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अब त बूढ़ो बड़ चलावें
रात रात के जगावें
हमके नवका वाले "फ़्रांड" से मिलाइ दा
कि जेन-जी बनाइ दा असों
पिया इंस्टा में कजरी गवाइ दा
कि जेन- जी बनाई दा असों...!!
- Oma The Akk
बड़ा इस्लाम फैला है, बहारों के महीने में...." !
मग़र जब दिन सुलगते हैं
जली जाती है हरियाली
तपा जाता है जब मौसम
दहक उठती है जब धरती
जब आलम गेरुआ सी आग पहने तमतमाता है
ये जलते-शहर के सब पेड़ तब भी यूँ झुके रहते
इन्हें पक्का अक़ीदा है
मेहरबा��-आसमानो पर
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बरस जाते हैं जब बादल
तो पेड़ों पर सभी पत्ते
नहा कर झूम जाते हैं|
बहुत बरसात है अबकी बरस
रमज़ान के दिन में|
बरसती बर्क जब--
टहनी के दोनों हाथ उठते हैं
कि, गोया,
नन्हे बच्चे हाथ फैलाए दुआ में हों..
शज़र के शाखों-गुन्चे क्या
तने तक सब्ज़ दामन हैं|
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भय! तू विश्व मे सबसे पुराना व्यापार है!
भय! तू सत्ता का प्रबलतम हथियार है!
भय! तू संगठनों का बल है!
भय! तू आधा सच आधा छल है!
भय! तू विनाश की पहली आहट है!
भय! तू अन्तिम छटपटाहट है!
भय! तू भोगी का भोग है!
भय! तू जोगी का जोग है!
भय! तू महात्माओं का पाप है!
भय! तू एकमात्र अभिशाप है!
नदी में कितना ही पानी बह जाये
पर नदी कभी नहीं बहती
और अगर कभी कोई नदी बह जाये
तो साथ-साथ बह जाती हैं
लाखों कहानियाँ
सैकड़ों शास्त्र
दसियों सभ्यताएँ
कोई अद्भुत संस्कृति
कोई महान राष्ट्र!
(ऋषिकेश में सुन���दर गंगा को देख देश से विलुप्त होती गंगा के नाम)
- Oma The Akk
“नदी प्रदूषित हो रही है
हास्यास्पद है न
जो बह रहा हो
वह प्रदूषित नहीं हो सकता
प्रदूषण के लिए ठहरना आवश्यक है
पर ठहरी हुई धार नदी तो नहीं होती...!!"
- Oma The Akk
"नदी देख ��ही है असभ्यता का विस्तार
सभ्यता के आवरण में!
कुसंस्कृति का प्रवाह
संस्कृति का ध्वज उठाए!
धूर्तता की बाढ़
सूचना का कोलाहल करते!
किन्तु नदी
फिर भी चुपचाप बह रही है
क्यों कि सब बह जो जायेगा कभी न कभी...!!"
- Oma The Akk
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और अचानक कितने चेहरे
कितनी बातें
नाम,सदाएं
सब से पर्दा भर भर जाता!
इतने भरे भरे पर्दे में
पूरी आधी सदी बिताना
कम होता है?
पूरी आधी सदी बिताना जादू सा है
जादू ही तो
आख़िर ये जीवन होता है!!
आधी सदी ��ेखना भी तो
जादू जादू जैसा लगता
एक सिनेमा जैसा
जो सादे पर्दे पर शुरू हुआ था
नाम नहीं
ना चेहरा मोहरा
ना कोई आवाज़
ना हरक़त
सिर्फ़ अंधेरा
सिर्फ़ उजाला
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दुआ के बदले में मांगते ज़र
बने हुए उम्मतों के रहबर
लड़ा रहे अपने अपने गुर्गे
बना के शरीयत का इक बहाना...
प्रभु के सेवक ख़ुदा के बन्दे
सियासतों के उठाए फंदे
फंसा रहे सीधी साधी जनता
बना रहे क़ौम को निशाना
न साधुओं का कोई भरोसा
न मौलवी का कोई ठिकाना!!
- Oma The Akk
न साधुओं का कोई भरोसा
न मौलवी का कोई ठिकाना
इबादतों में मिला है धोखा
अजब ज़माना है ये ज़माना...
चुरा रहे मंदिरों की पेटी
उड़ा रहे मस���जिदों के पैसे
नज़र टिकी ऐश के ठिकाने
बता रहे दिन का ठिकाना...
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