🎗️ महेंद्र मुंडेल की कैंसर जर्नी महेंद्र मुंडेल की कलम से ✍️
यह संदेश हर कैंसर मरीज तक जरूर पहुँचाएँ।
एक समय था जब मैं एक हट्टा-कट्टा, तंदुरुस्त नौजवान था। सपनों की ऊँची उड़ान भर रहा था, भविष्य के सुनहरे सपने बुन रहा था। लेकिन अचानक एक दिन ब्लड कैंसर (ALL) ने मेरी ज़िंदगी की दिशा ही बदल दी। ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे सपनों की डोर एक झटके में काट दी हो। सपने बिखर गए, हौसला टूट गया और मैं भी अंदर से बिखर गया।
कुछ समय तक सब कुछ छोड़ देने का मन हुआ। लेकिन फिर माता-पिता का चेहरा, बच्चों की मुस्कान और अपने अधूरे सपने याद आए। मैंने फैसला किया कि हार नहीं मानूँगा, लड़ूँगा और जीतकर दिखाऊँगा।
इसके बाद शुरू हुआ 7 वर्षों का लंबा संघर्ष। गाँव से जोधपुर, जोधपुर से अहमदाबाद... जितने दिन डॉक्टर रोकते, अस्पताल में रहता और छुट्टी मिलते ही वापस गाँव लौट आता। गले में दवाइयों का बैग और दिल में सिर्फ एक जिद कि कैंसर को हराना है।
इस सफर में न जाने कितनी कठिनाइयाँ आईं। कई बार रिपोर्ट अच्छी आती, कई बार बहुत खराब। लेकिन मैंने कभी अपने परिवार को परेशान नहीं होने दिया। अच्छी रिपोर्ट उन्हें दिखा देता और खराब report अपने तक ही सीमित रखता। घर वाले पूछते, doctor ने क्या कहा? तो मेरा हमेशा एक ही जवाब होता सब ठीक है। उनके चेहरे की खुशी देखकर मुझे भी नई ताकत मिल जाती थी।
आखिरकार 2017 में शुरू हुई यह जंग 2022 में मेरी जीत के साथ खत्म हुई। मैंने ब्लड कैंसर को हमेशा के लिए टाटा... बाय-बाय... अलविदा कह दिया।
हाँ, मैंने कैंसर को हरा दिया, लेकिन इस लड़ाई ने मुझे शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से पूरी तरह निचोड़ दिया। फिर भी कोई अफसोस नहीं, क्योंकि आज मैं अपने बच्चों और परिवार के साथ हूँ। यही मेरी सबसे बड़ी जीत है।
इस कठिन सफर में मेरी प्यारी बहन और मेरे जीजाश्री ने जो साथ दिया, उसे मैं जीवनभर नहीं भूल सकता। मेरी जीत में जितनी मेरी जिद थी, उतना ही उनका विश्वास और सहयोग भी था।
आज मैं हर कैंसर मरीज से सिर्फ एक बात कहना चाहता हूँ
कैंसर का नाम एक कान से सुनो और दूसरे कान से बाहर निकाल दो। डर को अपने मन में जगह मत दो। खुद चट्टान बनकर बीमारी का सामना करो। जब इंसान की जिद मजबूत होती है, तो सबसे बड़ी बीमारी को भी हार माननी पड़ती है।
कितनी भी बड़ी बीमारी क्यों न हो, यदि हौसला बुलंद हो, आत्मविश्वास अटूट हो और परिवार का साथ हो, तो जीत निश्चित है।
हार बीमारी की नहीं, हिम्मत की होती है। इसलिए हिम्मत कभी मत हारिए।
🙏 सभी कैंसर योद्धाओं को मेरा सलाम। आप अकेले नहीं हैं। लड़िए, डटे रहिए और विश्वास रखिए एक दिन जीत आपकी होगी।
झूठे मुकदमों से दूसरों को फंसाने और पुलिस को गुमराह करने वालों पर राजस्थान पुलिस सख्त: एक महीने में 75 दोषियों को जेल-जुर्माना
• राजस्थान पुलिस की प्रभावी पैरवी का असर
