चंद्रगुप्त मौर्य जैन नहीं थे न ही चाणक्य उनके ��ुरु थे।
इन दोनों फेक न्यूज़ को अंग्रेजों के समय लाया गया।
सम्राट असोक के अकूत बौद्ध एम्पायर को देख बाक़ी पंथ संप्रदाय भारतीय इतिहास में न सिर्फ़ अपने को बौना महसूस करने लगे थे बल्��ी अपने पुरखों की किसी भी तरह की कोई उपलब्धि न देख गहरे सदमे में भी थे।
इसी कड़ी में एक फ़ेक न्यूज़ फैलायी गई कि कर्नाटक में 7 वी सदी के एक शिलालेख में चन्द्रगुप्त मौर्य और उनके जैन गुरु का ज़िक्र आया है। जाँच हुई पता चला फ़ेक न्यूज़ थी उस पूरे शिलालेख में कही भी चंद्रगुप्त मौर्य का ज़िक्र नहीं था बल्की एक अंग्रेज ने किसी दूसरे नाम को चंद्रगुप्त होने की आशंका जतायी थी। कुछ ही वर्षों में दूसरे स��ी स्कॉलर ने जाँच की और पाया कि वो आंशका ग़लत थी।
चंद्रगुप्त मौर्य का जैन धर्म से कुछ भी लेना नहीं था। ब्लकी चंद्रगुप्त मौर्य तो सुरू से ही बुद्धिस्ट थे (मैगस्थनीज़ की इंडिका) यहाँ तक की उनके कई पीढ़ी पूर्व के पुरखे बुद्ध के समय अंगार स्तूप, बुद्ध अस्थियों पर बनवाये थे जिसे पाँचवी सदी में फह्यान ने अपनी आँखो से वो स्तूप देखा था और उसे अपने नोट में भी लिखा।
नावजुद्दीन सिद्दीकी अपनी पत्नी अंजना पांडेय के साथ कितना खुश है l
मुखपुत्रों की बहिन बेटियों को जिनसे प्यार होता है उन्हीं से ये लोग नफरत करने लगते हैं l
ऐसा क्यों है? कोई तो सम��ाए
#hindumuslim
#weareindian
मन��वादी महिला पुरुष से भी ज़्यादा ख़तरनाक होती है, यह चुनपरी वीना शर्मा है, जो उत्तर प्रदेश के हापुड़ के स्कूल में प्रिंसिपल है, इसने एक बच्ची को बेरहमी से चोटी पकड़कर मारा, जब परिजन शिकायत करने गए तो उसका बिहेवियर बिल्कुल द्रोणाचार्य की शिष्या जैसा था 🔥
EWS भविष्य में देश के लिए अभिशाप है
जल्द समाप्त होना चाहिए नहीं तो खतरा बना रहेगा
ब्राह्मण डॉक्टर पंकज त्यागी का ताज़ा कारनामा, मेरठ UP 🚨🚨🚨
एक मासूम बच्ची खेलते-खेलते गिर गई, आँखों के ठीक ऊपर हल्की सी चमड़ी फट गई, खून भी नाम का था। माँ-बाप घबराकर पंकज त्यागी के क्लिनिक ले गए।
इस महान “डॉक्टर” ने 5 रुपए वाली फेविक्विक उठाई और सीधा बच्ची की आँख के ऊपर चिपका दिया, ऊपर मोटी पट्टी लपेटकर बोला – “बस हो गया, घर जाओ।
”रात भर बच्ची दर्द से तड़पती रही, चीखती रही, नींद नहीं आई। सुबह किसी अच्छे अस्पताल ले गए तो डॉक्टर देखकर दंग रह गए। फेविक्विक ने स्किन जला दी थी, केमिकल बर्न हो गया।
बड़ी मुश्किल से ग्लू हटाया गया, बच्ची की स्किन उखड़ गई, फिर 4 टांके लगे और हफ्ते भर दवा चली।
यही हैं मनुवादी डॉक्टर! इनके लिए तो सिर्फ़ कथा-वाचन और रामायण सुनाकर मोटा चंदा उड़ाना ही सही काम है।
मेडिकल साइंस, इलाज-विलाज इनके बस का नहीं। फेविक्विक लगाकर मासूमों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं।
पंकज त्यागी जैसे लोगों का लाइसेंस तुरंत कैंसल करना चाहिए!
