@nemo_rao Unfortunately urban roads are now anything but safe. Yes, villages and distant parts of sone smaller towns would or may still offer you a safe environment to ride on your bicycle. I feel guilty that we couldn't allow our children to ride a bicycle on Noida roads in nineties.
https://t.co/m22vzZvoT4
"Exceptions In reckoning Are Disasters In Making"
आज की रचना अंतर्मन का आर्तनाद है,
बिना किसी, औपचारिक, प्रस्तावना के,
यदि इस का मर्म आप के दिल को छुए,
तो बतलाइएगा आप का क्या इरादा है ?
सविनय,
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नितिन
"अपवादों की जय, माने, मानवीय विश्वास की पराजय"
एक समय रहा, जब बाबा भारती, के घोड़े को, डाकू,
खड़ग सिंह ने, अपाहिज का रूप धर, कब्जाया रहा,
तब बाबा ने उस डाकू को पुकारा हुआ घोड़ा तुम्हारा,
पर इस घटना को, किसी से ना कहना ये बताया रहा,
वो दस्यु, समझ ना पाया, क्या रहा बाबा का प्रयोजन,
बोला, कहने या न कहने से अब क्या खोयापाया रहा,
सुनो खडग सिंह जो ये घटना के बारे में सब जान गए,
कोई गरीब पर विश्वास नहीं करेगा, यह समझाया रहा,
यह बात उस डाकू को समझ आई और कचोटने लगी,
ग्लानि भरे मन से, उस ने घोड़ा उसी रात लौटाया रहा,
एक समय रहा, जब ऐसी ही सोच रही, हम लोगन की,
अपवादों को हवा न दे अतीत में था जाता सुलाया रहा,
आज खबरों का नाम अपवाद है, उसी से रोज़ी रोटी है,
आज तो होड़ है लगी के सबसे पहले कौन बताया रहा,
सौ में से एक या दो लड़कियां ही सनम से बेवफ़ा होंगी,
पर इन्हें तो सौ की सौ में दिखता, इन ही का साया रहा,
माना एक मछली करे गंदा उसे, पर दुनिया तालाब नहीं,
अब हरेक ललना, ऐसी ही होगी, मन क्यूं भरमाया रहा,
अपवादों से अखबार चलते हैं, इन से वो खूब बिकते हैं,
हम मुंह मोड़ लें देखिए इनका क्या गया क्या आया रहा.
अपवाद, जब हो जाएं साधारण, तब भय का राज होता है,
बीमा बढ़े, चौकसी बढ़े, बढ़ता सावधानी का, सरमाया रहा,
सनसनीखेज खबरों को, कभी चटकारे ले कर मत पढ़िए, ये,
रोमांचित नहीं, भयभीत करें, सदा मनहूस, इन का साया रहा,
हम ने ऐसी खबरों को देख जितना टीआरपी को बढ़ाया रहा,
इन अक्ल से पैदल, लोगों ने, भरोसे को सूली पर चढ़ाया रहा,
आइए बच्चों के उज्ज्वल भविष्य हेतु, भरोसे की, फसल लगाएं,
अपवादों के सूद को कर सिरे से ख़ारिज, प्रेम का असल लगायें.
~ नितिन जोधपुरी 'छीण'
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#सोनम #sonam
#केतन #ketan
#सनसनी #Sensation
#अपवाद #Exceptions
#साधारण #Normal
कितने लोग, किसी बहुमंजिला इमारत में, सबसे पहले,
अग्नि सुरक्षा का प्रबंधन और वैकल्पिक रास्ते देखते हैं,
जब हम ये नहीं करते, क्या अधिकार है, हमे बोलने का,
हम शरीक-ए-गुनाह हैं, क्या हक़ है हमें उन्हें तोलने का,
रातों रात, अमीर होने की बातें, अब, पुरानी हो चुकी हैं,
इंसानी लालच आज सारी सीमाओं के पार जा चुका है,
परंतु, स्वयं अविवेकी कर्मों में डूबा, समझ नहीं पाता है,
उधार में ली गई रकम से, कब किसी का उधार चुका है.
अब भी समय है, सफाई अभियान, अपने घर से शुरू करें,
आप सुरक्षित तो सभी सुरक्षित, के दर्शन को, स्वीकार करें,
आप स्वयं सहाय तो प्रभु सहाय की राह पर कदम बढ़ाकर,
इस चीख पुकार में, छुपे खोखले सत्य का, साक्षात्कार करें,
~ नितिन जोधपुरी 'छीण'
https://t.co/YQDDWFTaDH
"हम अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ कर जीवनयापन नहीं कर सकते"
शहरी इमारतों में, खासकर किन्हीं व्यावसायिक उपयोग में लाई जा रही इमारतों में, विशेषतः इस वर्ष कई जगह आग लगने की अनेक घटनाओं के चलते, कई सारे लोगों की असमय मृत्यु होने के समाचार लगातार मिल रहे हैं।
दुःख की बात ये भी है कि ये सभी या इन में से अधिकांश युवा वर्ग से हैं या वैसे किसी भी उम्र के रहे हों, वो इन परिस्थितियों में अपनी मृत्यु को प्राप्त होंगे ये किसी ने भी नहीं सोचा होगा।
परंतु ऐसे हर हादसे या दुर्घटना के बाद हमारा तंत्र बेहद चुस्ती से कार्यरत हो जाता है, आम तौर पर, दुर्घटना के कारणों का पता लगाने और उन्हें दूर करने के लिए ताकि ऐसी विभीषिकाएं दोबारा ना हों ?
