Student always,MBA, NET,Ex. Banker.
Have a wide range of interests spanning world cinema, environment and ecology and contemporary world history & politics.
बचपन से एक गाना मुझे बहुत पसंद है-
"पंछी, नदियाँ, पवन के झोंके, कोई सरहद ना इन्हें रोके"।
जावेद अख़्तर द्वारा लिखा गया ये गाना 'रिफ्यूजी' फिल्म से है। फिल्म तो खैर उस दौर में खास चली नहीं, पर इस फिल्म का music कमाल का था। और ये गाना कालजयी रहा।
कोई भी रचना *कालजयी* कब बनती है?
जब वो प्रकृति के नियमों के अनुकूल हो, और उनको अपने आप में *express* करती हो।
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हमारे दो पड़ोसी देश - चीन और पाकिस्तान के साथ हमारा सीमा विवाद है। और इस विवाद में *सिंधु जलतंत्र* और *ब्रह्मपुत्र जलतंत्र* दोनों ही शामिल हैं।
बड़े-बड़े experts इस मामले पर अपनी सलाह देते हैं, पर वो nature का basic *सिद्धांत* भूल जाते हैं:
कोई भी समझौता प्रकृति के विरुद्ध जाकर कभी भी सफल नहीं हो सकता।
ये बहुत व्यावहारिक सी बात है, जो हम समझ नहीं पा रहे।
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चीन ब्रह्मपुत्र नदी पर बड़े-बड़े बाँध बना रहा है, जिसकी वजह से इसके प्रवाह तंत्र में seasonal changes आ रहे हैं।
भारत का यहाँ पर जो stand है, वो व्यावहारिक है, कि नदी के प्रवाह तंत्र को उसके natural form में बहने दिया जाए।
हमें ये फ़िक्र रहती है कि कहीं एक *water bomb* के रूप में चीन भारत के खिलाफ इसका इस्तेमाल न कर ले।
पर सच्चाई ये है कि ब्रह्मपुत्र चीन के area में बहती ज़रूर है, लंबी दूरी भी तय करती है, पर उसका ज्यादातर पानी का *प्रवाह* भारत में ही बनता है।
और यही एक नदी के जलतंत्र का नियम है -कि उसका *origin* किस स्थान से होता है, ये बहुत महत्वपूर्ण नहीं होता। उसका *प्रवाह तंत्र* अपने आप में महत्वपूर्ण होता है।
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पिछले कुछ एक-दो वर्षों में भारत ने भी सिंधु नदी को लेकर यही रुख पाकिस्तान के खिलाफ अपनाया है, और *Indus Water Treaty* को ताक पर रख दिया है।
बहुत से experts इस बात को masterstroke बता रहे हैं, और खुलकर इसका समर्थन कर रहे हैं। जबकि कोई भी दसवीं क्लास का geography का छात्र भी बता देगा कि ये *व्यावहारिक* नहीं है, ये हो ही नहीं सकता किसी भी तरह से।
जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और नॉर्थ-ईस्ट में अरुणाचल प्रदेश, असम - जितने भी पहाड़ी राज्यों से नदियाँ निकलती हैं और मैदानी इलाकों को सींचती हैं...
गंगा-यमुना का मैदान, सिंधु का मैदान, ब्रह्मपुत्र का मैदान - ये भारत ही नहीं, दुनिया की *breadbasket* रहे हैं सदियों से।
पर अगर पहाड़ी राज्य यही लॉजिक लगाते कि "हमारा पानी हमारे पास रहेगा", तो सोचिए क्या होता?
क्या ये possible है? क्या नदियों के प्रवाह को रोकना possible है?
अगर ऐसा हो पाता, तो न आज पहाड़ बसते, न मैदान बसते।
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एक बार को हम मान भी लें कि सिंधु जल तंत्र का कुछ हिस्सा भारत अपनी तरफ *divert* कर भी ले...
तो भी क्या ये पूरा समझौता भारत के पक्ष में होगा? इसके *दूरगामी* effects क्या होंगे?
सिंधु जो अरब सागर में गिरती है, क्या उसका *ecosystem* पर जो असर होगा, वो गुजरात तक नहीं आएगा? क्या भारत अरब सागर के साथ अपनी सीमा साझा नहीं करता है?
भारतवर्ष की सबसे पुरानी सभ्यता -*सिंधु घाटी सभ्यता* जिस इलाके में पनपी, वो आज का पाकिस्तान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र... यही इलाका है।
और यहीं पर आगे चलकर हमारी *वैदिक संस्कृति* पनपी।
वक्त के साथ कुछ लोगों ने इस पर लकीरें खींचकर अलग देश बना दिए।
तो क्या प्रकृति भी उससे बंट गई?
क्या पूरा ecosystem भी उसके हिसाब से अपने आप को ढाल लेगा?
