ईसाई और इस्लामवादी दुनिया को कन्वर्ट करना चाहते हैं या रक्तपात चाहते हैं। हिंदू मगर इस सभ्यता का वाहक है। हमारा ध्यान सिर्फ मानवता पर केंद्रित रहा है, निस्वार्थ भाव से, यही मानवता हिंदुओं को सर्वश्रेष्ठ बनाती है। जहाज को बचाने वाले कप्तान का सम्पूर्ण हिंदू समाज ऋणी है। वही हमारे मिशनरी हैं, वही धर्मयोद्धा।
In this video, I explain the entire history of this fraud pastor, from pocketing tsunami funds to using Dalit kids as props for dollars. Archbishop D’Souza built a ₹296 Cr empire.
पहले एक कहानी गढ़ी जाती है, फिर दस-बीस साल में उसी के रिफरेन्स से कोई लेख लिखा जाता है... धीरे-धीरे ये बताना बंद कर दिया जाता है कि कथा तो काल्पनिक थी, इस तरह एक नैरेटिव गढ़कर झूठ को सच बना दिया जाता है...
देखिए और सीखिए कि हमारा सामना किनसे है और फिर सोचिये कि हमारी ओर से जिन्हें लड़ने उतारा है, वो कुछ कर भी रहे हैं क्या?
दोस्ती, प्यार, वफा, ईमानदारी जैसे नैतिक मूल्यों से भी बड़ी चीज है अनुशासन। तेंदुलकर और कांबली में वही फर्क था। अपने अनुशासन की वजह से तेंदुलकर तेंदुलकर बन गये और अनुशासनहीनता की वजह से कांबली कांबली बन गये। दूसरों पर दोषारोपण करने से क्या होगा। बोए पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होए।
जब हम कहते हैं कि "मंदिर पर्यटन स्थल नहीं है", तो एक पार्टी विशेष के समर्थकों की #भावना_बेन तुरंत आहत हो जाती है। उनका मंदिरों की विशिष्ट परम्पराओं (विशेष तौर पर बलि) से विरोध ही यही कहकर शुरू होता है कि पर्यटक नहीं आयेंगे। अदालती फैसलों में भी बिलकुल यही तर्क सुनाई देगा।
जब आप मंदिरों को पर्यटन स्थल बना देंगे, तीर्थयात्रा कहीं घूमने जाने जैसी होगी, तो कर्तव्यबोध भी लुप्त होगा। सिर्फ मजे लेने पर ध्यान होगा तो डीजे भी आएगा, कल को पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए शराब आदि की बिक्री और नाईट क्लब खुलवाने की बात भी होगी। जब शुरू हो गया तो कहाँ रुकेगा, क्या पता?
हर मंदिर की अपनी धार्मिक पद्धतियाँ हैं और उन्हें अपनी धार्मिक पद्धतियों का पालन करने का तब तक अधिकार है जबतक वो जनता के स्वास्थ्य या कानूनी व्यवस्था आदि पर चोट नहीं पहुँचा रहे। ये अलग बात है कि पिछले कई दशकों से सरकारें हिन्दुओं को उनके संवैधानिक अधिकार नहीं देती हैं।
मंदिर पर्यटन स्थल नहीं है। मंदिरों का नियंत्रण, उनकी पद्धतियाँ, उस देवी-देवता को मानने वालों के हाथ में होने चाहिए। सरकारों को घुसपैठ बंद करनी होगी।
बीवी-बच्चों के साथ बौद्ध भंते के सामने जमीन पर बैठकर गौरवान्वित महसूस करने वालों को शायद तब समानता याद नहीं आती। लेकिन अगर यही दृश्य किसी सनातनी के अपने पूज्य ऋषि-मुनियों के सामने बैठने का होता, तो तुरंत 5000 साल के चोचन और असमानता की वही घिसी-पिटी कहानी शुरू हो जाती।
पहले अपना दोहरा मापदंड और सोच सुधारिए,
फर्जी डॉक्टर
आशा ही नहीं, विश्वास भी है कि आपने टिप्पणियों को देखकर अनदेखा कर दिया होगा, फिर भी:
1. जिस #ओबीसी वर्ग पर #मोदी_एक्ट के अधिकांश मामले दर्ज होते हैं, उन्हें पीड़ितों के साथ रखकर आप #दलित समाज से उनका सुरक्षा कवच अपने ओबीसी समुदाय के हक में क्यों छीनने पर तुले हैं?