अरे नहीं साहब, ऐसा कुछ नहीं होता, हमारा तंत्र तो बड़ी ही मुस्तैदी से, जिसे या जिन्हें इस घटना के लिए ज़िम्मेदार ठहराकर इस की फाइल को दाखिल दफ़्तर की जा सके, ऐसे किसी या किन्हीं बलि के बकरों की तलाश में पूरी ईमानदारी से जुट जाता है।
बलि का बकरा मिला नहीं और सभी संबंधित विभाग के लोग गंगा नहाये नहीं। जैसे मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक, संबंधित विभागों की दौड़ फाइल क्लोज़ होने तक। वैसे भी ये तंत्र जनता का, जनता से और जनता के लिए ही तो है।
और जनता की स्मरण शक्ति तो बड़ी ही कमज़ोर है, ये तथ्य भी किसी से छिपा नहीं। आज भी यदि लगातार आग उगलते समाचार माध्यम याद ना दिलाएं तो इन्हें कल की घटना भी याद नहीं रह पाती है और नेतृत्व इस का भरपूर लाभ उठाता रहता है।
परंतु मेरा आज का आव्हान इस लोकप्रिय परंपरागत विभागीय समाधान की प्रक्रिया की बारीकियों से थोड़ा अलग है क्यों कि मैं इस तरह के सतही रोग निदान को सिरे से खारिज करता हूं।
इस से केवल ऊपरी तौर पर आंशिक इलाज होता है, रोग अपनी मूल अवस्था में शरीर में विद्यमान रहता है और हम सभी के सारे प्रयास बाहरी तौर पर परिस्थितियां साधारण करने की ओर लगे रहते हैं।
यहां मैं आप सभी संग 24 मई 2019 को तक्षशिला कोचिंग संस्थान सूरत में हुए ऐसे ही एक अग्नि कांड, जिस में 22 बच्चों की जानें गई थी, पर उस समय मेरे द्वारा लिखी गई एक लघु रचना साझा करना चाहता हूं इस से आप को मेरे आज के आलेख के मर्म तक पहुंचने में मदद मिलेगी:-
"सूरत-ए-हाल"
पैसा कमाना,
हर "सूरत-ए-हाल" में,
यहां का इख़लाक है,
नियम ताक पर हैं,
कानून किताबों में,
अच्छा मज़ाक है,
ये हुक्मरानों की नहीं,
मेरी, आपकी, सभी की,
रोज़मर्रा की बात है,
बावज़ूद इसके अगर,
आज हम लोग ज़िन्दा हैं,
ये महज़ एक इत्तेफ़ाक़ है.
~ नितिन जोधपुरी 'छीण'
ये हुक्मरानों की नहीं, मेरी, आपकी, सभी की, रोज़मर्रा की बात है - इस लाइन में आज की परिस्थितियों का दर्द छिपा है।
मेरी आज की कविता इस पक्ष को बड़ी उम्मीद से उजागर करते हुए आप सभी से अपनी अपनी ज़िंदगी की पूरी जिम्मेवारी लेते हुए, पूरी जिम्मेदारी से, अपनी जीवनशैली में कर्तव्यनिष्ठ, नैतिक सुधार का आव्हान करती है ताकि ऐसे दुखद प्रसंग, वो चाहे कहीं भी हो, किसी के भी साथ हों, घर में या बाज़ार में हो, न केवल टाले जा सकें बल्कि उन्हें सिरे से हमारी ज़िंदगी से ख़ारिज किया जा सके।
पर इस के लिए हमें अपने आप से कुछ कठिन सवाल पूछने होंगे, हमें हमारे अपने वर्तन के बारे में आत्मावलोकन करना होगा, अधिकतर सुधार का कार्य हमें की करना है इस लिए किसी और को दोष देना इस कार्य में न्यूनतम होगा। क्या आप इस के लिए तैयार हैं ?
हमारे सुधरे वर्तन से ही वांछित परिवर्तन आएगा इस में मुझे तनिक भी संदेह नहीं है और मुझे पूरा विश्वास है कि इन विचारों की धूप में आप भी सभी कुछ साफ साफ देख पाएंगे और आप स्वयं को, अपने अपनों को इन जानलेवा अनहोनियों से बचा पाएंगे।
सविनय,
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🙏🏻
नितिन
"इस चीख पुकार में छुपे खोखले सत्य का साक्षात्कार करें"
कितने प्रतिशत लोग, यह दावा, कर सकते हैं, कि,
उन का, अपना मकान, नियमानुसार, बना हुआ है,
भूमि, या आकाश मार्ग से, कोई अतिक्रमण नहीं है,
न उनका हाथ, नियमों के उल्लंघन से, सना हुआ है,
कितने लोगों ने यहां, खुल कर असहमति जताई थी,
जब रहवासी मुहल्ले में, पहली दुकान खोली गई थी,
जहाँ दो मंजिल से, ऊंचे मकान की अनुमति नहीं थी,
क्यों चुप रहे, जब पांच मंजिला सराय, खोली गई थी,
हम में से कितने, रहवासीय घरों से व्यवसाय करते हैं,
अपने पडोसियों के प्राणों को, खतरे में डाला करते हैं,
कितने घरों में, है एक फेज़ का, विद्युत कनेक्शन, लगा,
परंतु विद्युत उपकरण अत्यधिक लोड के चला करते हैं,
कितने लोग, किसी सराय या होटल में, ठहरने से पहले,
आपातकाल में, सुरक्षित निकल पाने के रास्ते देखते हैं,
https://t.co/HaZd6E65Ja
"How To Objectively View Necessity, Ability, Eligibility And Magnanimity"
"ज़रूरतों, हैसियत, लायकी और दरियादिली के बीच - तालमेल है या घालमेल है ?"