जयपुर 02 जुलाई। राजस्थान में अगर कोई व्यक्ति किसी से अपनी निजी दुश्मनी निकालने के लिए पुलिस में बलात्कार, लूट या किसी अन्य गंभीर अपराध की झूठी कहानी गढ़कर एफआईआर दर्ज कराता है, तो अब उसका बचना नामुमकिन है। पुलिस को गुमराह करने और निर्दोष नागरिकों को परेशान करने वाले ऐसे समाजकंटकों के खिलाफ महानिदेशक पुलिस श्री राजीव कुमार शर्मा के निर्देशानुसार राजस्थान पुलिस ने गंभीरता दिखाई है और पिछले दिनों से कोर्ट के माध्यम से बड़ा विधिक अभियान छेड़ रखा है।
अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस (अपराध) श्री बिपिन कुमार पांडे ने बताया कि पुलिस की मजबूत पैरवी के कारण जून महीने (01 जून से 28 जून 2026) के दौरान पूरे प्रदेश में 75 ऐसे मामलों में न्यायालयों ने फैसला सुनाया है, जहाँ कोर्ट ने झूठी कहानी रचने वाले दोषियों को सजा और आर्थिक जुर्माने से दंडित किया है। इसके साथ ही, पुलिस की मुस्तैदी से 1,870 ऐसे मामलों में अदालतों ने संज्ञान लिया है, जिनमें झूठी शिकायत करने वालों पर अब बकायदा केस चलाया जाएगा।
जिलों ने किया बेहतरीन काम:
जब पुलिस अपनी तफ्तीश में किसी मामले को झूठा पाती है तो न्यायालय में रिपोर्ट प्रस्तुत करती है। इसमें राज्य के कई जिलों ने बेहतरीन काम किया है।
झूठी कहानियां रचने वालों को कोर्ट के कटघरे में खड़ा करने में नागौर जिला पूरे प्रदेश में अव्वल रहा, जहाँ अकेले जून महीने में 292 नए मामलों पर कोर्ट ने संज्ञान लिया, वहीं जयपुर ग्रामीण 247 नए मामलों के साथ दूसरे स्थान पर तथा अलवर (212) तीसरे स्थान पर रहा।
इसके अलावा जयपुर दक्षिण में 139, कोटपुतली-बहरोड़ में 120, हनुमानगढ़ में 110, जयपुर पश्चिम में 71 और जयपुर उत्तर में 59 ऐसे मामलों में कानूनी शिकंजा कसा गया है।
तथ्य छुपाकर गुमराह करने वालों को मिली सजा:
जून महीने में कुल 75 मामलों में कोर्ट ने दोषियों को सजा दी और जुर्माना ठोका।
मजबूत विधिक पैरवी के दम पर हनुमानगढ़ पुलिस ने रिकॉर्ड 18 मामलों में दोषियों को कोर्ट से सजा व जुर्माना मुकर्रर कराया। इस अभियान के दौरान प्रतापगढ़ पुलिस की सटीक पैरवी कोर्ट ने 9 मामलों में दोषियों को सजा सुनाई।
इसके अतिरिक्त जयपुर ग्रामीण में 6 मामलों, कोटा शहर में 5, अलवर, बांसवाड़ा व ब्यावर में 4-4, सवाई माधोपुर में 3, जयपुर दक्षिण, धौलपुर, झुंझुनू, डूंगरपुर, सिरोही, झालावाड़ और भीलवाड़ा में 2-2 तथा बीकानेर चूरू और जीआरपी अजमेर के 1-1 मामले में कोर्ट ने सख्त फैसला सुनाया।
कई लोग जमीन के विवाद, पैसों के लेन-देन या आपसी रंजिश के कारण दूसरों को डराने के लिए पुलिस तंत्र का गलत इस्तेमाल करते हैं। इससे न केवल पुलिस का कीमती समय बर्बाद होता है, बल्कि उन वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी होती है जिन्हें पुलिस की सबसे ज्यादा जरूरत है।
पुलिस मुख्यालय ने साफ चेतावनी दी है कि जो कोई भी व्यक्ति झूठे साक्ष्य गढ़ेगा या झूठी एफआईआर कराएगा, उसके खिलाफ कोर्ट के माध्यम से त्वरित ट्रायल कराया जाएगा।
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यह डॉ अनिल कुमार मीणा जी है,जालौर राजस्थान में कार्यरत है।
पहले उनके साथ अस्पताल में मारपीट ओर जातिगत उत्पीड़न होता है।
SC/ST एक्ट में FIR दर्ज कराने के बाद सरपंच प्रतिनिधि वीरेंद्र सिंह राजपूत द्वारा FIR वापस लेने फिर से जातिगत उत्पीड़न करके उनके सरकारी आवास में जान से मारने हेतु धमकाया जाता है।