2. संविधान जिस बराबरी की बात करता है, वो #समान्य_वर्ग को क्यों नहीं देना चाहते?
It’s unfortunate that Sahil committed suicide. But the question is: why wasn’t he comfortable telling his parents about what had happened?
There is no established caste angle here. Neither did Sahil mention caste discrimination anywhere, nor have his classmates said anything suggesting that caste was involved.
Now, Ambedkarites and his parents are building a circumstantial case of caste discrimination and presenting it through a media trial, despite the absence of any direct evidence.
That is not a sign of a judicious character.
I saw this one today and started thinking "In which all of my articles would I have argued that fab will trigger a flood of these". I 'll QT this w/ Google-AI result
"Tata's chip plant to have 450 suppliers, building 363-acre vendor park to house them"
https://t.co/EFJAQY1KHB
Since Nikhil Kamath and his stupid choice of Faye Dsouza etc are in trend, here's the only podcast I've ever done.
Zero filter. OG Shivam Vahia on camera.
Thank you @PowerTrain_YT for this.
Link: https://t.co/KvJNuV554d
I once had an interview with Azeem when I was looking for my first job.
I was young, excited, wanting to become a writer.
East India Comedy used to work from a 3-BHK at the time. Sahil Shah had helped me land the interview.
Azeem looks at my CV and the first thing he tells me is - "I have blocked you on Twitter."
I thought it was a strange way to begin an interview. I had never interacted with him on Twitter. We never had even an exchange or any conversation.
So he opens my profile on his laptop, unblocks me (so he can access the Tweets) and then scrolls down and reads a few tweets till he finds one particular tweet and says - "Ah yes, it was this one."
AIB at that time had made a video where they made jokes on cows / gaumutra in the sketch. I had put out a tweet stating that it was easy for comics to make jokes on Hinduism but I've never seen them take such liberty with other religions / faiths / beliefs. And that they were not equal opportunity offenders.
I was asked to 'explain' this tweet. And so I did. And it led to a discussion and argument for over 10 minutes, where I was repeatedly told I was wrong, after which the interview ended. I had applied to be a 'writer' and I was asked nothing about it - what I had written, what I wanted to write, my skillsets and so no. Nothing.
I was too young to be confident or have strong self belief, and I walked out thinking maybe I shouldn't have put out that tweet - it cost me this job.
What I found strange even back then, was that a person much senior to me in the profession, would be fixated on some tweet, and was not open to another opinion or point-of-view that was different from his.
Surely, it would help to have people with different views writing for a news satire show?
I was naive.
The goal is never diversity of thought or opinion.
The view or angle is always pre-decided. All they need is people to further it.
जो काम @RitikaChopra__ ने किया है, उसे पत्रकारिता कह देना शायद पत्रकारिता की भूमिका को बहुत सुविधाजनक ढंग से छोटा कर देना है।
उन्होंने व्यवस्था के भीतर मौजूद असहमति, आपत्तियों और प्रक्रियागत विवादों को सार्वजनिक किया है। यह महत्वपूर्ण है। लेकिन इसे पत्रकारिता का अंतिम बिंदु मान लेना पर्याप्त नहीं है। अधिक से अधिक इसे सत्ता की आंतरिक प्रक्रिया को सार्वजनिक करना, अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर आरोप लगाना और उसके भीतर मौजूद अंतर्विरोधों को सामने लाना कहा जा सकता है।
पत्रकारिता की कठिन परीक्षा इसके बाद शुरू होती है। Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्तियाँ दर्ज कीं। रिपोर्ट में इन आपत्तियों का संबंध नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम जोड़ने या हटाने, मतदाता सूची की बहाली और चुनावी डेटा के केंद्रीकरण जैसे गंभीर विषयों से बताया गया है।
लेकिन इसके बाद कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आता है। ECI ने Indian Express की रिपोर्ट के जवाब में कहा कि अलग-अलग विचार और टिप्पणियाँ किसी भी संस्थागत deliberation का सामान्य हिस्सा हैं और पिछले एक वर्ष में आयोग के सभी निर्णय पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
अब पत्रकारिता का अगला प्रश्न क्या होना चाहिए?