मैने अक्सर ये होते देखा है, कि जहां अपने अरीब करीब, कभी किसी ज़रूरतमंद को, मदद करने की बात होती है, मदद मांगी गई होती है, या हमें महसूस होती है, हम लोग ज़रूरत की संजीदगी को समझना छोड़, ये देखने लगते हैं, कि वो हमारी मदद के लायक है या नहीं।
हम ये अपने खुद के तजरबे से जानते हैं, कि अगर ज़रूरत के समय मदद नहीं मिली, तो कई बार बहुत देर हो जाती है, ऐसे में ज़रूरत को समझना, लायकी को समझने से, कहीं ज़्यादा अहम होता है।
हां, मेरी ज़ाती राय, हमेशा से ये ज़रूर रही है, कि घर से बाहर मदद ढूंढने जाने से पहले, घर के भीतर या अपने आसपास मौजूद, संसाधनों का जायजा ज़रूर लिया जाना चाहिए, और सिर्फ उन हालातों में ही दुनिया भर में मदद की गुहार होनी चाहिए, जब वह स्थानीय संसाधनों से किसी भी तरह मुकम्मल नहीं हो पा रही हो।
पर जरूरतमंद आप के सामने है, आप से गुहार लगाई गई है, जीने मरने का सवाल है, ऐसे में उस के अतीत को सामने लाकर, उस की लायकी पर सवालिया निशान लगाना, शायद सही नहीं होगा।
आप खुद को मदद करने के काबिल नहीं पाते हैं, तो कमस्कम मदद दिलाने में ही कोई सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं, और कुछ भी नहीं कर सकने की हालत में, उन्हें ये तो बता ही सकते हैं, कि वो आपके भरोसे ना रहें। यकीन मानिए, वह भी एक बहुत बड़ी मदद होगी।
इसी चीज़ का एक दूसरा पहलू है, जहां किसी मौके पर, कोई सौगात देते समय, आप मौके की नज़ाकत छोड़, अपनी बिसात को छोड़, सौगात पाने वाले की हैसियत का अंदाज़ा लगाने लगते हैं, और उस से ये फैसला लेने लगते हैं, कि आप की ओर से क्या दिया जाए।
मुझे लगता है, ऐसे में, आप द्वारा दी जा रही भेंट, सौगात या तोहफा, उस यादगार मौके के मुताबिक, उन की नहीं, बल्कि आप की हैसियत, तबियत और काबिलियत का मुज़ाहिरा कर रहा होता है। तोहफा मौके के मुताबिक होना चाहिए, इस में तो किसी को कभी कोई शक़ रहा ही नहीं।
इसी बात का तीसरा और शायद आखिरी पहलू है, के जब आप कहीं दिल दे बैठे हैं या किसी का दिल ले बैठे हैं। यहां तो बड़ी पुरानी कहावत लागू है, कि रिश्तों में, कभी भी, कोई तिजारत नहीं होती और जहां तिजारत करनी हो, तो वहां कोई रिश्ता, मायने नहीं रखता।
जब दिल दिया है, सभी कुछ दिया है, तो फिर बाकी क्या रहा है। जहां सयाने लोग, कुछ बचा लेते हैं, वहां वो जोड़, अमूमन कमज़ोर पड़ जाता है, क्यों कि जज़्बातों की सिमट, एहसासों का चूना और मुहब्बत का गारा कम डला होने से, दिलों के जोड़ में, वो मज़बूती नहीं आ पाती है, जो मुसलसल होनी चाहिए।
इसलिए मेरा आज का पैग़ाम, बड़ा सरल और सीधा है, किसी की मदद करते समय, उन की ज़रूरत देखिये, किसी को सौगात देते समय, मौका और अपनी हैसियत देखिए और प्यार मुहब्बत में कुछ ना देखिए, जो भी है, सभी कुछ दे दीजिए।
आप का, हमेशा आप के पास आएगा, दुगना होकर आएगा और जो आप का था ही नहीं, वो वैसे भी आप के पास, कभी भी ना आ पाएगा। गिला कैसा, शिकवा कैसा।
सविनय,
👨🏻
🙏🏻
नितिन
"ज़रूरियात, हैसियत, जज़्बात और बिसात"
जब कभी, कहीं, मदद करने की, बात हो,
आप, सामने वाले की, ज़रूरियात, देखो,
कितनी, कर पाएंगे, आप, ये मदद उन की,
वास्ते इस के, अपनी ताकतें, बिसात देखो,
पर, जब, किसी को, देनी हो, सौगात कोई,
अपनी हैसियत देखो, अपने जज़्बात देखो,
और जहां आप ने, किसी को दिल दिया हो,
वहां सिर्फ दिल देखो दिल के जज़्बात देखो,
हम सभी, अक्सर, यह ग़लती, कर बैठते हैं,
बजाय, ज़रूरत जानने के, लायकी देखते हैं,
और जब भी, मौका होता है तोहफ़ा देने का,
अपनी छोड़ हम, हैसियत, उन की, देखते हैं.
~ नितिन जोधपुरी 'छीण'
"Healthy Versus Unhealthy Food Options"
(English version of the article follows the Hindi article - scroll down for English article)
"स्वास्थ्यकर बनाम अस्वास्थ्यकर खाने के विकल्प"
"अमूल डिलीशियस फ़ैट स्प्रेड" - ट्रेडिशनल "अमूल पाश्चुराइज़्ड बटर" यानी साधारण मक्खन के सस्ते विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है, खासकर छोटे बड़े फास्ट फूड विक्रेताओं द्वारा और कमर्शियल बेकिंग में भी, हालांकि यह असल में एक डेयरी प्रोडक्ट होने के बजाय एक बहुत ज़्यादा प्रोसेस्ड, प्लांट-बेस्ड मार्जरीन है।
आइए इसके घटकों पर एक नज़र डालते हैं -
- रिफ़ाइंड वेजिटेबल ऑयल या पाम ऑयल) 75%
- फ़्लेवर के लिए मिलाए गए मिल्क सॉलिड,
- आयोडीन वाला नमक,
- विटामिन A और D,
- इमल्सीफ़ायर (322) और स्टेबलाइज़र (471),
- एंटीऑक्सीडेंट TBHQ (319)
- प्रिज़र्वेटिव पोटैशियम सॉर्बेट (202),
- नेचुरल पीला रंग एनाट्टो (160b),
- एसिडिटी रेगुलेटर (330).
