स्वप्न तथा जाग्रत अवस्था में इसका पुनर्निर्माण कर लेता है।
मुक्ति केवल वह अवस्था है जब मस्तिष्क इस मैं या अहम् के भाव को उत्पन्न करना सदा के लिए बंद कर देता है। किंतु, उस स्थिति में न तो कोई व्यक्ति मुक्त हुआ और न ही अपनी अनुपस्थिति का आनंद लेने के लिए कोई स्व शेष बचा!
विज्ञान भ��रव तन्त्र का यह सूत्र दृष्टव्य है, जो स्पष्ट करता है कि धारणाओं और विकल्पों से परे का शून्य ही वास्तविक सत्य है,
वियद्व्यापी विमुक्त��त्मा देशकालकलनात्पृथक्।
अव्यपदेश्यो यः कश्चित् स सत्यं विद्धि भैरवः॥
जो तत्व आकाश की भाँति सर्वव्यापी है, देश और काल की सीमाओं से सर्वथा मुक्त है, और जिसका किसी नाम, रूप या मैं के द्वारा निरूपण नहीं किया जा सकता वही वास्तविक सत्य है, वही भैरव स्वरूप है। अतः जहाँ कोई पृथक व्यक्ति या स्व शेष नहीं रहता, वही वास्तविक ज्ञान है!
SM पर जगह जगह अला फला रेहड़ी लगाते ज्योतिषाचार्य/मंत्राचार्य/यंत्राचार्य/वास्तु आचार्य/अनन्याचार्य 'गहन साइंटिफिक रिसर्च' कर अब काली भैरव संग 64 योगिनी/दश महाविद्याओं को भी घंटों में सिद्ध करने का चूरन चाट धड़ल्ले से बेच रहे! साथ साथ ��नलाइन शक्तिपात रेमेडी पूजा सेवा भी उपलब्ध है!
जूना अखाड़े का वह शौर्य, जो कभी सनातन की ढाल बनकर खड़ा था, आज राजनैतिक फ्रेम की पृष्ठभूमि मात्र बनकर रह गया है जो सलंग्न चित्र इस कड़वे सच का प्रमाण हैं कि जिस सत्ता को कभी संन्यासी मार्ग दिखाया करते थे, आज उसी सत्ता के गलियारों में धर्म-दंड गिरवी रख दिया गया है। आदि शंकराचार्य ��ी वह अजेय नागा परंपरा, जिसने कभी शस्त्र और शास्त्र के बल पर धर्म की रक्षा की, आज सरकारी अनुदानों और 'फोटो-ओप' की मोहताज है। यह वैराग्य का पतन नहीं तो और क्या है कि हिमालय की कंदराओं में तपने वाले तपस्वी अब एयर-कंडीशन और राजनेताओं की चरण वंदना में अपना गौरव ढूंढ रहे हैं। संस्थागत ढांचा इतना भारी हो गया है कि उसकी आत्मा दब चुकी है; अब यहाँ धर्म की रक्षा नहीं, बल्कि पद और प्रतिष्ठा की राजनीति का खेल चल रहा है। यह स्थिति उस संस्थागत ह्रास और मौलिक ऊर्जा के क्षरण का जीवंत उदाहरण है जिसे सुधारने के लिए अब केवल अनुभव आधारित और साहसी विजन ही काम आ सकता है। जब आध्यात्मिक नेतृत्व कुर्सी के सामने झुकने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि वह 'अजेय' अखाड़ा अब केवल एक सरकारी विभाग की विस्तार शाखा बनकर रह गया है। यह समझौता उस गरिमा की हत्या है जिसे सदियों के तप से सींचा गया था।