हम इंसान अपने हिसाब से प्रकृति को नहीं मोड़ सकते।
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भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में है जिन पर प्रकृति की बड़ी मेहरबानी है,हिमालय से निकलने वाली नदियाँ, गंगा-यमुना का मैदान, थार का रेगिस्तान, और-मानसून जो अपने आप में एक अजूबा है।
फिर भी भारत के कई इलाकों में water scarcity बड़े लेवल पर है।
तो क्या ये प्रकृति ने किया है- बिल्कुल नहीं।
ये हमारे कुछ राजनीतिक निर्णयों का परिणाम है।
सतलुज-यमुना लिंक नहर (SYL)- जिसका पानी न सिर्फ हरियाणा को सींचता बल्कि राजस्थान तक जाता-पंजाब के लोगों को ये एहसास करवाया गया कि "ये आपका पानी है"।
तो क्या पंजाब के लोग इसके खिलाफ हैं? बिल्कुल नहीं।
कौन आम भारतीय ये चाहेगा कि उसके पड़ोस के लोग सूखे से मरें और उसके यहाँ जलभराव की समस्या रहे?
हरियाणा-पंजाब के कुछ इलाकों में आप देखेंगे- excess of water के कारण भूजल इतना ऊपर आ गया है कि वहाँ खेती possible नहीं है।
वहीं उससे सिर्फ 100-150 किलोमीटर आगे जाएँ, तो दक्षिण हरियाणा और राजस्थान के इलाकों में * धरती के 1000 फीट नीचे भी भूजल नहीं है।*
तो ये क्या पानी का mismanagement नहीं है?
सिर्फ तुच्छ राजनीति के कारण दोनों तरफ के लोग इतना बड़ा दंड भुगत रहे हैं,जो कि प्रकृति के बिल्कुल खिलाफ है।
"Rebellious Haryana"
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आमतौर पर जब हम हिमाचल या उत्तराखंड के किसी हिल स्टेशन पर जाते हैं, तो कुछ नज़ारे सामान्य होते हैं: हरियाणा के लोगों से जुड़ा रोड रेज और कुछ ऐसी व्यवहारिक हरकतें जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी या एक सभ्य इंसान के आचरण से मेल नहीं खातीं।
लोग हैरान होते हैं कि ऐसा क्यों है। इसके बारे में पक्के तौर पर तो नहीं कहा जा सकता,
लेकिन एक वजह -हरियाणा के लोगों की जीवनशैली और उनका इतिहास है, जिसने उन्हें इतना मुखर बना दिया है।
इसके पीछे अपना एक इतिहास है। आइए उसे समझते हैं।
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14 जनवरी, 1761, पानीपत का मैदान। एक तरफ अब्दाली की सेना थी, दूसरी तरफ मराठों की।
उत्तर भारत में कड़ाके की सर्दी का मौसम था।
हड्डियों को चीर देने वाली ठंड थी। यह वो मंजर है जिसे कमोबेश हम सब जानते हैं, जो इतिहास की किताबों में लिखा गया है।लेकिन जो हम नहीं जानते, वो है इसके पीछे की कहानी, जो किताबों में भी नहीं बताई गई है और जो इस इलाके के उस इतिहास को दर्शाती है जो हमसे दूर है।
पानीपत के युद्ध से पहले, करीब एक साल तक मराठों और अब्दाली की सेनाओं ने इस इलाके में अपना जमावड़ा शुरू किया था। एक-दूसरे को हराने के लिए strategic location ढूंढना, एक-दूसरे की चाल का पता लगाना, इन सब में वक्त लगता था।
उस दौर में भारी-भरकम लाव-लश्कर को लाना आसान नहीं था।मराठे महाराष्ट्र से चलकर आए थे, और उनके लाव-लश्कर में औरतें, बच्चे, गाने वाले, करीब दो से तीन लाख घोड़े, पशु और बहुत सा सहायक स्टाफ था।
दूसरी ओर अब्दाली की सेना भी लगभग 90,000 के आसपास थी, जिसमें घोड़े और उसकी मदद के लिए सेवक थे। आखिरकार दोनों तरफ की इतनी भारी-भरकम सेनाएं हरियाणा में एक-दूसरे के सामने आकर डट गईं और यहाँ महीनों तक जमावड़ा लगाए रहीं।
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अब आप उस वक्त हरियाणा की संरचना समझिए। उस समय हरियाणा एक कृषि प्रधान समाज था। कृषि और पशुपालन ही यहाँ के दो मुख्य उद्योग थे।
आम लोग गाँव की गोचर भूमि में पशुपालन करते थे और जो ज़मीन बचती थी उस पर खेती करते थे। हमारे संसाधन अपनी ज़रूरतों के हिसाब से ही पैदा किए जाते थे। निर्यात की अवधारणा लगभग नहीं थी, और फसल मोटे तौर पर मानसून पर निर्भर थी।
सिंचाई की सुविधा का तब कोई प्रावधान नहीं था।
अब एक छोटे से इलाके में करीब एक साल से दोनों तरफ के 8 से 10 लाख इंसान, घोड़े, बैल रुके हुए थे।
पशुओं लिए चारा और आम लोगों के लिए खाना चाहिए था। और उस दौर के हिसाब से, सेनाएं चारे या अनाज के बदले आम लोगों को उचित मेहनताना देना ज़रूरी नहीं समझती थीं, क्योंकि संसाधन सीमित थे। सेनाओं का अपना तरीका था: जहाँ से जो मिला, उठा लिया।
एक समय ऐसा आया कि आखिर में पेड़ों पर खाने के लिए पत्तियाँ तक नहीं बचीं।
