पुस्तक समीक्षा: रमाशंकर सिंह सर की किताब 'नदी पुत्र: उत्तर भारत में निषाद और नदी ' की समीक्षा लिखी है।
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कल 3 फरवरी, 2026 को जो घटना हुई उसने विश्वविद्यालय में व्याप्त जातिवाद को उजागर कर दिया। दिशा छात्र संगठन के कुछ छात्र बरगद लॉन में बैठकर यूजीसी के नए रेगुलेशन पर चर्चा कर रहे थे। तभी छात्रों एक उग्र समूह उनकी तरफ आया। पढ़ें, गोविंद निषाद की यह रपट
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‘सक्षम प्राधिकारी’ की अस्पष्टता और स्थान निर्धारण के अभाव ने स्थिति को अघोषित प्रतिबंध में बदल दिया है, जिससे अभिव्यक्ति और छात्र राजनीति दोनों प्रभावित हो रही हैं.
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 8 सितंबर, 2025 के नोटिस के बाद परिसर में किसी भी छात्र गतिविधि के लिए पूर्व अनुमति अनिवार्य कर दी गई है.
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@officialGovindN हिंदी और उर्दू की धार्मिक अस्मिता से जुड़ाव क्या केवल अंग्रेज़ों की देन थी या इसमें भारतीय विद्वानों की भी कोई भूमिका थी? इन सवालों की बहुत गहन और सारगर्भित पड़ताल शुभनीत कौशिक की हालिया किताब ‘भाषा की राजनीति, ज्ञान की परम्परा' करती है.
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इस पार्क के तार 1857 की क्रांति से भी जुड़े हैं। इसके नीचे दफ़न दो गाँव शमसाबाद और छीतपुर के मेवातियों ने विद्रोह में भाग लिया था। बाद में इन्हीं दोनों गाँवों को ज़मींदोज़ कर दिया गया। इसके ऊपर अल्फ़्रेड पार्क बनाया गया। यहाँ बैठे अक्सर मुझे लगता है कि किसी घर के ऊपर तो नहीं बैठा हूँ। आगे बसे आठ गाँव को ज़मींदोज़ करके सिविल लाइंस बना। पार्क के एक हिस्से में राष्ट्रीय संग्रहालय की स्थापना की गई। 1905 के आस-पास दूसरे शहरों की तरह यहाँ भी रानी विक्टोरिया की मूर्ति की स्थापना हुई।
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छात्र गतिविधियों पर लगते अंकुश, सिसक रहा इलाहाबाद विश्वविद्यालय
पिछले वर्षों में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र गतिविधियों और बहस-विमर्श की जगह सिकुड़ रही है. प्रशासनिक शिकंजा कसता गया है. इस संस्थान की आत्मा को मार दिया गया है.
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रामचरण मल्लाह और मल्लाहों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का सौ साल पुराना संघर्ष
रामचरण मल्लाह एक प्रशिक्षित वकील के रूप में 20वीं सदी के शुरुआती दौर में लखनऊ में निषाद और मल्लाह जातियों की एक प्रमुख आवाज़ बनकर उभरे. | @officialGovindN✍️
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1925 में उन्होंने निषाद/मल्लाह समुदाय में राजनीतिक जागरूकता लाने के उद्देश्य से ‘अखिल भारतीय निषाद महासभा’ की स्थापना की थी.
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14 अगस्त और 25 जनवरी को आधे बेला की कक्षाएँ होतीं, मतलब कि एक बजे के बाद छुट्टी। …आधे बेला की छुट्टी इसलिए होती कि छात्र अपनी पूरी तैयारी से अगले दिन आएँ। इसमें सबसे ख़ास बात होती कि सबके कपड़े धुले हुए हों।
यहाँ पढ़ने वाले ज़्यादातर छात्र ग़रीब घरों से आते थे, जिनके लिए दो कपड़े सिलवाना बाप के सिर का बोझ बढ़ा देना था। इसलिए ज़रूरी था कि बच्चे कपड़े धुले हुए पहनकर आएँ। उस दिन हम हाथों से पन्नों पर तिरंगा ऐसे बनाते रहे, जैसे आसमान में बादल अटखेलियाँ कर रहे हों और हर बार कुछ बादल उड़ कर इधर से उधर हो जाते थे। बहुत कोशिश के बाद मैं सफल हो पाया था, रंगों को क़रीने से सजाने में। फिर उसको बाँस की शाखा जिसे कइन कहते हैं—उसके शीर्ष पर लगाया और झंडा फहराने लगा। कल इसी को लेकर स्कूल जाना था।
• गोविंद निषाद
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राष्ट्रीय स्तर पर ईबीसी की विशेष मान्यता के शुरुआती अधिवक्ता एल.आर. नायक मंडल आयोग के सदस्य थे. 1980 में उन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशों से असहमति जाहिर कर, सभी ओबीसी जातियों को एक ही सजातीय समूह मानने के खतरों के बारे में चेतावनी दी थी.
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1925 में उन्होंने निषाद/मल्लाह समुदाय में राजनीतिक जागरूकता लाने के उद्देश्य से ‘अखिल भारतीय निषाद महासभा’ की स्थापना की थी.
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‘हिन्दवी उत्सव’ के कई सत्र थे, कई नामचीन वक्ता, परिचित चेहरे, पुराने मित्र। पर मेरे लिए सबसे बड़ा आकर्षण ‘ऑल इंडिया कैंपस कविता’ का सत्र रहा। यह एक सत्र नहीं था, यह एक प्रमाण था—इस बात का कि भाषा में अभी भी जीवन है, साहित्य में अब भी आग है, और युवाओं में अब भी ज़िद है कुछ कहने की, कुछ बदलने की।
• ज्ञान चंद बागड़ी
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27 जुलाई 2025 को ‘हिन्दवी उत्सव’ के अंतर्गत संपन्न हुए ‘ऑल इंडिया हिन्दवी कैंपस कविता’ के विजेता रहे :
• प्रथम : गौरव सिंह (हैदराबाद विश्विद्यालय)
• द्वितीय : तल्हा ख़ान (दिल्ली विश्वविद्यालय)
• तृतीय : गोविंद निषाद (गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, प्रयागराज)
सबको बधाई और शुभकामनाएँ 💐
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फ़ाइनल लिस्ट तैयार करने के लिए—11 जुलाई से 14 जुलाई तक—संपादकीय टीम द्वारा एक-एक कविता पर विचार किया गया—इस बात की जानकारी के बग़ैर कि कवि-प्रतिभागी कौन है…
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