अब FIR के कुछ बिंदु पढ़िए।
रात्रि लगभग 11 बजे एक मरीज सग्रामाराम (आयु लगभग 80 वर्ष) को उसके परिजन गंभीर अवस्था में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र दासपा लेकर आए थे।
मैंने तुरंत मरीज को अटेंड किया और उपलब्ध आपातकालीन प्राथमिक चिकित्सा व इनिशियल ट्रीटमेंट (इनिशियल ट्रीटमेंट) प्रदान किया।
मरीज की नाजुक एवं चिंताजनक स्थिति को देखते हुए मैंने परिजनों को स्पष्ट रूप से अवगत कराया कि मरीज सीरियस है अतः इसे तुरंत उच्च चिकित्सा केंद्र (हाई सेंटर) के लिए रेफर करना आवश्यक है। तदनुसार मैंने तुरंत मरीज का रेफरल कार्ड तैयार कर दिया तथा चिकित्सालय स्तर से त्वरित कार्रवाई करते हुए एम्बुलेंस (एम्बुलेंस) की व्यवस्था भी करवा दी। एम्बुलेंस उपलब्ध होने के बावजूद मरीज के परिजनों ने मरीज को तुरंत ले जाने से मना कर दिया और आनाकानी करने लगे परिजनों का कथित तौर पर कहना था कि हमारे घर पर काम है, हम सुबह लेकर जाएंगे अथवा हम इसे हमारे पर्सनल व्हीकल (निजी वाहन) से ही लेकर जाएंगे और वे एम्बुलेंस ले जाने से साफ मुकर गए। मरीज को विधिवत रेफर करने और एम्बुलेंस सुपुर्द करने के बाद, मैं रात्रि भोजन के लिए अस्पताल परिसर में ही स्थित अपने सरकारी क्वार्टर पर चला गया। फिर परिजनों की घोर लापरवाही और समय पर उच्च केंद्र न ले जाने के कारण लगभग 40 मिनट के बाद मरीज सग्रामाराम की अस्पताल परिसर में ही मृत्यु हो गई। मरीज की मृत्यु होते ही परिजनों ने अचानक उग्र व हिंसक रूप धारण कर लिया और ड्यूटी पर तैनात नर्सिंग ऑफिसर श्री रामलाल जी के साथ गाली-गलौज व मारपीट करते हुए, उन्हें जबरन पकड़कर मेरे सरकारी क्वार्टर की तरफ लेकर आए तथा बाहर चिल्लाने लगे कि डॉक्टर साहब को बाहर निकालो।
जैसे ही में चिल्लाने की आवाज सुनकर अपने क्वार्टर के पीछे के हिस्से से बाहर अस्पताल परिसर की तरफ आया, वहां खड़े परिजनों में शामिल 5 पुरुषों (मेल) ने मुझे देखते ही तुरंत मेरे साथ बेरहमी से मारपीट शुरू कर दी और चिल्लाने लगे कि आपने हमारे बाप को मार दिया है और अब हम आपको मारेंगे। वे पांचों पुरुष मुझे रास्ते में लगातार बर्बरतापूर्वक थप्पड़ मारते और पीटते हुए जबरन खींचकर अस्पताल के वार्ड (वार्ड) के अंदर लेकर चले गए और फिर आगे का पूरा हिंसक प्रकरण व मारपीट अस्पताल वार्ड के अंदर की गई, जहाँ उनके साथ उपस्थित एक महिला (फीमेल) भी इस पूरे कृत्य में उनकी मदद कर रही थी तथा पुरुषों में से एक ने मेरे सिर पर किसी अज्ञात ठोस वस्तु (ऑब्जेक्ट) से जोरदार वार किया जिससे मुझे गंभीर चोट आई। हमलावरों ने हमें धमकाते हुए सख्त हिदायत दी कि अपने-अपने मोबाइल फोन जेब में ही रखो, कोई भी अपने फोन को टच (स्पर्श) नहीं करेगा और उन्होंने हमें किसी को भी फोन लगाने या सूचना देने से पूरी तरह रोक दिया। इसके बाद उन्होंने हमें जान से मारने की प्रत्यक्ष धमकियां देते हुए कहा कि तुम्हें जान से मार देंगे, तुम्हारा गला काट देंगे, तुम्हारी गर्दन और पूरा शरीर अलग करके कुएं में डाल देंगे, यह दासपा है और यहां किसी को पता भी नहीं चलेगा। इस घोर मानसिक व शारीरिक खौफ के साए में उन्होंने मुझसे जबरन दबाव बनाकर एक नोट (पत्र) लिखवाया कि मैंने गलत इंजेक्शन लगाकर मरीज को मार दिया है और इसका मुआवजा कौन देगा अपनी तथा नर्सिंग स्टाफ की जान बचाने के लिए मुझे मजबूरन उस झूठे पत्र पर हस्ताक्षर करने पड़े और उन्होंने नर्सिंग ऑफिसर रामलाल जी से भी उस पर जबरन हस्ताक्षर करवा लिए। 