आखिरी वक्त तक यह पूरा इलाका खाली हो गया। लोग यहाँ से पलायन कर गए। ज्यादातर भूख से मर गए उनके अलावा, जो बचे उन्होंने कहीं दूर सुरक्षित जगह पर अपना आशियाना ढूंढ लिया।
तो इस लड़ाई का सबसे ज़्यादा दंश हरियाणा के लोगों ने झेला।
ये सिलसिला हरियाणा के लिए नया नहीं था, कुछ दशकों के अंतराल पर, सदियों तक हरियाणा में होता रहा।
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पानीपत की तीसरी लड़ाई के बाद हरियाणा वीरान हो गया था। मराठों और अब्दाली की वजह से हमारे साथ जो हालात हुए, वो आज भी हमारे गाँव की कहानियों में दिख जाएंगे।
फिर भी ऐसा क्या है कि हरियाणा का नागरिक कभी किसी से शिकायत नहीं करता? गुरुग्राम, दिल्ली, फरीदाबाद में देश के हर हिस्से और दूसरे देशों के लोग काम करते हैं, पर हम कभी भेदभाव की बात नहीं करते।
हम हरियाणा की अस्मिता की बात नहीं करते, जैसा कि अक्सर महाराष्ट्र, कर्नाटक या बाकी राज्यों में हो जाता है।
एक बात जो हमें दूसरों से अलग करती है वो यह है कि हमारे यहाँ कभी कोई राजा नहीं रहा। हमने कभी किसी की स्तुति नहीं की।
दूसरे राज्यों में राजाओं ने अपने हिसाब से अपना इतिहास लिखा, और आज हर राज्य का अपना एक नायक है जिसके खिलाफ वो कुछ सुनना नहीं चाहते, चाहे उसने जो भी किया हो।
हरियाणा में मराठों ने चौथ वसूली, जिस पर उनका कोई हक नहीं था। वहीं सिख राजाओं ने भी अपने हिसाब से कर वसूला। मुगलों ने,और लुटेरों ने हमसे कुछ न कुछ लिया।
लेकिन आज हममें बदले की भावना नहीं दिखती। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि हमारे यहाँ सभी नायक थे।
हमने किसी एक इंसान को नायक नहीं बनाया। आने वालों से हम मिलकर लड़े, मिलकर कुर्बानियाँ दीं, और उसका एक प्रतिबिंब आज के समाज में भी दिखता है: हमें किसी से नफरत नहीं है। जो वक्त था, वो गुजर गया। आज हम अपने आप से खुश हैं क्योंकि बहादुरी यहाँ हर नागरिक में है।
बाकी राज्यों के लोगों को भी ये समझना होगा,अगर हम सभी अपने-अपने पुराने किस्से लेकर बैठेंगे तो आज के भारत में रहना मुश्किल हो जाएगा।
The main difference between India and Pakistan lies in our Constitution and its democratic values.
If we abandon our Constitution and democratic values and start acting on the basis of religion, then what difference will remain between India and Pakistan?
So we should respect our Constitution and its democratic values.
This is why we do not support a police state or police encounters across states.
It is the court's duty to punish offenders, and that must happen through due process.
A passport is issued by the Ministry of External Affairs based on existing nationality documents, like Aadhaar Card or Voter ID Card in India.
So how can it be said that a passport is not a document of nationality?
In foreign countries, an Indian travel passport is the only valid document that proves Indian nationality.
This is the rubbish argument by MEA.
Context of court was different.
@apnarajeevnigam अच्छा है, अब जबकि मैं भारतीय नागरिक नहीं रहा,
तो बाकी देशों की नागरिकता लेने मे आसानी होगी।
वो भेदभाव नहीं झेलना पड़ेगा जो भारतीयों के साथ होता है विदेश में।
अब तक हालात ये थे कि दुनिया के कई देशों में भारतीयों को शक की नज़र से देखा जाता था।
अमेरिका ने H-1B वीजा और इमिग्रेशन पर सख्ती की, और यूरोप ने भारतीय प्रवास से जुड़े मुद्दों को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए।
अब भारत सरकार ने खुद कह दिया है कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, और आज भारत में कोई भी एक दस्तावेज़ ऐसा नहीं है जो नागरिकता साबित कर सके।
अब हम अपने ही देश में पराए हो गए।
यही है राम राज्य।
@NalinisKitchen Absolutely right,
Crime committed by Individuals must not be linked with gender, castecolour creed.
It is hard fact that in most of the cases women and children are victims but despite all this we don't want to accept it.
@vivekguptaa My opinion is quite opposite-
Never choose a nationalists part.
A party with nationalistic approach can never be patriotic and will ultimately suppress freedom of speech.