यही कि यदि आपत्तियाँ दर्ज हुई थीं, तो उनका संस्थागत निपटारा कैसे हुआ?
क्या उन्हें स्वीकार किया गया?
क्या उन्हें अस्वीकार किया गया?
क्या उन पर चर्चा हुई?
क्या कोई संशोधन किया गया?
और जिन निर्णयों को अंततः सर्वसम्मत कहा जा रहा है, उनके पीछे वह प्रक्रिया क्या थी जिसके द्वारा दर्ज असहमति अंतिम निर्णय में समाहित या समाप्त हुई?
क्योंकि किसी संस्थान के भीतर मतभेद का अस्तित्व अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि संस्थान ने गलत निर्णय लिया। लोकतांत्रिक संस्थाओं में असहमति का महत्व केवल उसकी मौजूदगी होना नहीं होता, अपितु उसके संस्थागत निपटारे की पारदर्शिता में है।
यदि कानून आयोग के भीतर मतभेद की स्थिति में बहुमत के आधार पर निर्णय की अनुमति देता है, तो किसी निर्णय को महज इसलिए किसी एक व्यक्ति का व्यक्तिगत निर्णय कहना भी अधूरा होगा। और यदि किसी मामले में कानून या प्रक्रिया सर्वसम्मति की अपेक्षा करती है, तो यह देखना और भी जरूरी हो जाता है कि वह सर्वसम्मति बनी कैसे।
इसलिए सवाल 'दो चुनाव आयुक्तों ने क्या कहा?' की जगह 'आयोग ने आखिर किया क्या?' होना चाहिए.. प्रश्न होना चाहिए कि ऐसा
किस प्रक्रिया के तहत किया?
किस कानूनी आधार पर किया?
दर्ज आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई?
और अंतिम निर्णय तक पहुँचने की संस्थागत प्रक्रिया क्या थी? ये होने चाहिए थे सवाल। लेकिन ये सब तो नदारद है और महज आपसी चुगली है।
व्यवस्था की खामियों को उजागर करना पत्रकारिता का एक आवश्यक हिस्सा है। लेकिन व्यवस्था को सार्वजनिक रूप से कटघरे में खड़ा कर देना और व्यवस्था की कार्यप्रणाली को समझ लेना, ये दो अलग चीजें हैं। पहला अपेक्षाकृत आसान है। दूसरा कठिन।
क्योंकि वास्तविक पत्रकारिता केवल सत्ता और सिस्टम के भीतर संघर्ष पर बयान देना नहीं है। वह यह भी खोजती है कि संघर्ष किस प्रश्न पर है, संस्थागत नियम क्या कहते हैं, निर्णय किसने और किस अधिकार से लिया, जवाबदेही कहाँ निर्धारित होती है और सुधार की वास्तविक गुंजाइश कहाँ मौजूद है।
अगर Indian Express की रिपोर्ट के बाद ECI स्वयं कह रहा है कि पिछले एक वर्ष के सभी निर्णय पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से हुए हैं, तो पत्रकारिता का अगला स्वाभाविक कदम इसी दावे की जाँच होना चाहिए।
इंडियन एक्सप्रेस ने ECI पर जो अटैक किया, उसकी पोल खुल गई है, 13 करोड़ नाम कटने की कहानी पर ERO कहते हैं 'आदेश हमारे थे'। यानी दिल्ली में रिमोट कंट्रोल की मनुहार कहानी @RitikaChopra__ ने अपने दिवास्वनों के आधार पर तैयार कर के बेची है।