7. यह कि इसके बाद आरोपियों ने हमें उसी वार्ड में बंद करके बंधक (होस्टेज) बना लिया और पानी पीने अथवा शौच (पेशाब) तक जाने की अनुमति नहीं दी तथा खड़े रहने पर मजबूर किया।
आरोपियों ने हमें उसी वार्ड में बंद करके बंधक बना लिया और पानी पीने अथवा शौच (पेशाब) तक जाने की अनुमति नहीं दी तथा खड़े रहने पर मजबूर किया। इसी दौरान उन्होंने जातिगत द्वेषता व दुर्भावना प्रदर्शित करते हुए मेरी जाति के बारे में पूछा और मेरे द्वारा स्वयं को मीणा बताने पर अत्यंत अपमानजनक व जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा कि मीणा, चमार तुमको कोई नॉलेज नहीं है तुम यहाँ के नहीं हो और यहाँ के बारे में कुछ नहीं जानते, तुम्हारी पगार कितनी है, सरकार तुम्हें कितनी पगार देती है, तुम्हारे पास डॉक्टर की डिग्री है भी या नहीं है।
घटना के 8 दिन बाद भी @JalorePolice ने अभी तक आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया है।
@BhajanlalBjp@RajPoliceHelp@RajCMO
यदि आप यह मानते हैं कि प्रतियोगी परीक्षाओं में केवल मेहनत ही सफलता का निर्धारण करती है, तो मुझे लगता है कि यह पूरी सच्चाई नहीं है।
राजस्थान में विशेष रूप से कर्मचारी चयन बोर्ड द्वारा आयोजित कई परीक्षाओं में अक्सर 10 12 तक प्रश्न बाद में डिलीट कर दिए जाते हैं। यह केवल एक तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि हजारों अभ्यर्थियों के भविष्य से जुड़ा गंभीर विषय है। सवाल यह है कि यदि वे प्रश्न गलत थे, तो उन्हें प्रश्नपत्र में शामिल ही क्यों किया गया? और यदि शामिल किए गए, तो प्रारंभ में उन्हें सही मानकर परीक्षा का हिस्सा क्यों बनाया गया?
जब अभ्यर्थी आपत्तियाँ दर्ज कराते हैं, तब उन प्रश्नों को हटा दिया जाता है। लेकिन इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा नुकसान उन विद्यार्थियों को होता है जिन्होंने उन प्रश्नों के सही उत्तर दिए थे। एक गलत प्रश्न-निर्माण की कीमत वे बच्चे चुकाते हैं, जिन्होंने पूरी ईमानदारी और मेहनत से तैयारी की थी।
कई बार यही डिलीट हुए प्रश्न किसी अभ्यर्थी को चयन सूची से बाहर कर देते हैं। यह केवल अंक खोने की बात नहीं होती, बल्कि उसके आत्मविश्वास, उसके सपनों और उसके वर्षों की मेहनत पर भी गहरा प्रभाव डालती है। जो अभ्यर्थी इस पीड़ा से गुज़रा है, वही समझ सकता है कि अंतिम चयन से कुछ अंकों से बाहर हो जाना कितना दर्द देता है।
आख़िर आयोग की गलती ईमानदार बच्चा क्यों भुगते
डॉ धीर सिंह धाभाई
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Ras 2024 मे सुमित्रा बिश्नोई ने 22 साल की उम्र मे 1st अटेम्प्ट से ऑल राजस्थान मे 64 वी रैंक हासिल की।
सुमित्रा बिश्नोई ने कहां से कोचिंग की...कौनसी किताबे पढ़ी... तैयारी की पूरी जरनी कुछ इसप्रकार है। 👇