ग़ज़ल ||
हमारे ज़ख़्म-ए-तमन्ना पुराने हो गए हैं
कि उस गली में गए अब ज़माने हो गए हैं
तुम अपने चाहने वालों की बात मत सुनियो
तुम्हारे चाहने वाले दिवाने हो गए हैं
वो ज़ुल्फ़ धूप में फ़ुर्क़त की आई है जब याद
तो बादल आए हैं और शामियाने हो गए हैं
जो अपने तौर से हम ने कभी गुज़ारे थे
वो सुब्ह ओ शाम तो जैसे फ़साने हो गए हैं
अजब महक थी मिरे गुल तिरे शबिस्ताँ की
सो बुलबुलों के वहाँ आशियाने हो गए हैं
हमारे बा'द जो आएँ उन्हें मुबारक हो
जहाँ थे कुंज वहाँ कार-ख़ाने हो गए हैं
~ जौन एलिया साहब 🌻✨🥰
#Shair #Gazal🌷
#सफर_ए_ज़िंदगी ✨🪽
ग़ज़ल
हमारे सीने से साँसें निकाल लेता है
अजीब ख़ाब है आँखें निकाल लेता है
मैं उसके सामने कुछ बोल ही नहीं पाता
वो बात बात में बातें निकाल लेता है
कोई विसाल मिरे जब क़रीब आता है
दरख़्त ए हिज्र भी शाख़ें निकाल लेता है
मिला है ऐसा फ़रेबी सनम कि पूछिए मत
जो झूठ मूठ की आहें निकाल लेता है
वो मेरे जिस्म की मिट्टी टटोल कर अक्सर
मिरे वजूद से लाशें निकाल लेता है
तमाम फूल उसे देख कर संवरते हैं
ये चाँद भी क़सम से क़बाएँ निकाल लेता है
हमारा क़ल्ब कभी चीखता नहीं लेकिन
कई ख़मोश सदाएँ निकाल लेता है
तुम्हारा बाम ए बदन भी वही फ़लक हो जो
धनक के साथ घटाएँ निकाल लेता है
मैं एक ऐसे मुसव्विर की खोज में हूँ 'काफ़'
जो यादगार से यादें निकाल लेता है
- काफ़