पोस्ट क्रेडिट ~ @LakhanmeenaIND
ब्राह्मणो को छोड़कर भारत में कोई हिन्दू है ही नहीं। भारत के लोग पहले बौद्ध थे आज भी बौद्ध है। क्योंकि उनके पुर्वजों ने कभी बौद्ध धर्म छोड़कर हिंदू धर्म अपनाया नहीं तो ये विदेशी ब्राह्मण ऊनको हिंदू कहने वाले होते कौन हैं।
जिस देश में जज के घर से नोटों का बोरा मिलता हो ,
IAS, IPS, IRS फेक सर्टिफिकेट पर नौकरी कर रहे हों ,
ढाई साल की मासूम बच्ची का रेप हो जाता हो ,
फर्जी मुकदमें में 39 साल तक जेल काटनी पड़ती हो ,
सांसदों और विधायकों को पैसों से खरीद लिया जाता हो ,
उस देश किसी गरीब को न्याय मिलना एक असंभव कार्य लगता है ।।
महानुभाव ये भी क्यों नहीं बता देते कि बाबर को बुलाने वाले और उसके परिवार को संरक्षण देने वालों की औलादों का बोलबाला भी खत्म होने चाहिए। स्कूल कालेजो में पढ़ाया जाना चाहिए कि उसे बुलाने वाला और संरक्षण देने वाले कौन थे। ये जानकारी आपको "बाबरनामा और अकबरनामा से ही मिलेंगी।
हिन्दू धर्म का देवी devtao का सच ✅✅
दुनिया में नस्ल भेद है रंग भेद है लेकिन
जाति भेद नही है 😎😎😎 सिर्फ भारत में ही ब्राह्मणधर्म का जातिवाद भरा पड़ा है 😂😂
यूपी –
ललितपुर जिले में पत्रकार देवेंद्र कौशिक गौशाला की कवरेज करने गए थे। सचिव जी ने कुछ महिलाओं को पत्रकार के पीछे दौड़ा दिया। अब पत्रकार पर SC–ST एक्ट, पैसे मांगना सहित कुल 8 धाराओं में FIR हो गई है।
गौशाला की तस्वीरें दिखाना गुनाह हो गया...
.@dm_ghaziabad
DM साहब
मैं इंदिरापुरम के एक अपार्टमेंट में रहता
हूं . मेरे यहां आज तक न कोई BLO आया है , न कोई FORM दे गया है .
सोसाइटी से जिस BLO का नंबर मिला, उसे आज मैंने खुद फोन किया है . उन्होंने बताया कि मेरा फॉर्म उनके पास नहीं है . एक दूसरी लेडी BLO वहां मिलीं. उनसे से पूछा तो मेरा फॉर्म उनके पास भी नहीं है .
अब आगे किससे पड़ताल की जाए ? कहां से FORM मिलेगा?
इसका नाम भरत जैन है, मुंबई में पहले भीख मांगता था फ़िर उसने 18000 भिखारियों की फ़ौज खड़ी कर दी, महीने की इनकम 7 करोड़ है, यह भिखारियों को शेल्टर और खाना प्रोवाइड करवाता था बदले में उनसे 20% हिस्सा लेता था,
इसके घर से 460 करोड़ नगद बरामद हुए हैं, इसके पास 8 विला है, 8 महंगे फ्लैट है, 2 बेशकीमती बंगले है, 22 करोड़ का नया घर खरीदने गया तो पकड़ा गया, IIM कलकत्ता से पढ़ा लिखा है,
यह अब तक का सबसे अमीर भिखारी है, भीख मांगने का अविष्कार किसने किया आप जानते हैं...
यह जो महिला मिलिटेंट लीडर हिडमा के दाह संस्कार से पहले उस को नमन कर रही है उसका नाम सोनी सोरी है!
जिस महिला को निर्दोष होते हुए केवल इस लिए गु'प्तां'गों में पत्थर और मिर्च का पावडर भ'र दिया था कि वो एक आदिवासी थी,
और अपने जमीन और जंगल को माइनिंग के लिए विरोध कर रही थी!
वो कोई हथियारबंद न'क्स'ल नहीं थी, उसका दोष केवल यह था की उस ने खनन क�� ख़िलाफ़ आंदोलन किया और ग़रीब आदिवासी समाज के साथ हो रहे अन्याय को रोकने का प्रयत्न किया था!!
किसी भी समाज में महिलाओं का शोषण उत्पीड़न अगर शासक और दबंग करे तो उस समाज परिवार का प्रत्युत्तर होता है!
और हिडमा जैसे लोग अर्से में पैदा होते है!