इसकी तुलना में डेयरी दूध उत्पाद अमूल पाश्चुरीकृत मक्खन की घटक सामग्री सादी और सरल है:
- पाश्चुरीकृत दूध वसा - 80%
- साधारण नमक
- प्राकृतिक पीला रंग एनाट्टो (160b),
ये अमूल मक्खन से 3 गुना सस्ता है यानी 500 ग्राम अमूल पाश्चुरीकृत मक्खन की कीमत 300 रु है और 500 ग्राम अमूल स्वादिष्ट फैट स्प्रेड की कीमत 100 रु है। दोनों उत्पाद पैकेजों का आकार, पैकेजिंग और रंग में लगभग एक समान हैं। अक्सर साथ ही रखे जाते हैं।
अमूल जैसी प्रतिष्ठित डेयरी कंपनी, जो सदा स्वास्थ्यकर खाद्य उत्पाद बनाने का दावा करती रही है, से ऐसा अस्वास्थ्यकर विकल्प आना एक दुखद घटना ही कही जाएगी।
आज उपभोक्ताओं की पुकार सुन कर, एक तरफ तो क्वालिटी वॉल जैसे प्रतियोगियों ने अपने वनस्पति तेल आधारित जमी हुई मिठाइयों को दूध आधारित आइसक्रीम में बदल दिया है..........
...........वहीं अमूल ने यह रिफाइंड पाम तेल आधारित सस्ता उत्पाद बाजार में उतारा है। उन्हें लोगों के सामान्य स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों को ध्यान में रखते हुए अपनी इस पेशकश पर पुनर्विचार करना चाहिए।
आखिरकार, किसी भी तरह और कैसे भी लाभ ही कमाना तो किसी भी उद्योग का एकमात्र लक्ष्य नहीं हो सकता।
खैर, जब तक वे ऐसा करने का फैसला नहीं करते, हमें तो सावधान रहना ही चाहिए और ये तो अवश्य ही जानना चाहिए कि हम अपने परिवार के लिए कौन से ऑप्शन चुन रहे हैं - स्वास्थ्यकर या अस्वास्थ्यकर ?
सविनय
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🙏🏻
नितिन
"Healthy Versus Unhealthy Food Options"
"Amul Delicious Fat Spread" - often used as a budget-friendly alternative to traditional "Amul Pasteurised Butter", particularly by street food vendors and in commercial baking is however fundamentally a highly processed, plant-based margarine rather than a dairy product.
Let's have a look at its ingredients -
- Refined Vegetable Oil or Palm Oil) 75%
- Milk Solids added for flavour,
- Iodised Salt,
- Vitamins A & D,
- Emulsifier (322) and Stabilizer (471),
- Antioxidant TBHQ (319)
- Preservative Potassium Sorbate (202),
- Natural Yellow Color Annatto (160b),
- Acidity Regulator (330).
In comparison the ingredients of dairy milk product Amul Pasteurised Butter are plain and simple as follows :
- Pasteurised Milk Fat - 80%
- Common Salt
- Natural Yellow Color Annatto (160b),
Priced 3 times cheaper than butter i.e. 500 gram Amul Pasteurised Butter is priced ₹300 and 500 gram Amul Delicious Fat Spread is priced at ₹100. Shape, packaging and color of both product packages are almost same.
Such unhealthy option coming from a dairy company of repute like Amul that claims to produce healthy food products is a sad development.
Now when listening to sane voices, even competitors like Quality Wall have turned their Vegetable Oil based frozen desserts into milk based icecreams..........
...........Amul should reconsider this offering in view of the larger issue of general health of people and withdraw it from its product range.
Afterall profiteering is not everything in a business.
Till they decide to do so, let us be careful and know what options are we choosing for our family.
Humbly yours,
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🙏🏻
NiTiN
"रसोई में इस्तेमाल हुए बर्तनों को रखने की तहज़ीब"
पहला कर्तव्य है, थाली में कभी झूठा ना छोड़ें,
दूजा यह, कि बर्तन, पानी से, खंगाल कर, रखें,
इस्तेमाल हुए, बर्तनों में, खाना, सड़ता रहता है,
रसोई के सिंक में बर्तन जूठन निकाल कर रखें,
हमारी आपकी रसोई, किसी मंदिर से कम नहीं,
पवित्रता स्वच्छता, हर कोने में तत्काल कर रखें,
रसोई में सफाई होने से, बीमारियां कम आती हैं,
अच्छी सेहत का, ये इंतज़ाम, बहरहाल कर रखें,
अब राख, या बालू रेत कहां, साबुन ही घिसते हैं,
ज़रा से में हो काम, इन को ऐसे खंगाल कर रखें,
हर थाली कटोरी चम्मच रोज़ आप की सेवा में है,
हमारा फ़र्ज़ है के इन को बड़ा देख भाल कर रखें,
सफाई, सिर्फ होनी नहीं, हमें, दिखनी भी चाहिए,
हर रोज़ सुबह की ये तस्वीर बड़ी सँभाल कर रखें.
