विरासत मे मिले थे कुछ आंसू और मेहनत करने की कला...
हम रोते रहे और मेहनत के हल चलाते रहे...
खुदा ना जाने क्यों देख ना पाया जोते हुए खेत
हम रोते रहे और हल चलाते रहे...
I’m happy to share🌟
🏆 I have been honored with the Women Achievers Award 2026 – Ambala 🏆
For my work in:
✨ Education support for children in need
✨ Women empowerment
✨ Drug addiction counseling
✨ Social work & community development
#WomenAchievers2026#IdrishFoundation
जिन्हें माँ की ममता और पिता का प्यार नहीं मिलता,
वो सिर्फ दुनिया के अनाथ नहीं होते,
बल्कि सबसे ज़्यादा दुर्भाग्यशाली बच्चे होते हैं।
जो अपने आँसू भी खुद ही पोंछते हैं,
अपनी तकलीफें भी चुपचाप सहते हैं,
वक़्त से पहले ही समझदार हो जाते हैं,
और जवानी में ही जैसे बूढ़े बन जाते हैं,
देने वाला इंसान उम्र भर देता ही रहता है —
प्यार, साथ, वफादारी और अपने फ़र्ज़…
लेकिन अक्सर वही इंसान खाली रह जाता है,
क्योंकि दुनिया को लेने की आदत है, देने की नहीं।” 💔
मैं डरती रही हालातों से,
कमज़ोर लोगों की बातों से
नासमझी मेरी ले आई मुझे,
बिखरे हुए जज़्बातों से
ना जाने क्यों मैं देख न पाई,
पीछे मुड़कर कुछ कह न पाई
एक बार जो कर लेती सामना,
आज यूँ ना होती गुमनामी
अब सीखा है दर्द से लड़ना,
जो खोया था खामोशी में,
उसे हिम्मत से पाना है
इक दिन ख़ुद को अपने पास बिठाया हमने,
पहले यार बनाया फिर समझाया हमने !!
भीड़ ने यूँ ही रहबर मान लिया है वर्ना
अपने अलावा किसको घर पहुँचाया हमने !!
मौत ने सारी रात हमारी नब्ज़ टटोली
ऐसा मरने का माहौल बनाया हमने !!
शारिक़ कैफ़ी
समाज भेदभाव बाद में करता है,
असली भेदभाव तो कई बार घर से ही शुरू हो जाता है…
बेटी जान भी दे दे तो ‘परायी’ कहलाती है,
और बेटा ठोकर भी मार दे तो ‘अपना’ ही माना जाता है।
कहावत है — ‘घी का लड्डू टेढ़ा भी भला।’
लेकिन बेटी?
2026 ने मेरे अंदर बहुत कुछ बदल दिया है।
इस साल मैंने अपनी खुशी के लिए बहुत कुछ नया आज़माया है—
नए लोग, नई जगहें, नई चीज़ें।
यह रमज़ान मेरे अंदर बहुत कुछ बदल रहा है।
ईद तक एक अलग नेहा होगी, जो पहले नहीं थी।
खान-पान, पहनावा, रहन-सहन—हर चीज़ में नया पन होगा। ❤️
आमीन।