जो लोग सदियों से हजारों सालों से जंगल में रहते आये है वो लोग अगर भगाए जाएंगे तो विरोध ज़रूर होगा और निजाम हर शांतिपूर्ण विरोध को दमन करेगा और दमन के बाद ज़िंदा लोग उत्तर जरूर देते है!
कभी अफ़्रीकी देश कांगो के कम्युनिस्ट लीडर पैट्रिक लुलुंबा की हत्या पे जवाहर लाल ने कहा था कि एक लुलुंबा हज़ार लुलुंबाओं को जन्म देगा, वो बात हिडमा पे लागू होती है!
कैसे बड़े-बड़े उद्योगपती टाटा जिंदल अंबानी अदानी लाखों करोड़ों अरबों में खेलते है और झारखंड छत्तीसगढ़ उड़ीसा में आज भी ग़रीब आदिवासी भूख से म��� रहा है,
जिनकी जिंदगी से ज़्यादा उनके घरों के नीचे दबा सोना कोयला बॉक्साइट महंगा है, वो बाहर आने के बाद भी वो ग़रीब है!
यह ग़रीबी ओर शोषण ही है जो देश में न'क्सल'वाद को जन्म देता है।
गुजरात: जूनागढ़
अनुसूचित जाति की करीब 250 स्टूडेंट को हॉस्टल में स्वस्थ खाना नहीं परोसा जाता
और सारी सुविधाएं भी नहीं मिल रही
खराब खाना परोसने की वजह से बहुत सारी स्टूडेंट को फूड पॉइजनिंग के रिपोर्ट भी है,
250 स्टूडेंट ने 24 घंटे से कुछ नहीं खाया है
गुजरात सरकार में SC समाज के 3 मंत्री हैं
अब सवाल ये है कि ये अनुसूचित जाति के मंत्री
इनलोगो की समस्याओं का समाधान क्यों नहीं करते हैं?
धर्मग्रंथों में दहेज प्रथा — धर्म के नाम पर सामाजिक अन्याय की जड़ें
भूमिका
•दहेज प्रथा आज भी भारतीय समाज के लिए कलंक है।
•यह केवल आर्थिक अन्याय नहीं, बल्कि स्त्री की गरिमा पर प्रहार है।
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1️⃣ वैदिक ग्रंथों में दहेज का उल्लेख
(क) ऋग्वेद (1/109/2)
“अपश्रं हि भूर्तिवात्रा वां वा घा स्यालात्।”
(ऋग्वेद 1/109/2)
अर्थ — “हे इन्द्र और अग्नि! सुना है कि तुम साले (कन्या के भाई) से भी अधिक और विविध प्रकार का धन देते हो।”
👉 यह श्लोक उस समय की सामाजिक सोच को उजागर करता है जहाँ विवाह एक व्यापार बन गया था।
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2️⃣ अथर्ववेद (14/1/13) में “सूर्या का दहेज”
“सूर्या बहुतः प्रागास्विता यमावसुजूत। अथासु हन्यते गावोऽर्जुन्योः पर्युह्यते।”
(अथर्ववेद 14/1/13)
अर्थ — “सविता ने सूर्य को दहेज दिया। विवाह के समय गायें और रथ चलाए गए।”
👉 यहाँ “सविता द्वारा दहेज देने” का उल्लेख स्पष्ट करता है कि विवाह में कन्या के साथ वस्तुएँ देना एक परंपरा के रूप में स्वीकार थी।
धर्म के नाम पर यह दान बाद में “कर्तव्य” और फिर “दबाव” बन गया।
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3️⃣ मनुस्मृति (9/194)
“अध्ययन्यथावाहनं तत्र च प्रतीकगृहम्। श्रामपाणिप्रतिग्राह्यं च स्त्रीवित्तं स्त्रीधनं स्मृतम्॥”
अर्थ — “विवाह के समय जो कुछ दिया जाए, पिता द्वारा पुत्री को जो उपहार मिले, वही स्त्रीधन कहलाता है।”
👉 यहाँ दहेज को ‘स्त्रीधन’ के रूप में वैधता दी गई।
परंतु व्यंग्य यह है कि विवाह के बाद वही स्त्रीधन पति और ससुराल के नियंत्रण में चला जाता है।
धर्म की आड़ में स्त्री की संपत्ति पर पुरुष का अधिकार सुनिश्चित किया गया।
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4️⃣ महाभारत में द्रौपदी का विवाह
द्रुपद ने द्रौपदी के विवाह के समय “बहुत सा धन, स्वर्ण, रथ, गाएँ, दासियाँ, और वस्त्र” दहेज में दिए।
👉 यह दिखाता है कि ब्राह्मणवादी ग्रंथों ने जिसे महान कहा वो “महान” राजाओं ने भी दहेज को गौरव का प्रतीक माना।