~ नितिन जोधपुरी 'छीण'
"आदरणीया सुधा ताई (काळे) लेले - अश्रूपुरित श्रद्धांजलि"
सी रोड सरदारपुरा जोधपुर का वह भाग जहां से एक तरफ जालौरीगेट की तरफ बढ़ें तो गोल बिल्डिंग आती थी और नेहरू पार्क की ओर बढ़ें तो मेहता सदन दिखाई देता था, वहां बहुत पहले से यहां आकर बसे तीन चार महाराष्ट्रीयन परिवारों का निवास था।
इसी मेहता सदन से अगले भवन में पहली मंजिल पर एक लंबे समय तक काळे परिवार का निवास रहा। 3 अगस्त 1950 में जन्मीं सुधा ताई (मराठी में ताई का अर्थ बड़ी दीदी होता है) उसी परिवार की छोटी बेटी थीं जिन से हमें हमारे बचपन में एक बड़ी बहन का वो प्यार और दुलार मिला जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता।
मैं उन से 10 वर्ष छोटा था और मेरे जैसे ना जाने कितने ही ऐसे बच्चे होंगे, जब बड़े लोग बैठक में आपस में बातचीत किया करते थे तो हम बच्चे उस घर की खुली छत पर खेला करते थे और हमें खेल खिलाने का जिम्मा नैसर्गिक रीत्या सुधा ताई के जिम्मे हुआ करता था।
उस घर की अनगिनत यादें हैं और अधिकतर आदरणीया सुधा ताई से इस तरह जुड़ी हैं कि उन के स्मरण बिना उन यादों का अस्तित्व हो ही नहीं सकता है।
काळे परिवार जोधपुर के संभ्रांत, प्रतिष्ठित एवं अत्यंत धार्मिक महाराष्ट्रीयन परिवारों में से एक था और लगभग हर पखवाड़े में एक दिन एवं विभिन्न व्रत त्योहारों पर उन के यहां शाम को भजन कीर्तन सत्संग का आयोजन होता था जो देर रात तक चलता था।
ऐसे मैं हम बच्चे प्रतीक्षा करते थे कि कब सत्संग हो और जब बड़े लोग भक्ति संध्या में लीन हों तब हम लोग सुधा ताई के सानिध्य में उन की छत पर खेलें, उधम मचाएं और अंत में प्रसाद वितरण के समय बराबर वापस हॉल में पहुंच जाएं।
सुधा ताई के पास कहानियों का खजाना था जिन्हें वो हम सभी बच्चों को सुनाया करती थीं और मुझे इस बात का सदा एहसास रहा कि मेरे व्यक्तित्व को परिभाषित करने वाले मूल्यों, आदर्शों एवं नैतिकता के सिद्धांतों में उन के विचारों का बड़ा प्रभाव रहा, मैं ही नहीं संभवतः जो भी बच्चे उन दिनों उन के संपर्क में रहे उन सभी पर इस का सुप्रभाव रह होगा इस में मुझे कोई संदेह नहीं है।
इस सदी के दूसरे दशक में सामाजिक माध्यमों में आए क्रांतिकारी परिवर्तनों के चलते, उन से पुनः संपर्क हुआ और मुंबई में मिलना हुआ। बढ़ती उम्र भी उन से वह मातृत्व संपन्न मृदु हास्य नहीं छीन पाई थी बल्कि वो मुस्कान और निश्छल, सरल, प्रेममय, शांतिमय एवं कान्तिमय होती चली गई थी।
उस के उपरांत उन से फोन पर यदाकदा बातें होती रहीं, इन माध्यमों द्वारा उनका प्यार मिलता रहा, प्रेरणा मिलती रही और मेरे लिखे को हृदय से चाहने और सराहने वाले अपनों में उनका नाम सब से ऊपर लिखा जाएगा इस में भी संदेह नहीं। हमेशा उन के उत्तर, उन की विवेचना एवं प्रोत्साहन की प्रतीक्षा रहती थी।
ऐसी स्नेहमूर्ति आदरणीया सुधा ताई, आदरणीय चंद्रकांत लेले भाईसाहब की जीवनसंगिनी एवं केदार की माताजी, अपने सभी कर्तव्यों को भलीभांति निभा कर, कैंसर जैसे रोग को भी आईना दिखाकर, कल यानी मंगलवार 16 जून सुबह 11.10 बजे मुंबई में अपने निवास स्थान से शांतिपूर्वक देवलोक सिधार गईं।
हम लोग ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह आदरणीया सुधा ताई की आत्मा को अपने चरणों में स्थान दें और यह भी की परिवारजन आदरणीय चन्द्रकांत लेले भाईसाहब, पुत्र केदार, पुत्रवधू श्वेता, पौत्र सनय एवं प्रखर को इस असमय अपूर्णीय क्षति को सहन करने हेतु धीरज, ढाढ़स एवं बल दें।
अश्रुपूरित श्रद्धांजलि 🙏🏻 🙏🏻
शोभा नितिन जोधपुर
https://t.co/GFQWw72Vut
"People On Roads Are Like Explosives Ready To Explode"
"सड़क पर चल रहा हर आदमी, किसी बारूद के गोले की तरह है, पिन खींची नहीं और फटा नहीं"
माना कि वक़्त बहुत बदल गया है, ज़िंदगी की रफ्तार भी दिनोंदिन तेज़ होती जा रही है, हर काम में वक़्त, अब कम लगता है, पर इसी के साथ, सब्र के पैमाने भी, पहले से ज़ियादा छलकने लगे हैं, लोग बात बात पर, झगड़ने लगे हैं और ना जाने किस का गुस्सा, किस पर निकालने लगे हैं।
आज चलते फिरते, किसी भी जगह, चौराहे पर, दोराहे पर, सड़क पर, गली में, कहीं भी किसी का गलती से भी किसी से कोई बात करना, नसीहत देना, सही बात का बताना, एक दूसरे का, एक दूसरे को छू जाना, गाड़ियों का एक दूसरे को छू जाना, अब इस कदर नागवार गुज़रता है, ज़रा सा भी बर्दाश्त नहीं होता, और लोग अमूमन, किसी बम की तरह फट पड़ते हैं, जिस की किसी को वैसे उम्मीद नहीं होती, वो सभी कुछ कर गुज़रते हैं, बिना ये सोचे या समझे कि ऐसी हरकत के क्या क्या अंजाम हो सकते हैं।
आज बाहर रास्तों पर इंसान नहीं, ज़रा सी चिंगारी से फट पड़ने वाले, गोला बारूद भरे, संदूक चल रहे हैं, वह भी बिना ताले वाले और खुलने को बेहद बेकरार।
बस कुछ ही दशक पहले की तो बात है, अगर आप किसी कारणवश, घर से बाहर निकलते थे तो बकौल आचार्य रजनीश वह आप का किसी अज्ञात के साथ होने वाला एक दिलचस्प प्रेम प्रसंग हुआ करता था।
आज जब आप घर से बाहर निकलते हैं, तो वापस सुरक्षित घर पहुंचने का विचार ही आप के मन में सर्वोपरि होता है, क्यों कि ना जाने किस मोड़ पे मिल जाए शैतान।
असल में बात यह है, कि हर कोई, मौकापरस्त बनकर, सहूलियत के रिश्ते, निभाने की कोशिश रहा है। ज़रूरत पड़ने पर, गधे को भी बाप बनाने वाली, सोच पर अमल करते हुए, जो उसे कहना चाहिए, वह उस से, वो नहीं कहता, बल्कि वो कहता है, जो वो सुनना पसंद करते हैं, जो सरासर झूठ होता है और सिर्फ इसलिए कहा जाता है कि उसे कहने से उसका कोई मतलब पूरा हो रहा होता है।
जो उसे कहना चाहिए और जो कहा नहीं जाता या कहने नहीं दिया जाता, वो कभी खत्म नहीं होता, उस का वजूद सदा के लिए मन के भीतर रहता है, वक़्त के साथ सड़ता है और फिर एक दिन जब सब्र का पैमाना टूट जाता है या छलक जाता है फिर तो वो उफनता है, भड़कता है, फट पड़ता है, बिना ये देखे कि सामने कौन है, किसे, क्या कहा जा रहा है।
अनहोनियां अब कभी भी अपने आप नहीं होतीं, हम ही इन्हें कारगर करने के साधन जुटाते हैं, हम ही उन के दामन में ज़रूरी असला असबाब डाल कर उन्हें कामयाब बनाते हैं।
आखिर में आप के अलावा किसी का कुछ नहीं जाता क्यों कि ऐसी सभी दुर्घटनाओं में आप के भीतर रह रहा इंसान तिल तिल कर मरता रहता है।
अब जहां से दर्द उठा था वहीं कहीं से दवा के भी रास्ते निकलेंगे, इस बात को अगर सही माना जाए तो जहां का कर्ज़ा रहा वहीं उतारने पर ही तो मूल कम होगा और सूद भी कम लगेगा वो अलग।
यानी आप के अपनों से, अपने साथियों से, सहयात्रियों से घर, दफ्तर या बाहर, जब जब जो जो आप को कहना था, कहिए, हां इस नपे तुले लहज़े में कहिए, पहले पहल हो सकता है ये धड़ाक से निकले पर आप अगर उसे संजीदगी से एक तंजीम की तरह अपनाएंगे तो बहुत जल्द आप नपी तुली तहरीरें रखने में माहिर हो जाएंगे।
लोग भी कहेंगे, क्या बंदा है, इतनी बड़ी बात भी कितनी आसानी से कह गया। किसी को जरा सा भी बुरा महसूस नहीं हुआ।
जहां का है वहीं दे दोगे तो ये बोझा कहीं और उतारने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, आप भी हल्के रहेंगे, वातावरण भी हल्का रहेगा और ये हल्का सामान गलती से भी किसी पर गिर भी जाए तो उसे चोट नहीं लगेगी। सबसे बड़ी बात आप एक जानेमाने समझेबूझे विस्फोटक भरे कुंडी लगे एक संदूक से अपनी दुनिया में विश्व शांति के जागतिक उत्प्रेरक बन जाएंगे। है ना कमाल की बात ?
सविनय,
👨🏻
🙏🏻
नितिन
"दिल में मत रखिए, बताइए, जो उन्हें बताने जैसा है"
आजकल, किसी को, कुछ भी कह देना,
एक बहुत बड़ा, जोखिम, उठाने जैसा है,
फट पड़ते हैं, लोग, किसी, बम की तरह,
यह, खौलते तेल में, छींटे लगाने जैसा है,
जिसे देखो, उबल रहा है भीतर ही भीतर,
किस का है क्यूं हैं, ये गुस्सा जाने कैसा है,
कहीं, और की, बेबसी का, आलम है, यह,
क्यों नहीं कहते, जो, जहां, सुनाने जैसा है,
हम बड़े हुए, तब तक बदल गया था कायदा,
मेरा नज़रिया, खोटा सिक्का, भुनाने जैसा है,
गर, घर ही में कह सुन लेते, कितना सुकून होता,
अब ये सुलगती आग को, हवा से बुझाने जैसा है,
हम में से, जो, तजर्बेकार हैं, उन की, ज़िम्मेवारी है,
बिन बात गरजना, बारिशों में पतंग उड़ाने जैसा है,
अगर हो सके, तो अब, बस, इतना कीजिएगा हुज़ूर,
दिल में मत रखिए, बताइए, जो उन्हें, बताने जैसा है.