धन और दासियाँ देना धर्म का नहीं, ब्राह्मणवादी मानसिकता का प्रमाण था।
इस परंपरा ने आने वाले युगों में समाज को यह सिखाया कि
“कन्या देना है तो उसके साथ धन भी देना होगा।”
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5️⃣ रामायण में जनक और सीता विवाह
“अथ राजा विदेहानां ददौ कन्यां बहूनि च।”
(वाल्मीकि रामायण, बालकांड)
अर्थ — “राजा जनक ने कन्याओं के साथ बहुत धन दिया।”
👉 जनक, जो काल्पनिक ग्रंथों में “ज्ञानी राजा” माने जाते हैं, उन्होंने भी सीता के साथ “बहुत सा स्वर्ण, रत्न, वस्त्र और दास-दास��याँ” दीं।
यह दृश्य आज तक “आद��्श विवाह” के रूप में गाया जाता है —
पर वास्तव में यह स्त्री के साथ संपत्ति के स्थानांतरण की प्रथा को वैध ठहराने वाला दृश्य है।
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6️⃣ सामाजिक और नैतिक आलोचना
धर्मग्रंथों में जब विवाह “कन्यादान” कहलाया, तब स्त्री को दान की वस्तु बना दिया गया।
दान वही होता है जो निर्जीव या अधिकारहीन हो।
स्त्री का “दान” और उसके साथ वस्तुओं का “दान” —
यह पूरी व्यवस्था स्त्री को संपत्ति में बदलने का धार्मिक ष���्यंत्र थी।
👉 दहेज का यह धार्मिक आवरण धीरे-धीरे आर्थिक दासता में बदल गया।
वेदों का “वस्त्राभूषण दान” और पुराणों का “स्वर्णगाय-रथ” आज “कैश, कार और बंगले” बन गया है।
धर्मग्रंथों के ये प्रसंग समाज के सामने इस बुराई को ‘धर्मसम्मत’ स्वरूप में प्रस्तुत करते हैं,
जिससे विरोध करने वाला “अधर्मी” कहा जाने लगा।
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7️⃣ आधुनिक दृष्टि से
•दहेज प्रथा का परिणाम: स्त्रीहत्या, भ्रूणहत्या, आर्थिक शोषण और सामाजिक असमानता।
•1961 का “दहेज निषेध अधिनियम” इन्��ीं धार्मिक और सामाजिक विकृतियों के विरुद्ध एक कानूनी जवाब था।
•परंतु जब तक समाज “धर्म” के नाम पर इस कुप्रथा को गौरव समझता रहेगा, तब तक कानून भी असहाय रहेगा।
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निष्कर्ष
धर्मग्रंथों में जो दहेज के दृश्य हैं, वे किसी “धार्मिक सत्य” के प्रतीक नहीं, बल्की सामाजिक वर्गभेद और स्त्री-अवमूल्यन के प्रतिबिंब हैं।
वेदों का “दान”, पुराणों का “विभूषण”, और रामायण-महाभारत का “संपत्ति हस्तांतरण” —
इन सबने मिलकर स्त्री को वस्तु और विवाह को सौदा बना दिया।
अब आवश्यकता है कि हम कहें —
“जहाँ स्त्री को दान कहा जाए, वहाँ धर्म नहीं" तथा
"दहेज प्रथा का हो संपूर्ण बहिष्कार"
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“कैसे ब्राह्मणों ने छुआछूत को धर्म बना दिया — पाराशर स्मृति के उदाहरणों के आधार पर”
भूमिका:
भारतीय समाज में छुआछूत की जड़ें ब्राह्मणवादी धार्मिक ग्रंथों में गहराई तक फैली हुई हैं। पाराशर स्मृति जैसे ग्रंथ इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि कैसे एक योजनाबद्ध तरीके से “शुद्ध” और “अशुद्ध” की अवधारणा गढ़ी गई, ताकि वर्ण व्यवस्था को स्थायी और ब्राह्मणवादी सत्ता को अखंड रखा जा सके।
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१. चाण्डाल-दर्शन मात्र से अशुद्धि
पाराशर स्मृति (श्लोक 24) में कहा गया है कि यदि कोई ब्राह्मण चाण्डाल को देख ले, तो उसे तुरंत स्नान कर सूर्य-नार���यण का दर्शन कर “शुद्ध” होना चाहिए।