~ नितिन जोधपुरी 'छीण'
हृदय से अश्रुपूरित श्रद्धांजलि - आदरणीय मधुसूदन भास्कर फाटक साहब (कार्यस्थली जोधपुर हाल निवास स्थल पुणे)।
एक बगीचे में,
फूल खिले थे,
कुछ नीले,
कुछ पीले,
कुछ लाल,
कुछ गुलाब,
कुछ सफेद,
कुछ बैंगनी,
हर रंग के,
फूल खिले थे,
इस एक छोटे से प्रसंग को हर तरह के नव रस यानी हास्यरस, वीररस, करुणरस, शृंगाररस, रौद्ररस, भयकारकरस, वीभत्सरस, आश्चर्यरस, शांतरस में अपने निराले अंदाज़ में कह कर हर मंच पर समा बांधने वाला, दर्शकों को एक ही पल में हंसाने वाला, रुलाने वाला, वो एक सदाबहार फूल, कल सदा के लिए मुरझा गया।
हमें नाट्यकला के पहले पाठ पढ़ाने वाले गुरुदेव और पिताजी के सबसे नजदीकी सहयोगी मित्र, एम बी एम इंजीनियरिंग कॉलेज जोधपुर में सिविल इंजीनियरिंग के सेवानिवृत्त प्रोफेसर श्री मधुसूदन भास्कर फाटक साहब का कल शाम पूना में उन के निवास स्थान पर वृद्धावस्था में निधन हो गया।
आदरणीय पितासम श्री मधुसूदन भास्कर फाटक साहब को हृदय से नमन एवं अश्रुपूरित श्रद्धांजलि 🙏🏻
ईश्वर उनकी दिवंगत आत्मा को अपने चरणों में स्थान दें।
मेधा, माधवी, संगीता एवं उन के परिवार के सभी सदस्यों को इस आघात को सहने के लिए धैर्य, ढाढस एवं शक्ति दें ईश्वर से यही प्रार्थना है।
शोभा नितिन जोधपुर
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"Wheatfree Atta Flour Is A Better Alternative To Normal Wheat Flour"
In a world where Wheat and Rice crops have been genetically modified to give us a bumper yield that is now progressively proving to be a costly proposition in terms of its relative effect and impact on our overall health, we have been looking for better alternatives to prepare Roti or Chapati and polished rice.
The problem got compounded with the ultra refined flour of these grains called Maida which is the main component in all your bakery products.
The bakery products made from corse grain flour comprising whole grains were never liked by masses making them almost unavailable everywhere.
While eating Positive Minor Millets like Barnyard, Browntop, Kodo, Little and Foxtail Millets instead is undoubtedly the best option for us as these were also in use before Wheat and Rice took over the reigns of our daily meal requirements nearer home.
The other Major Millets like Pearl, Sorghum, Ragi, Barley and Corn are also there as a better alternative to eating polished modified gluten rich Wheat and Rice which are devoid of fiber.
Let us understand at this point - What is meant by the terms "Glycemic Index" and "Glycemic Load" ?
"Glycemic Index" and "Glycemic Load" are indices, indicating a comparative measurement of the quantity, effect and digestion time of carbohydrates in various food items, comprising our daily meals that every health conscious person, especially those suffering from certain lifestyle related disorders should know about.
"Glycemic Index" in general, indicates, the comparative pace with which, any food item, is converted into Glucose or Sugar, through the digestion process and made available in our body for distribution.
A higher Glycemic Index value means, easy and quicker availability of Glucose or Sugar, soon after eating that food, giving rise to sudden spike in our Sugar levels, thereby creating obvious avoidable difficulties in its management.
A lower Glycemic Index value means, slow and delayed release of Glucose or Sugar, in our system, facilitating, better and efficient Sugar management.
"Glycemic Load" indicates the quantity of Glucose present in a food item, that will be available to us, when we eat it, in a certain quantity, also called as its normal serving size.
The "Glycemic Load" of any food item is calculated by multiplying its "Glycemic Index" by the "Quantity of Carbohydrates" present in a Standard Serving Size" and then dividing it by 100.
But since, we are talking about, a raw material, that is a combination, of certain raw grains and pulses, put together in a certain quantity ratio, for making cooked food, that is presumably healthier than popular options, for today's discussion, we will talk about, Glycemic Index alone.
This recipe of making "Multigrain Wheatfree Atta Flour" can be tried, as a intermediate option, till one is ready for Positive Minor Millets, especially those who are finding it difficult to adopt and include Positive Minor Millets in their regular diet for any and many reasons.
The constitution of this "Multigrain Wheatfree Atta Flour" that has so far been found to deliver results almost similar or closest to a whole wheat Roti, Phulka or Chapati both in texture and taste are as follows :
5 kg Wheatfree Multigrain Atta Flour ingredients :-
1. Jwar or Sorghum : 1.250 kg
2. Jow or Barley : 0.750 kg
3. Kala Chana or Black Chickpeas : 1 kg
4. Sabut Moong or Green Gram : 1 kg
5. Ragi or Finger Millet : 0.500 kg
6. Makka or Maize : 0.250 kg
7. Soyabean : 0.250 kg
All these ingredients are mixed well in the above ratio and ground in a flourmill to prepare atta of fine consistency which can be kneaded in a dough from which Roti, Phulka or Chapati can be prepared exactly in the same manner as is made from a dough made of wheat flour. It is just the Atta replacement, rest all process remains same.
Why Multigrain Wheatfree Atta Flour ?
"As Long As There Is A Way, Life For Me Is Happy And Blessed"
"जब तलक रास्ते हैं कायम ज़िंदगी बिंदास है"
माना कि चित भी मेरी है और पट भी मेरी है,
पर, मेरी दुनिया, मैने, बड़े ध्यान से, उकेरी है,
हौसले के पंखों पर, कई ऊंची उड़ानें भरी थीं,
बादलों के पार जाकर छुई किरणें सुनहरी थीं,
वैसे ही, अलग थी, तो मेरी सोच भी, अलग थी,
उस पर, मुश्किलों से मेरी दोस्ती बड़ी गहरी थी,
जितना भी, रोका गया मुझे, मैं आगे बढ़ती गई,
कर्तव्यों के दुर्गम पथ पर कहीं नहीं मैं ठहरी थी,
व्यावहारिकता ने था जब जीवनदर्शन समझाया,
संस्कारों के बोधि वृक्ष तले, छाया बड़ी घनेरी थी,
शर्मिला नाम ही है सुख सुविधा शांति सुरक्षा का,
मेहनतकशी से रोशन हुई मेरी राहें जो अंधेरी थीं,
मंज़िलों को वो ढूंढते हैं जिन्हें मंज़िलों से आस है,
महफिलें वो सजाएं, जिन्हें महफिलों की प्यास है,
मैने, ज़िंदगी तेरे रास्तों से, बेइंतिहा मुहब्बत की है,
जब तलक, मेरे रास्ते हैं कायम, ज़िंदगी, बिंदास है.
~ नितिन जोधपुरी 'छीण'
जनमदिन मुबारक शम्मी - शोभा नितिन जोधपुर
सर जब ये नाम आपराधिक कृत्यों में शरीक होते हैं, तब भी तो इतनी ही शिद्दत से अपने दर्शकों को उनके नाम बताया कीजिए ना ? तब आप के मुंह में भला दही क्यों जम जाता है। ये इस तरह के अच्छे कार्य की तारीफ अवश्य हो परन्तु जो हानि काले को काला ना कहने से हो रही है आप को उसकी कल्पना भी नहीं है
"An Overbearing Concern Is An Inhibitor Of Growth And Development."
A Thought On Life Without Any Preamble
"जिम्मेदारी, कहीं मोल नहीं मिलती, हमें लेनी पड़ती है"
हवाओं के सहारे छोड़ने पर, दो ही बातें हो सकती हैं,
या तो, गिर कर, फना होगा, या उड़ना सीख जायेगा,
ऐसे ही जब खुद को खुद की आवाज़ सुनाई देने लगे,
वक़्त लगेगा पर खुद ही खुद से जुड़ना सीख जायेगा,
डर तो हमारा अपना शाहकार है जितना चाहे बढ़ा लें,
हक़ीक़त जब सामने होगी तो संभलना सीख जायेगा,
जब दो चार रास्ते, मुश्किलों का, सबब बन के उभरेंगे,
इस भूलभुलैया में, सही रास्ते पे, मुड़ना सीख जायेगा,
कठिनाइयाँ, हमें रोकती नहीं जीने के हुनर सिखाती हैं,
जो, चुनौतियां से जूझता रहा, वो लड़ना सीख जायेगा,
काबिल नाकाबिल, समर्थ असमर्थ यहां दोनों मिलते हैं,
फ़र्क़ इतना है, कि जो चलेगा, वो चलना सीख जायेगा,
ज़िम्मेदारी, कहीं, मोल नहीं मिलती, हमें लेनी पड़ती है,
जिम्मेवारी, जो समझेगा, वो शख्स जीना सीख जायेगा.
~ नितिन जोधपुरी 'छीण'
हर्षवर्धन जी, एक बात समझ में नहीं आई, जितने भी चित्र हैं, वीडियो हैं उन में इन दोनों संग उन के परिवार के एक आदरणीय वरिष्ठ सदस्य का होना भी बताया गया है, उन के बारे में कोई कुछ नहीं बता रहा है या लिख रहा है। यदि वाकई इन दोनों के बड़े इनके संग हैं या थे तो क्या ये उनका अपमान नहीं हैं ?
"A Conversation That Happens At Home Cannot Happen Anywhere Else"
"जो घर में हो सकती है और कहीं वो बात नहीं होती है"
कल दो दोस्त, साथ बैठे यह सोच रहे थे,
क्यों है ये और क्या करें यही सोच रहे थे,
आजकल कोई भी घर बुला कर राजी नहीं,
अगर हम बुलाएं, तो घर आ कर राजी नहीं,
दोस्तों के, घरों के किवाड़, बंद ऐसे तो न थे,
अपने में ही, खोये, ये स्वच्छंद, ऐसे तो न थे,
क्या किया जाए कि आनाजाना फिर शुरु हो,
क्या, किया जाए, हम लोग, फिर, रूबरू हों,
सबसे पहले, कारण क्या है, ये जानना होगा,
उस का, निवारण, है जरूरी, ये मानना होगा,
पर यार, किसी के मन में, क्यों नहीं आता है,
बेवजह मिलने को, कोई क्यों नहीं बुलाता है,
खुल के, बात की जाय, कि अब, दिन कम हैं,
देखने निकलोगे अगर, तो यहाँ ग़म ही ग़म हैं,
कोई, वाजिब वजह है, तो हल निकाला जाए,
गर कोई मजबूरी हो तो उसे भी संभाला जाए,
पर एक ही शहर में रहकर बचपन के दोस्तों से,
घर पर जा कर नहीं मिल पाना उन फ़रिश्तों से,
ज़रा गौर फरमाइएगा, हमारी इस बात पर भाई,
ये पालकी अब तक आपके यहां क्यों नहीं आई,
क्यों ये बात, हमारी प्राथमिकता नहीं बन पाई है,
घरों में जाना, क्यों वास्तविकता नहीं बन पाई है,
ये प्रश्न, आप सभी के विचार हेतु यहां रख रहा हूं,
हम ने जो सोचा है उसे अभी के लिए ढक रहा हूं,
जीवन, निसंदेह बड़ी ही तेज़ी से आगे बढ़ रहा है,
समय रहते जो न चेता, वो स्वयं ही से लड़ रहा है,
स्वयं भी, निकलिए, दोस्तों की भी, सुध लीजिए,
बुलाइए हमें, या सपरिवार आइए, कुछ कीजिए,
आखिरी बात कह कर मैं इस विषय पर रुकता हूं,
जो होनी है अटल है अब उस की तरफ झुकता हूं,
आईसीयू में मुलाकात और फोटो से बात नहीं होती है,
जो घर में हो सकती है और कहीं वो बात नहीं होती है.
~ नितिन जोधपुरी 'छीण'