👉 इससे स्पष्ट है कि केवल “देख लेने” मात्र से भी ब्राह्मण को “अशुद्ध” मान लिया जाता था — यह मानसिक गुलामी का पहला बीज है।
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२. चाण्डाल द्वारा छुए जल के उपयोग पर कठोर प्रायश्चित्त
श्लोक 25–27 में कहा गया है कि यदि किसी ब्राह्मण ने अज्ञानवश चाण्डाल द्वारा खूदवाए या छुए जल का उपयोग किया, तो उसे उपवास, वमन (उल्टी करके पानी निकालना), अथवा तीन दिन तक गौमूत्र और यवागू (जौ का दलिया) से बना भोजन करना चाहिए।
👉 इसका अर्थ है कि स्वच्छता नहीं, बल्कि जाति-आधारित घृणा को “धर्म” घोषित किया गया।
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३. चाण्डाल के घर या वस्तुओं का स्पर्श ‘पाप’ घोष���त
श्लोक 40–42 में कहा गया है कि यदि किसी ब्राह्मण ने चाण्डाल के घर में प्रवेश किया, तो उस घर को जलाना(?) चाहिए और फिर अग्नि-होम आदि के द्वारा भूमि को “शुद्ध” करना चाहिए।
👉 यह न केवल घृणा की चरम सीमा है, बल्कि यह समाज में अलगाव, हिंसा और अपमान को वैध ठहराने का धार्मिक औजार है।
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४. ‘प्रायश्चित्त’ के नाम पर अमानवीय दंड
इन श्लोकों में हर “स्पर्श” या “संपर्क” के बाद ब्राह्मण को गोमूत्र पीने, उल्टी क��ने, उपवास करने, या जौ के सूप खाने जैसे कर्मों का आदेश है।
👉 यह दिखाता है कि “शुद्धता” का पूरा ढांचा जातिग�� श्रेष्ठता के भ्रम पर टिका हुआ था — जहाँ एक समूह को “दैवीय” और दूसरे को “अपवित्र” कहा गया।
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५. महिलाओं और अन्य वंचित समुदायों के प्रति भेदभाव
अध्याय 6, 44, 45 श्लोकों में कहा गया है कि यदि किसी के घर में चाण्डाल या दासवृत्ति करने वाली स्त्री (जैसे धोबिन, चमारिन, व्याधिनी आदि) घुस जाए, तो घर की मिट्टी और पात्र तक बदल देने के निर्देश हैं।
👉 यह इस बात का प्रमाण है कि “धर्मग्रंथों” का उद्देश्य समानता नहीं, बल्कि जातिगत अपमान को स्थायी बनाना था।
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६. दार्शनिक और सामाजिक विश्लेषण
पाराशर स्मृति जैसे ग्रंथों में “शुद्धता” का विचार आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक नियंत्रण का औजार भी था।
•ब्राह्मण को “देवता” और शूद्र को “अपवित्र” घोषित कर दिया गया।
•“प्रायश्चित्त” के बहाने शारीरिक कष्ट और भय को धार्मिक अनिवार्यता बना दिया गया।
•धर्म के नाम पर मनुष्य की गरिमा, समानता और सहअस्तित्व ��ी भावना को नष्ट किया गया।
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७. निष्कर्ष: धर्म या सामाजिक साजिश?
इन श्लोकों से स्पष्ट है कि छुआछूत “आध्यात्मिक गलती” के साथ साथ एक सामाजिक नीति भी थी — जिसका ��द्देश्य वर्णव्यवस्था की दीवारों को सुदृढ़ बनाना था।
पाराशर स्मृति जैसे ग्रंथों ने न केवल असमानता को वैध बनाया, बल्कि उसे “ईश्वरीय आदेश” का रूप देकर सदियों तक समाज पर थोप दिया।
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८. आधुनिक दृष्टिकोण
आज के युग में जब संविधान समानता और मानवता का प्रतीक है, तब यह आवश्यक है कि हम इन ग्रंथों की आलोचनात्मक समीक्षा करें और समझें कि “धर्म” के नाम पर रची गई जातिगत हिंसा का मुकाबला केवल वैज्ञानिक ��ोच, करुणा और समानता से ही संभव है।